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नेहरू की सोच ने देश को चीन के साथ युद्ध में हराया

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भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध को कोई नहीं भूल सकता है। 20 अक्टूबर से 21 नवबंर चले इस युद्ध के पीछे के कारणों का खुलासा लेफ्टिनेंट कर्नल रोहित अग्रवाल ने किया है। रोहित अग्रवाल ने 20 सालों तक भारतीय सेना के अहम पदों पर काम किया है। 

लेफ्टिनेंट कर्नल रोहित अग्रवाल ने ट्वीट पर लिखा है कि 1962 में चीन ने युद्ध अचानक से नहीं किया था। यह पंडित नेहरू की दुनिया के बारे में बनायी हुई सोच में जीने का परिणाम था, जिसमें उन्होंने दूसरों की सलाह पर ध्यान नहीं दिया।

नेहरू ने किसी की सलाह नहीं मानी- देश के पहले प्रधानमंत्री  नेहरू ने सुरक्षा के मामले में देश के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल और 1957 से 1961 के बीच चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ थिमैया की सलाहों को सुनने और समझने से इंकार कर दिया। देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए इन दोनों ने ही पंड़ित नेहरु को चीन को लेकर भारत के सैन्य क्षमता के बारे में समय-समय पर आगाह किया, लेकिन नेहरू ने इनकी सलाह को तवज्जो नहीं दी, जिसका परिणाम 1962 में चीन से युद्ध के रूप में देखना पड़ा।

सरदार पटेल की नेहरू को सलाह लौह पुरुष सरदार पटेल ने देश की एकता और अखंडता के लिए विराट कार्य किया, उन्होंने पांच सौ से अधिक राजा रजवाड़ों को एक सूत्र में पिरोने के लिए हर वह कदम उठाया जो जरूरी था। उनके लिए हर समय एक ही लक्ष्य था कि देश की सीमाओं को सुरक्षित रखा जाए। 15 दिसंबर, 1950 को अंतिम सांस लेने से कुछ दिन पहले 07 नवबंर, 1950 को उन्होंने पंड़ित नेहरू को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने भारत चीन के संबंधों पर नेहरू को अपनी सोच के बारे में बताया था। 

पत्र में सरदार पटेल लिखते हैं कि चीन जिस तरह तिब्बत में अपनी उपस्थित बढ़ाता जा रहा है और वहां पर सैन्य कार्रवाई कर रहा है, उससे चीन की मंशा पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। उन्होंने लिखा कि इसके विपरीत चीन को भारत का मित्र मानने पर आप (नेहरु) आमादा हैं। चीन का विश्वास प्राप्त करने के लिए भारत ने उसकी संयुक्त राष्ट्रसंघ की सदस्यता का पुरजोर समर्थन किया, लेकिन चीन हम पर विश्वास नहीं करता है। उन्होंने चीन को नमकहराम तक कहा।

सरदार पटेल ने पत्र में चीन के चरित्र का भी पूरा चित्रण किया। उन्होंने लिखा कि चीन एक कम्युनिष्ट राष्ट्र के साथ-साथ साम्राज्यवादी प्रवृत्ति का है। आज तक भारत की उत्तर-पूर्व की सीमा हिमालय और चीन के अपने अंदरूनी दिक्कतों से सुरक्षित रहीं, लेकिन जिस तरह से चीन में वर्तमान शासन व्यवस्था के तहत काम हो रहा उससे हमारे लिए इस क्षेत्र में चिंताएं बढ़ रहीं हैं। दूसरी तरफ उत्तर पश्चिम की सीमा पर भी अस्थिरता है। इस तरह से भारत के सामने एक साथ दो सीमाओं को सुरक्षित करने की चुनौती है।

सीमाओं को सुरक्षित रखने के लिए सरदार पटेल ने नेहरू को क्रमवार कई उपायों का सुझाव दिया। इसमें सैन्य क्षमता के विकास के लिए सैनिकों की संख्या बढ़ाने से लेकर सैन्य साजो सामान के आधुनिकीरण की सलाह शामिल थी। साथ में उन्होंने यह भी लिखा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में रेल, रोड और पुल आदि के निर्माण के ढांचागत विकास से सेना का सीधा फायदा तो होगा ही, साथ ही साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वालों का लगाव भी भारत के साथ बढ़ेगा।

सरदार पटेल ने सीमावर्ती क्षेत्रों में व्यापार को बढ़ावा देने के लिए Trade gate खोलने की भी सलाह दी थी।

लेकिन देश के गृहमंत्री की सलाह को प्रधानमंत्री नेहरू ने अनदेखा कर दिया। नेहरू की इस अपरिपक्वता का परिणाम रहा कि 1962 के युद्ध में भारत को चीन के हाथों जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा।

जनरल थिमैया की नेहरू को सलाह- सरदार पटेल की मृत्यु के सात साल बाद, भारतीय सेना की कमान संभालने वाले कोडन्डेरा सुबैया थिमैया ने चीन की तुलना में भारत की सैन्य क्षमता को लेकर प्रधानमंत्री नेहरू और रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन से सीधा संवाद किया, लेकिन नेहरू ने इस पूरे प्रकरण में अपनी सरकार की लाज बचाने के लिए राजनीति की और जनरल थिमैया को अलग थलग कर दिया। 

1959 में चीन ने पाकिस्तान से गैरकानूनी ढंग से अक्साई चीन अपने कब्जे में ले लिया और घोषणा कर दी कि मैकमोहन रेखा को सीमा रेखा नहीं मानता है और तिब्बत उसका अखंड हिस्सा है। ऐसे में जनरल थिमैया को चीन की दस्तक भारत की सीमा पर दिखाई देने लगी। इस चुनौती पूर्ण माहौल से निपटने के लिए जनरल ने उत्तरी पूर्व सीमा पर ‘लाल किला’ सैन्य अभ्यास के माध्यम से सेना की क्षमता का सही अंदाजा लगाया। मेजर जनरल एसपीपी थ्रोट के नेतृत्व में चले इस सैन्य अभ्यास का निष्कर्ष था कि सेना में सैनिकों के साथ साजो सामान की भारी कमी है। इस समय सेना की स्थिति बहुत ही खराब थी, इसका बजट कम कर दिया गया था। भारत जैसे देश के लिए नेहरू ने मात्र 305 करोड़ रुपये का बजट दिया था। यह बातें Thimayya : An Amazing Life नाम की पुस्तक में लिखी हुई हैं। जनरल थिमैया ने यह सारी बातें रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन को बताईं, लेकिन कृष्ण मेनन, जनरल की बात सुनने को तैयार नहीं थे। क्योंकि, लेफ्टिनेट कर्नल रोहित अग्रवाल बताते हैं कि इसके विपरित रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन और प्रधानमंत्री नेहरू देश को बता रहे थे कि चीन से भारत को कोई खतरा नहीं है, भारत हर चुनौती से निपटने के लिए तैयार है।

आखिर में जनरल थिमैया ने रक्षामंत्री को क्रास करके सीधे प्रधानमंत्री नेहरू से सेना की स्थिति के बारे में बात किया। रक्षा मंत्री को जब पता चला कि जनरल ने सीधे प्रधानमंत्री से बात कर तो उन्होंने जनरल थिमैया की फटकार लगाई। ऐसे में थिमैया ने अपना त्यागपत्र रक्षा मंत्री को सौंप दिया। राजनीतिक बवाल से बचने के लिए 31 अगस्त 1959 की शाम को नेहरू ने जनरल थिमैया को बुलाकर समझाया कि वह त्यागपत्र वापस ले लें और आश्वासन दिया कि वह इस मामले में उचित कदम उठाएंगे। थिमैया ने अपना त्यागपत्र वापस ले लिया लेकिन यह बात प्रेस में लीक हो गई, जिससे संसद में हंगामा खड़ा हो गया। जिस बात को नेहरू छिपाना चाहते थे उस पर संसद में बयान देना पड़ा-

नेहरु ने संसद में पूरे प्रकरण के बारे में गलत जाकारी दी, उन्होंने यह नहीं बताया कि जनरल थिमैया को आखिर किस मुख्य कारण से इस्तीफा देना पड़ा था, जिसे उन्होंने वापस लिया।

इसी भाषण के दौरान उन्होंने संसद और राष्ट्र को बताया कि रक्षा उत्पादन काफी अच्छा है, देश की सेना चाक-चौबंद है और भारत की सीमाएं सुरक्षित हैं।

नेहरू ने जनरल थिमैया के इस्तीफे को भावनाओं के अतिरेक में उठाया गया कदम बताया, जिस पर प्रो. रंगा और टी एस ए चेट्टीयार जैसे कांग्रेसी संसद सदस्यों ने सवाल उठाया, लेकिन नेहरू ने उनकी बात भी नहीं सुनी।

पंडित नेहरू ने अपने चहेते जनरल बी एम कौल का आउट आफ टर्न प्रमोशन करके पूरे नेपा क्षेत्र को बी एम कौल के नेतृत्व में कर दिया। 

इस तरह से देश के प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री और सेना प्रमुख की बात को नजरदांज ही नहीं किया बल्कि उनकी सलाह के विपरित काम किया। नेहरू के इस दुस्साहस का परिणाम हुआ कि भारत को 1962 में हार का सामना करना पड़ा।

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