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राहुल जी, कांग्रेस शासित राज्यों में बैक्सीन की बर्बादी पर मौन क्यों?

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अगर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी की करतूत को देखते हुए यह कहा जाए कि आज दोनों ही देश के लिए दुर्भाग्य बन गए हैं तो गलत नहीं होगा। क्योंकि वैश्विक महामारी कोरोना जैसे संकट और विषम परिस्थिति के समय में विपक्षी दल खासकर कांग्रेस सतही राजनीति करने पर उतर आई है। देश में कोरोना के खिलाफ वैक्सीनेशन की सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न मिल जाए इसके लिए कांग्रेस देश में भांति-भांति का प्रपंच करने में जुटी हुई है। राहुल गांधी का तो क्या कहना, वह तो जब भी अपना मुंह खोलते है अनुचित ही बोलते हैं। खास बात है कि राहुल गांधी के बोलने और मौन रहने में भी तारतम्य नहीं रह पाता। वह बोलते भी गलत समय में और चुप भी रहते हैं तो भी गलत समय पर। उदाहरण देखिए..

गलत समय पर उलटा बोलते राहुल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जून 2021 को राज्य के मुख्यमंत्रियों के साथ हुई बैठक के दौरान 18 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के सभी लोगों के लिए वैक्सीनेशन निशुल्क करने का ऐलान किया। पीएम मोदी ने कहा कि केंद्र सरकार खुद वैक्सीन खरीद कर राज्यों को मुफ्त में देगी। पीएम मोदी के इस फैसले पर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट के जरिए सवाल उठाया है। राहुल गांधी ने पूछा है कि अगर वैक्सीन सभी के लिए मुफ्त है तो फिर प्राइवेट अस्पताल वैक्सीनेशन के लिए चार्ज क्यों करता है? राहुल गांधी के इस आसान से सवाल से यह तो पता चल ही जाता है कि उन्हें समझ कितनी है। लेकिन अभी उनकी समझ पर चर्चा करने का समय नहीं है, अभी तो यह सिद्ध करना है कि वह हमेशा गलत समय पर और उलटा बोलते हैं। हाल ही में पंजाब में 18 से 44 साल के आयु वर्ग के लिए 400 रुपए में खऱीदी गई वैक्सीन 1060 रुपए प्रति डोज की दर से प्राइवेट अस्‍पतालों को बेचकर करोड़ों का लाभ बनाया गया। भाजपा के विरोध के बाद अमरिंदर सरकार ने उन वैक्सीन को वापस लेने का आदेश जारी कर दिया। अमरिंदर सरकार के इस फैसले से साफ है कि सरकार ने अपनी गलती पर मुहर लगा दी है।

राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ में गड़बड़ी  

राजस्‍थान में बड़ी संख्‍या में वैक्‍सीन का कचरे में पाया जाना, पंजाब में निजी अस्‍पतालों को वैक्‍सीन बेचने का आरोप और छत्तीसगढ़ में वैक्सीन की हर तीन में से एक शीशी बर्बाद होने की बात जांच में सामने आ चुकी है। संयोग की बात है कि इन तीनों प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार है। जिस प्रकार सरकार के स्तर पर वैक्सीन का कुप्रबंधन सामने आया है इससे साफ होता है कि यह सुनियोजित साजिश है। ताज्जुब की बात तो यह है कि राहुल गांधी अपनी सरकार के इस कुप्रबंधन पर मौन हैं लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस घोषणा पर सवाल उठा रहे हैं कि जब वैक्सीन फ्री है तो फिर निजी अस्पताल इस पर चार्ज क्यों ले रहा है। अच्छा होता राहुल गांधी यह सवाल पंजाब के अपने मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से पूछते। अच्छा होता राजस्थान में कचरे में पाए जाने वाले वैक्सीन पर कोई ट्वीट करते। अच्छा होता छत्तीसगढ़ के अपने मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल को कुछ सफाई देने को कहते।         

नहीं रही अपनी ही सरकारों पर पकड़?

राहुल गांधी की यह लाचारी दो बातों की तरफ इंगित करती हैं। एक तो यह कि राहुल गांधी को कोई अब गंभीरता से लेता नहीं है। सभी लोग समझ गए कि राहुल गांधी हमेशा गलत समय पर बोलते हैं और हमेशा गलत ही बोलते हैं। उनके बोलने से पार्टी का नुकसान ही होगा भला नहीं होने वाला। दूसरा यह कि अब राहुल गांधी की अपनी ही प्रदेश सरकारों पर कोई पकड़ नहीं रही है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंद सिंह ने कई बार खुलेआम यह जता दिया है कि वे कांग्रेस की बदौलत नहीं बल्कि अपनी बदौलत कांग्रेस को सत्ता में लेकर आए हैं। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश सिंह बघेल भले सरेआम कुछ न कहें लेकिन उनकी बातों को तरजीह नहीं देते यह तो तय ही है।            

अपनी सरकारों की बजाए केंद्र को कोस रहे

राजस्‍थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब में इस तरह की बड़ी गड़बडि़यां सामने आने के बाद भी वे बेसिर पैर की बात कर रहे हैं। राहुल गांधी का यह रवैया अत्‍यंत शर्मनाक है। कांग्रेस शासित राज्‍यों से उजागर होते वैक्‍सीन घोटालों के बावजूद वे अभी भी केंद्र सरकार को कोस रहे हैं, वह भी अपूर्ण एवं गलत तथ्‍यों के सहारे। अब सवाल यह उठता है कि आखिर राजनीति में विपक्ष की ऐसी गलत परिपाटी क्‍यों स्‍थापित हो गई है। विपक्ष मुद्दा के आधार पर नहीं पार्टी के आधार पर बयान जारी करता है। इस विषम परिस्थितियों में सरकार के समर्थन में खड़ा होने की जगह श्रेय एवं आरोप प्रत्यारोप की होड़ मची हुई है।

केंद्र ने वापस लिया राज्यों से दायित्व

केंद्र की भाजपा सरकार प्रतिदिन बड़े पैमाने पर टीकाकरण कर रही है और अभी तक करोड़ों लोगों को संक्रमण से बचाया है। अब जो 25 प्रतिशत टीकाकरण का कार्य राज्यों के पास था, वो भी केंद्र के हाथ में जाने से टीकाकरण को और अधिक गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। साथ ही, इसके बाद विपक्षी दलों को टीके पर व्यर्थ राजनीति करने का अवसर भी नहीं मिलेगा।

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