Home चुनावी हलचल उत्तर प्रदेश में फिर नमो लहर

उत्तर प्रदेश में फिर नमो लहर

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6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद गिरने के बाद केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने मनमाने ढंग से उत्तर भारत की चार भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया था – उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश – और इन राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगा दिया था। एक साल बाद जब चुनाव हुए – तो भाजपा इनमें से तीन राज्य हार गयी, और हिन्दू राष्ट्रवादी आन्दोलन में जो भी गति नज़र आ रही थी, वो थम गयी। स्थानीय राजनीतिक मुद्दे, एक विराट हिन्दू उत्थान की व्यापक कथा पर भारी पड़ गए। हाँ, भाजपा की हार को अख़बार के लेखों ने (विशेषकर अंग्रेज़ी वाले) यह कहकर खूब मनाया कि हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति को बाबरी विध्वंस के बाद गहरा धक्का लगा है।

चौथा राज्य, हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति के भविष्य की एक अलग ही दिशा बयान कर रहा था। जहां शांता कुमार, सुन्दरलाल पटवा, और कुछ हद तक कल्याण सिंह विफल रहे, वहीं भैरों सिंह शेखावात करामाती रूप से सफल रहे। 1993 के राजस्थान चुनाव में, भाजपा का वोट प्रतिशत 25 से बढ़कर 39 हो गया। 1990 में जब भाजपा ने जनता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था तो 85 सीटें आयी थी – जो अब बढ़कर 95 हो गयी।

शेखावत सिद्धांत भाजपा के लिए भारत के चुनावी परिदृश्य में एक बड़ी सीख थी । इस सिद्धांत के चार पहलु थे, जो भाजपा के उत्थान, और भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनने में अभी तक कारगर रहे हैं:
1. हिन्दू राष्ट्रवाद का क्षेत्रीय अभिग्रहण – शेखावत की जीत का मूल था राजपूत हिंदुत्व का जन्म – यह रामजन्मभूमि आन्दोलन से निकली हुई एक धारा थी, जिसमें राजस्थानी उप-राष्ट्रवाद था। आगे जाकर मोदी ने इसे गुजराती अस्मिता के रूप में ढाला।

2. जातीय गठबन्धनों का विस्तार – भाजपा मुख्य रूप से राजपूतों पर निर्भर थी, पर शेखावत ने चुनी हुई सीटों पर गुज्जर और जाट को शामिल किया। इससे अगड़ी जातियों के अतिरिक्त अन्य जातियां भी हिन्दू वोट आधार का हिस्सा बन गयी।

3. RSS की लक्ष्मण रेखा से आगे बढ़कर व्यवहारिक राजनीति – RSS की विचारधारा महत्वपूर्ण है, लेकिन चुनाव जीतने के लिए पार्टी को “middle ground” भी चाहिए। इसलिए ललित किशोर चतुर्वेदी जैसे शुद्ध हिंदुत्ववादी नेताओं को शांत कर, शेखावत ने “व्यवहारिक राष्ट्रवाद” अपनाया।

4. बाहर से लोगों को लेकर स्थानीय विस्तार – भीतर से विरोध के बावजूद, पार्टी में बाहर से आये कई लोगों को शेखावत ने टिकट दिए – इनमें जनता दल के 14 ऐसे विधायक थे, जिनकी अपने अपने क्षेत्रों में काफी रसूख थी।

1993 की हार से भाजपा और संगठन, दोनों ने काफी सीखा, और चुनाव के प्रति अपनी approach में बुनियादी सुधार किया। ध्यान से देखें तो शाह-मोदी टीम की उत्तर प्रदेश रणनीति के पीछे, शेखावत सिद्धांत के यही चार बिंदु हैं । इन दो गुजराती बाहुबलियों के नेतृत्व में यह सिद्धांत और भी गहरा हुआ है। अब उत्तर प्रदेश 2017 के सन्दर्भ में इन बिन्दुओं को देखें:

  • उत्तर प्रदेश में केवल राम मंदिर ही अकेला हिंदुत्ववादी अजेंडा नहीं है – अब आंचलिक स्तर पर कोर मतदाताओं के मुद्दे इनमें शामिल हैं – जैसे एंटी-रोमियो स्क्वैड और बुचढ़खानों (slaughter houses) पर बैन। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह मुद्दे बहुत जोर पकड़ रहे हैं – वहां लव-जिहाद और दुधारू गायों की कमी दोनों ही गंभीर विषय हैं, जिन्हें अंग्रेज़ी मीडिया हाथ नहीं लगाना चाहती।
  • 150 सीट यादव के सिवा दूसरी OBC जातियों को दिए गए हैं, OBC, MBC और दलितों में भी पैंठ बढ़ाई जा रही है।
  • संघ उत्तर प्रदेश में भाजपा की आत्मा है, पर व्यवहारिकता अपनाई जा रही है, जिससे भूतकाल की गल्तियों को न दुहराया जाए
  • 100 सीटों पर नए उम्मीदवार उतारे गए हैं, जिससे काफी पुराने लोग नाराज़ हैं । यह अलग बात है कि यह वफादार पुराने लोग कई वर्षों से चुनाव नहीं जीत पाए । शाह की शक्तिशाली स्थानीय नेताओं (मुख्यतः BSP से) लेने की रणनीति, मज़बूत चुनावी इंजिनीयरिंगपर टिकी है

यह अमित शाह की चालें भली ही छोटी हों, लेकिन यह उत्तर भारत (heartland) में भाजपा की राजनीति का एक हिस्सा हैं।

लम्बे समय का चुनावी इतिहास देखें, तो 1957 से, भाजपा के जब-जब वोट बढ़े, तो पहले से अधिक बढ़े, और जब जब वोट गिरे, तो पहले से कम गिरे। 2014 के चुनाव में एक “ब्रेकआउट मोमेंट” आया – 15 प्रतिशत के धरातल से बढकर, भाजपा का वोट शेयर अब तक के सर्वाधिक 44 प्रतिशत तक गया। और यह प्रतिशत, तब था जब overall वोट प्रतिशत भी बहुत ऊँचा था।

UP 2017 में अमित शाह द्वारा शेखावत सिद्धांत लागू करने के पीछे मंशा यही है कि वोट प्रतिशत इस सर्वाधिक संख्या के निकट ही रहे। 2014 में United Spectrum of Hindu Votes का जो गठबंधन बना था – वो कायम रहे । इसीलिए 150 सीट गैर-यादव OBC और 63 सीट गैर-जाटव दलित। यानी हर दो में से एक सीट पर गैर यादव OBC, या गैर जाटव दलित – इस तरह से हर जाति के हिन्दू को इकठ्ठा किया जा रहा है।

2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाना ही मुख्य मुद्दा था – जिसने भाजपा को अभूतपूर्व विजय दिलाई । उत्तर प्रदेश के अधिकाँश हिन्दुओं के लिए यह एक धार्मिक कार्य था कि EVM का बटन भाजपा के लिए दबा कर इस नए पूजनीय नेता को नमन करना । एक हद तक हिन्दू पुनर्जागरण में मोदी ने राम का स्थान ले लिया । मोदी के प्रति इस आस्था रूपी प्रतिबद्धता को समझना है, तो इस प्रदेश में घूम कर एक राजनीतिक तीर्थ करना अनिवार्य है – कि कौनसी गहरी सामाजिक और सांस्कृतिक शक्तियां यहाँ काम कर रही हैं ।

मोदी में आस्था का एक कारण है यह विश्वास कि 70 साल में जो गलत हुआ, उन गलतियों को यह ओजस्वी शख्शियत सुधार देगी । इसी लिए UP की जनता चाहती थी कि इसे स्पष्ट बहुमत मिले – जिससे गठ्बंदन की खींच-तान से कोई परेशानी न हो । जब 8 नवम्बर 2016 को नोटबंदी हुई, तो मोदी इसी आस्था का क़र्ज़ चुका रहा था । मीडिया भले ही नेगेटिव लिखे – यह वही ‘अत्याचार पत्रकार’ हैं जिन्होंने मोदी राज में दलित अत्याचार की कहानियों के लिए देश का चप्पा चप्पा छान मारा । रातों-रात – वही, अपने चचेरे भाइयों और दोस्तों के साथ नोटबंदी पत्रकार हो गए । ऐसा दिखाया गया कि पूरा भारत ATM या बैंक की कतार में लगा है, और देश की हर मौत के लिए मोदी ज़िम्मेदार है ।

इलाहाबाद के निकट एक गाँव के दलित स्कूल टीचर, परशुराम पासी कहते हैं कि आप मोदी की शुरुवात (चायवाला) को समझिये, तब आप जान पायेंगे कि एक निर्णय से मोदी ने क्या किया है । मायावती सिर्फ कहती है, लेकिन मोदी ने धन्ना सेठों को सच में ध्वस्त कर दिया । परशुराम हाल तक बसपा कार्यकर्ता था । 2014 में भी बसपा को वोट दिया । लेकिन अब मोदी को देगा (भाजपा को नहीं, मोदी को) । इलाहबाद से मेरठ तक यात्रा कीजिये । धूलभरी गलियों में दूकान्दारों से पूछिए । अधिकतर बनिए (जो नोटबंदी से सबसे अधिक प्रभावित हुए) कहते हैं – वोट तो मोदी को ही देना है – चाहे जितनी भी दिक्कत हो, अंततः मोदी अच्छा करेगा । आम मतदाता ने मोदी में इस हद तक investment किया है, और नोटबंदी के बाद यह investment और निखरा ही है ।

अब आलम यह है, कि जो 2014 में मोदी के साथ थे, वो अब नोटबंदी के समर्थक हैं । और जो तब साथ नहीं थे, वो अब नोटबंदी के विरोधी हैं – मुसलिम, यादव, जाटव । लेकिन United Spectrum of Hindu Votes का दायरा बढ़ा है – गैर यादव OBC और गैर जाटव दलित और जोर से साथ आये हैं – और यहीं भाजपा का टिकट वितरण सही साबित हो रहा है ।

यह तय है कि अधिकतर भारतीय चुनाव presidential होते हैं – यानी मुख्य नेता पर लड़े जाते हैं । इसी लिए हर अभियान का एक चेहरा होता है । यह उत्तर प्रदेश के लिए भी सही है, जहां भाजपा का कोई चेहरा नहीं है, लेकिन बाकी दोनों दलों का है । लेकिन UP में आंचलिक उप राष्ट्रवाद जैसी कोई बात नहीं है – जो बिहार, गुजरात या महाराष्ट्र में है । UP का मतदाता इस बात पर गर्व करता है कि राष्ट्रीय राजनीति में उसकी भूमिका कितनी अहम् है । मोदी वाराणसी से सांसद हैं, उतने ही स्थानीय नेता हैं जितने मुलायम, अखिलेश या माया । चौंकाने वाली बात यह है कि अब यादव जाटव या कुछ हद तक मुसलमान वोटर भी मोदी का प्रधानमंत्री के रूप में विरोध नहीं करता है । उनका विरोध और तरह का है – जो ऐतिहासिक कारणों में छिपा है ।

अखिलेश यादव ने युवा मुख्यमंत्री के रूप में, पार्टी के इतिहास से हट कर, विकास का चेहरा बनने का प्रयास किया है, पर शायद बहुत देर कर दी । 6 महीने पहले करते, और ढंग से अभियान करते, तो शायद बात कुछ और होती । पर आखिरी क्षण कांग्रेस के साथ गठबंधन, और छोटा चुनाव अभियान जहां उनकी पार्टी को मुलायम और शिवपाल दोनों की कमी महसूस हो रही है – इन कारणों से अखिलेश की मुश्किलें बढ़ी हैं । कई वफादार समाजवादी मुलायम का नेतृत्व न होने के कारण चिंतित हैं । 4 बार सांसद रहे शफीकुर रहमान बर्क ने 15 दिन पहले ओवैसी की पार्टी join कर ली । वे कहते हैं कि यह पार्टी अब समाजवादी मुसलामानों का घर नहीं रही । मैं अखिलेश को सिखाऊँगा कि मुसलमान की ताकत क्या होती है । मोरादाबाद संभल इलाके में यह समाजवादी पार्टी को नुक्सान पहुंचा सकते हैं ।

समाजवादियों की चिंता साफ़ दिख रही है । अखिलेश ने कांग्रेस को 105 सीटें दे दी – इस पार्टी का न तो कोई जनाधार है, जिसे ट्रांसफर किया जा सके, न ही ये पार्टी दर्जन भर भी सीटें जीत सकने की काबलियत रखती है । यह बात काफी SP नेताओं को खरी नहीं उतरी – खासकर वो जो चुनाव नहीं लड़ पाए । “नेता होता ही चुनाव के लिए है – चुनाव का मौसम में हम खाली बैठे क्या करें?” यह कहना था पूर्वी UP के एक समाजवादी नेता का, जो independent के रूप में लड़ने के लिए मुलायम का आशीर्वाद लेने आया था । राहुल गांधी का अखिलेश के प्रति attitude – इससे भी कई यादव नाराज़ हैं । मुलायम के एक पुराने साथी – आगरा के मनोज सिंह कहते हैं कि यह गांधी यादव कुनबे को समाप्त कर देंगे – इसीलिए मुलायम ने कभी इनसे कोई रिश्ता नहीं रखा – हम अखिलेश के साथ हैं, कांग्रेस के साथ नहीं ।

  • अखिलेश मुसलिम यादव के आगे बढ़ ही नहीं पा रहा (नितीश बिहार में इसमें सफल रहे थे) क्योंकि कांग्रेस से कोई फायदा ही नहीं
  • मायावती का कोर वोटर बेचैन है – धीरे धीरे खिसक रहा है – और वो कोई नया वोटर नहीं खींच पा रही । जैसे बसपा ध्वस्त होती जायेगी – जाटव भी बेचैन हो जायेंगे
  • मुसलमान अभी भी सबसे अधिक असमंजस में हैं – या शायद अपने पत्ते नहीं खोल रहे
  • भाजपा का United Spectrum of Hindu Votes 2014 की तरह ही है – अगड़ी जातियां 93% बीजेपी की हैं
  • गैर यादव OBC 2014 से अधिक भाजपा के साथ हैं, गैर जाटव दलित भी समझ रहे हैं कि बसपा को वोट देना बेकार है
  • जाट वोट पहले कम होता दिख रहा था – पर हाल में यह कुछ हद तक वापिस आया है – क्योंकि जाटों के पास कोई दूसरा व्यवहारिक विकल्प है ही नहीं

उत्तर प्रदेश चुनावी गणित की तह में होती है जाति सम्बंधित कथा – जो चुनावों से कुछ दिन पहले छोटे शहरों और गाँवों में बनती है । पहले यह कथा अगड़ी जातियां ही बुनती थी । 2007 में बहनजी इसलिए जीती कि ब्राह्मणों ने दलितों के साथ मिलकर हवा बना दी । अब यह कथा 30 साल से कम उम्र के नौजवां लिख रहे हैं – जातियों से परे – यह कथा सोशल मीडिया और स्मार्टफोन से लिखी जा रही है । भाजपा को इसका सम्पूर्ण लाभ मिल रहा है ।

दिल्ली के ओपिनियन पोल और मीडिया के कथन से दूर, UP के कस्बों-गाँवों में, आप इस केसरिया लहर की ताकत को महसूस कर सकते हैं, जो युवा और बेचैन लोगों के शोर से बन रही है ।

  • भाजपा 40 प्रतिशत के पास पहुँच रही है और बसपा 20 प्रतिशत के पास गिर रही है
  • 2014 के तुलनात्मक – भाजपा का वोट – 0 से 9 प्रतिशत कम हो सकता है
  • नोटबंदी का बहुत समर्थन हो रहा है – इसका फायदा अगले चार हफ़्तों में भाजपा उठा सकती है

बहुजन समाज पार्टी का पतन होता दिख रहा है – नोटबंदी के कारण – बसपा का दलित बल कैश पर आधारित था । बसपा के कई नेताओं ने भी स्थिति को और बिगाड़ दिया । यह मायावती के लिए मुश्किलों का कारण है । भारतीय मतदाता अपने वोट खराब नहीं करना चाहता – इसलिए अंततः जाटव भी केसरिया रंग में रंग सकते हैं – और बसपा का सफाया हो सकता है ।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश

• समाजवादी पार्टी के लिए यह कमज़ोर क्षेत्र है । अकसर यह देखा गया है कि पहले दौर का मतदान आगे की कहानी लिख देता है क्यों कि वाट्सऐप के ज़माने में सूचनाएं बहुत तेज़ी से फैलती हैं । इसलिए अखिलेश के सामने चुनौती होगी कि कार्यकर्ताओं का मनोबल न गिरे ।
• भाजपा के लिए यहाँ चिंता का विषय यह हो सकता है मत प्रतिशत 2014 की तुलना में कितना गिरे – वैसे काफी cushion है – पर अगर 12-16 प्रतिशत गिरा तो मुश्किल हो सकती है
• बसपा के लिए यह इलाका अच्छा रहा है – पर यदि मुसलमान वोट खिसक गया तो इसका फायदा SP-Cong को होगा
• भाजपा का अभियान यहाँ अच्छा रहा है – polarization भी हो रहा है

पूर्वी उत्तर प्रदेश
• SP-Cong यहाँ अच्छा नहीं कर पा रहा । अखिलेश के लिए एंटी इनकम्बेंसी मुद्दा है
• भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग यहाँ कारगर सिद्ध हो सकती है – लेकिन आपसी फूट से सावधान रहना होगा
• बसपा यहाँ सिर्फ किसी अन्य दल को नुक्सान पहुंचा सकती है

मध्य उत्तर प्रदेश
• लखनऊ इस क्षेत्र की दिशा तय करेगा । समाजवादी यहाँ आगे हैं – पर भाजपा को टिकट वितरण से फायदा होने की उम्मीद है
• कांग्रेस SP को कितना लाभ पहुंचा सकती है – यह बहुत महत्वपूर्ण रहेगा

बुंदेलखंड
• यहाँ भाजपा स्पष्ट रूप से आगे है

-डॉ प्रवीण पाटिल

(साभार: http://5forty3.in)

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