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उद्धव के पत्र की भाषा से नाराज हुए राज्यपाल: संवैधानिक संकट और राष्ट्रपति शासन से डरी उद्धव सरकार ने विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव टाला

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महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी को धमकी भरी चिट्ठी भेजी है, जबकि कोश्यारी संवैधानिक पद पर हैं। राज्यपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री के पत्र की भाषा को देखकर उन्हें दुख हुआ है। सीएम उद्धव ठाकरे के इस रवैये को देखते हुए माना जा रहा है कि सरकार बनाम राज्यपाल की यह लड़ाई और बढ़ सकती है। महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और सीएम उद्धव ठाकरे के बीच तनातनी बढ़ती जा रही है।

सरकार की अनुमति पर गवर्नर ने कहा, कानूनी सलाह लेकर उत्तर देंगे
नाना पटोले द्वारा इस्तीफा देने के बाद विधानसभा अध्यक्ष का पद इस साल फरवरी से ही खाली है। महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव करवाने की मांग को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मुलाकात की थी। प्रतिनिधिमंडल ने इस दौरान उन्हें सीएम उद्धव ठाकरे का एक पत्र सौंपा था। इसमें सत्र के आखिरी दो दिनों में अध्यक्ष पद का चुनाव कराने की स्वीकृति मांगी गई थी। जिस पर राज्यपाल कोश्यारी ने कानूनी सलाह लेकर उत्तर देने की बात कही। 

मुख्यमंत्री उद्धव के दूसरे पत्र की भाषा धमकी भरी, इससे दुख पहुंचा
बताते हैं कि राज्यपाल का कोई जवाब आने से पहले ही सीएम ने एक और पत्र राज्यपाल को भेजा। इसी पत्र की भाषा पर अब राज्यपाल की ओर से आपत्ति जताई गई है। उन्होंने पत्र की भाषा को धमकी भरा होने की बात कही है। राज्यपाल ने यह भी कहा कि पत्र की भाषा देख उन्हें दुख पहुंचा है। राज्यपाल के ताजा रुख के बाद माना जा रहा है कि सरकार बनाम राज्यपाल की यह लड़ाई और बढ़ सकती है।

राज्यपाल कोश्यारी ने बंद लिफाफे में भेजा अपना जवाब
इस बीच राज्यपाल कोश्यारी ने मुख्यमंत्री को एक बंद लिफाफे में अपना जवाब भेजा। इसी में राज्यपाल ने नाराजगी जताई है। राज्यपाल की नाराजगी के बाद गतिविधियां तेजी से बदलीं। सत्ताधारी नेताओं ने इस पर मुख्यमंत्री से संपर्क कर चर्चा की। इसके बाद अजित पवार राज्यपाल के मत के विरोध में जाकर चुनाव करवाने को तैयार नहीं हो रहे थे। उनकी राय थी कि इससे संवैधानिक संकट खड़ा हो जाएगा। राज्यपाल की ओर से तीव्र प्रतिक्रियाएं सामने आएंगी। यह राज्य सरकार द्वारा अनावश्यक रूप से एक नए संकट को निमंत्रण देने जैसा होगा।

संवैधानिक संकट और राष्ट्रपति शासन का पैदा हो गया था डर
महाविकास अघाड़ी के कुछ नेताओं को इस बात का डर पैदा हो गया कि राज्यपाल की सहमति के बिना अगर विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव करवाया जाता है, तो राज्यपाल निश्चय ही कोई बड़ा कदम उठाएंगे। ऐसे में राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है। इसलिए संवैधानिक संकट का सवाल और राष्ट्रपति शासन का डर देखते हुए महाविकास आघाडी सरकार ने दो कदम पीछे खींच लेने में ही भलाई समझी।

शरद पवार की सलाह के बाद चुनाव न कराने का फैसला
इसके बाद एनसीपी चीफ शरद पवार ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को फोन किया। उन्होंने बताया कि वे इस बारे में कानूनी विमर्श कर चुके हैं और इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि चुनाव नहीं करवाया जाए। पवार की इस सलाह के बाद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव ना करवाने का फैसला ले लिया।

उद्धवकाल में  किसानों की बदहाली, खुदकुशी करने वाले किसान देश में सबसे ज्यादा

महाराष्ट्र में उद्धव सरकार के कार्यकाल में किसानों की आत्महत्या करने का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा। शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस की महाविकास अघाड़ी सरकार के दो साल के कार्यकाल मे ही छह हजार से ज्यादा किसानों और कृषि मजदूरों को सरकार की उपेक्षा के चलते मौत का गले लगाना पड़ा। भारत में आत्महत्या पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े भी बताते हैं कि महाराष्ट्र में खुदकुशी करने वाले किसानों की संख्या देशभर में सबसे ज्यादा है। इसके बावजूद उद्धव सरकार कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही है।

पिछली बीजेपी सरकार ने किया था किसानों का 18 हजार करोड़ कर्ज माफ
जानकारों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा से फसल की बर्बादी और उपज की उचित कीमत नहीं मिलने के किसान परेशान हैं। खेती में नुकसान के बाद उन्हें समय पर सरकारी मदद या फसल बीमा सुरक्षा की राशि नहीं मिलती है। इसके चलते अन्नदाता खुदकुशी के लिए मजबूर हैं। 2017 में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार ने 18 हजार करोड़ रुपए का कृषि कर्ज माफ किया था।

सरकार की गलत नीतियों से नहीं मिल पा रहा योजनाओं का लाभ
दरअसल, किसान उद्धव सरकार की गलत नीतियों, किसानों की उपेक्षा और लापरवाह कार्यशैली से परेशान हैं। इसी कारण किसानों को अपनी फसल स्थानीय व्यापारियों को बेचनी पड़ती है। जिसकी वजह से किसानों को केंद्र सरकार की कृषि सम्मान योजना का फायदा नहीं मिल पाता है। दूसरी तरफ खराब बीज की वजह से भी किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ा। सरकार की यह दोनों योजनाएं किसानों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

पांच माह में ही एक हजार से ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की
मदद और पुनर्वसन मंत्री विजय वडेट्टेवार ने शुक्रवार को विधान मंडल के शीतकालीन सत्र में एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी। राज्य में जून से अक्टूबर के बीच 1076 किसानो ने खुदकुशी की। मौत को गले लगाने वाले किसानों में से 491 सरकारी सहायता के योग्य और 213 अयोग्य पाए गए हैं। वडेट्टेवार ने बताया कि मृत किसान के आश्रितों को एक लाख रुपए की आर्थिक सहायता दी जा रही है। बड़ा सवाल यही है कि किसान खुदकुशी न करें, इसके लिए क्या उपाए किए जा रहे हैं।

किसानों की मांग, तेलंगाना सरकार का मॉडल लागू करे सरकार
स्वाभिमानी शेतकरी संगठन के नेता राजू शेट्टी ने कहा कि सिर्फ कर्जमाफी से समस्या नहीं सुलझेगी। किसान को उपज की वाजिब कीमत मिलनी चाहिए। किसानों के हित में काम करने वाले जयाजीराव सूर्यवंशी ने कहा कि तेलंगाना सरकार किसानों को खाद बीज खरीदने के लिए प्रति एकड़ दस रुपए आर्थिक सहायता देती है। तेलंगाना म़ॉडल यहां भी लागू करना चाहिए। इससे किसानों को साहूकारों-माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के चंगुल से निजात मिलेगी। मौसमी मार से फसल खराब हुई तो किसानों पर बोझ नहीं बढ़ेगा।

महाराष्ट्र की कॉटन बेल्ट विदर्भ इलाके में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा
महाराष्ट्र में कपास उत्पादक किसानों की आत्महत्या दर ज्यादा है। जानकारी के अनुसार आधे से ज्यादा किसान विदर्भ इलाके के हैं। जिसे महाराष्ट्र की कॉटन बेल्ट के रूप में भी जाना जाता है। इस इलाके में 2020 के जनवरी महीने से लेकर नवंबर तक ही तकरीबन 1230 किसानों ने आत्महत्या की थी। मराठवाड़ा के सूखे इलाके वाली जगहों पर 693 किसानों ने आत्महत्या की है। जबकि उत्तर महाराष्ट्र में तब यह आंकड़ा 322 किसानों का रहाएनसीआरबी : अकेले महाराष्ट्र में कृषि क्षेत्र की 38 प्रतिशत मौतें हुईं
वर्ष 2020 में 2019 की अपेक्षा किसानों (किसान और कृषि मजदूर) की आत्महत्याओं के मामले 4 फीसदी और कृषि मजदूरों की आत्महत्या के मामले 18 फीसदी बढ़े हैं। भारत में आत्महत्या पर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 4,006 आत्महत्याओं के साथ महाराष्ट्र देश में पहले नंबर पर रहा। कृषि क्षेत्र में हुई आत्महत्याओं में अकेले महाराष्ट्र में देश की करीब 38 प्रतिशत मौतें हुईं।

 

 

 

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