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झारखंड में खिलाड़ियों के लिए पैसे नहीं, खाने के पड़े लाले, सीएम और विधायकों के क्रिकेट मौच पर उड़ाये 42 लाख रुपये

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हाल ही में जारी एनएफएचएस की रिपोर्ट के मुताबिक गरीबी के पायदान पर झारखंड दूसरे नंबर पर है। यहां पर खेल और खिलाड़ियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं है। पैसे की कमी की वजह से खिलाड़ी खेल छोड़कर मजदूरी कर रहे हैं। कई खिलाड़ियों को भोजन के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। ऐसे में प्रतिभाशाली खिलाड़ी का करिअर शुरु होने से पहले ही खत्म हो जाता है। लेकिन हेमंत सरकार की फिजुलखर्ची का आलम यह है कि क्रिकेट और खेल को बढ़ावा देने के नाम पर मुख्यमंत्री, विधायक और पत्रकारों के मनोरंजन पर 42 लाख रुपये उड़ा दिए जाते हैं।

इंडियन एक्सप्रेस और आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को क्रिकेट मैच खेलने का मन हुआ, तो बाकायदा सीएम एकादश और विधानसभा अध्यक्ष एकादश के बीच मैच का आयोजन किया गया। पहला मैच 11 मार्च, 2021 को हुआ, जिस पर कुल 30 लाख 85 हजार 616 रुपये खर्च हुए। इसके बाद 22 मार्च को दूसरा मैच सीएम एकादश और पत्रकार एकादश के बीच हुआ। इसके आयोजन में भी 11 लाख, 33 हजार, 636 रुपये खर्च हुए। दोनों ही आयोजन को मिलाकर कुल 42 लाख, 19 हजार, 252 रुपये खर्च किए गए। हालांकि ये बिल अभी भुगतान नहीं किया गया है। लेकिन खेल विभाग की तरफ से इसे पास कर दिया गया है। कैबिनेट जैसे ही इसे पास करेगी, बिल का भुगतान कर दिया जाएगा।

अब सवाल उठ रहे हैं कि आखिर दो मैच पर 42 लाख रुपये कैसे खर्च हो गए ? आपको जानकर हैरानी होगी कि इस हाईप्रोफाइल मैच के लिए काफी तैयारियां की गई थीं। इसके तहत स्पोर्ट्स किट, कैटरिंग, मेडल-ट्रॉफी, फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, बुके आदि की व्यवस्था की गई थी। इसके लिए इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को ठेका दिया गया था। कंपनी ने मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों के रूतबे के मुताबिक पूरी व्यवस्था की थी। पूरे आयोजन में राज्य के सभी 71 विधायकों ने हिस्सा लिया था। विधानसभा अध्यक्ष एकादश के साथ जब मैच हुआ तो सीएम हेमंत सोरेन ने इसमें कुल 11 रन बनाएं। इस बेहतरीन प्रदर्शन के लिए उन्हें मैन ऑफ द मैच चुना गया था।

बीजेपी प्रवक्ता प्रुतल शाहदेव ने इस मौच पर सवाल उठाते हुए कहा कि खेल के नाम पर सरकार ने लूट को बढ़ावा दिया। इस आयोजन में तीन टीमों ने मैच में हिस्सा लिया। इस लिहाज से देखें तो 33 खिलाड़ियों के बीच किट बांटा जा सकता था, लेकिन यहां 100 लोगों को यह किट बांटा गया। टेनिस बॉल (रबर गेंद) वाले खेल में भी हेलमेट, थाईगार्ड, पैड, ग्लब्स जैसी चीजों का बंदरबांट किया गया। ये सरासर लूट है। 

उधर झारखंड के प्रतिभावान खिलाड़ी जो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में बेहतर प्रदर्शन कर राज्य और देश का नाम रोशन कर सकते हैं, वो अब पैसे की कमी की वजह से खेलों से दूर होते जा रहे हैं। रांची से 40 किलोमीटर दूर गुमला जिले की 26 साल की रीता सुरीन रेसलर रही हैं। राज्य के लिए उन्होंने कई मेडल भी जीते हैं लेकिन खेलना छोड़ दिया है, क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे। रीता के परिवार को सरकारी सुविधा भी नसीब नहीं है। रेसलर रीता अब मजदूरी और शादियों में डेकोरेशन का काम कर अपना खर्चा चलाती हैं। मौका मिलने पर रेसलिंग का अभ्यास भी करती हैं। 

सिमडेगा की नूतन कुमारी हॉकी खिलाड़ी हैं। नेशनल लेवल पर खेल चुकी हैं, ट्रेनिंग और पैसों के अभाव में खेलना छोड़ दिया है। सिमडेगा की ही करिश्मा परवार, डिपलीन केरकेट्टा जैसे हॉकी खिलाड़ी भी इस लिस्ट में शामिल हैं। वहीं राज्य हॉकी टीम की सेंटर फॉरवर्ड खिलाड़ी प्रमोदिनी लकड़ा कहती हैं, ‘समीरा टोप्पो, अभिलाषा मिंज, श्वेता कुल्लू सहित हम चार लड़कियां हॉस्टल में हैं। सभी के पिता किसान हैं। सभी अपने घर से हर महीने 1400 रुपये देती हैं, तब जाकर रांची में रहना संभव हो पा रहा है।’ 

झारखंड के कई खिलाड़ी पैसों के लिए इधर-उधर भटकने के लिए मजबूर है। एथलेटिक्स की खुशबू कुमारी अपने खेल को जारी रखने के लिए दूसरों की मदद पर निर्भर है। यही नहीं, सिमडेगा और गुमला जिले की प्रमोदिनी लकड़ा सहित पांच से अधिक महिला हॉकी खिलाड़ी बरियातू स्कूल के हॉस्टल में रहती हैं और हॉकी का अभ्यास करती हैं। बदले में इन्हें हॉस्टल को प्रतिमाह 1500 रुपये फीस देने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है।

वहीं झारखंड के खिलाड़ियों को खाने के लाले पड़े हैं। सिमडेगा में खेल प्राधिकरण द्वारा चल रहे दो स्पोर्ट्स सेंटरों का खस्ता हाल है। अब इस हॉकी सेंटर के हालात ऐसे हैं कि लड़कियों को पिछले डेढ़ साल से पोषण राशि नहीं मिली है। कोरोना के कारण पिछले साल अप्रैल में प्रशिक्षण पा रही छात्राओं को अपने-अपने घर भेज दिया गया था। सिमडेगा के इस हॉकी सेंटर की अधिकतर लड़कियां गरीब परिवारों से आती हैं और सेंटर की बदौलत देश और विदेश में अपना नाम रोशन करती हैं। लेकिन खेल प्राधिकरण की लापरवाही के कारण आज उनको खाने के लाले पड़ गए हैं। कुछ को माड़ भात खा कर गुजारा करना पड़ रहा है तो कुछ को खेतों में मजदूरी भी करनी पड़ रही है।

 

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