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प्रधानमंत्री मोदी के ‘डर’ से एक हो रहे विरोधी !

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पूर्वोत्तर में त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के परिणामों में भाजपा और सहयोगी दलों की जीत ने देश की राजनीति में बड़े बदलाव की बुनियाद रख दी है। पानी पी-पी कर एक दूसरे को कोसने वाली राजनीतिक पार्टियां और दल एक मंच पर आने को आतुर हैं। समाजवादी पार्टी, बीएसपी, आरजेडी, INLD, आरएलडी और DMK जैसी पार्टियां अपना अस्तित्व बचाने की जद्दोजहद में जुट गई हैं।

दरअसल बीते चार सालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी और सहयोगी दल 5 राज्यों से बढ़कर 21 राज्यों की सत्ता पर काबिज हो चुकी है। भाजपा और सहयोगियों की एक के बाद एक जीत ने जहां विरोधियों के जनाधार को ध्वस्त किया है वहीं अपने जनाधार का विस्तार किया है। प्रधानमंत्री मोदी की ‘सबका साथ, सबका विकास’ नीति की लोगों में स्वीकार्यता ऐसी हुई है कि धुर विरोधी भी एक होने को मजबूर हो गए हैं।

एक हो गई सपा-बसपा !
2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जबरदस्त जीत हासिल की थी, जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी की जबरदस्त हार हुई थी। इसके बाद से ही सपा-बसपा में गठबंधन होने की खबरें आ रही थीं। अब यह तय हो चुका है कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी 23 साल पुरानी दुश्मनी के बाद साथ आ रहे हैं। हालांकि मायावती ने उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा से गठबंधन की खबरों को गलत बताया है, लेकिन अपने उम्मीदवार भी नहीं उतारे हैं। जाहिर है राज्यसभा और प्रदेश विधान परिषद के आने वाले चुनावों में सपा और कांग्रेस के साथ ‘सहयोग’ के दरवाजे खोल दिये हैं।

क्या होगा असर?
सियासी समीकरण के लिहाज से देखें तो गोरखपुर और फूलपुर चुनाव में कागज पर दोनों ही दलों के मिलन से मजबूती दिख रही है, परन्तु हकीकत ये है-

  • 2014 के लोकसभा चुनाव में गोरखपुर से बीजेपी को पांच लाख 39 हजार 137 वोट मिले थे, वहीं सपा को दो लाख 26 हजार और 344 वोट और बसपा को एक लाख 76 हजार 412 वोट मिले थे। गोरखपुर के बीजेपी उम्मीकदवार योगी आदित्यंनाथ को बसपा और सपा के वोट मिलने के बाद भी एक लाख 36 हजार 371 वोट ज्याबदा मिले थे।
  • फूलपुर लोकसभा सीट पर 2014 के चुनाव में बीजेपी को 5 लाख 3 हजार और 564 वोट मिले थे, वहीं सपा को 1 लाख 95 हजार 256 और 1 लाख 63 हजार 710 वोट मिले थे। सपा-बसपा के वोट मिलने के बाद भी बीजेपी के केशव मौर्य को 1 लाख 44 हजार 598 वोट ज्या दा मिले थे।
  • इससे पहले उत्तर प्रदेश में 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें महज 176 सीटें मिलीं थी। जबकि बीजेपी, अपना दल और दो अन्य सहयोगियों ने मिलकर 2017 के चुनाव में 325 सीटें जीती हैं।

ओवैसी-केसी राव का तीसरा मोर्चा
तीसरा मोर्चा बनाने की नूरा-कुश्ती भारत की राजनीति में पिछले करीब तीस सालों से चल रही है। इससे पहले सात बार और प्रयास हो चुके हैं, लेकिन ये सफल साबित नहीं हुए हैं। तेलंगाना के सीएम और टीआरएस के प्रमुख केसी राव ने कहा, ‘’हमने पहले भी दशकों तक उनकी सरकारों को देखा है। देश की मौजूदा राजनीति में बदलाव की जरूरत है। कांग्रेस और बीजेपी से अलग विकल्प तैयार करने की आवश्यकता है।‘’ केसीआर के इस बयान को सबसे पहले असदुद्दीन ओवैसी ने भी समर्थन किया। इसके बाद पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने उन्हें फोन करके अपनी स्वीकृति दी। झारखंड की पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने भी केसीआर के साथ तीसरे मोर्चे बनाने के लिए अपना समर्थन दिया।

क्या होगा असर?
इन चारों दलों का जनाधार अपने-अपने प्रदेश में ही है। AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी तमाम कोशिशों के बावजूद आंध्र प्रदेश की दो लोकसभा सीटों से अधिक अपना प्रभाव नहीं बढ़ा पाए। महाराष्ट्र और यूपी के लोकल बॉडी चुनावों में थोड़ी बहुत सफलता मिली है लेकिन वह नगण्य है।
केसी राव का जनाधार उनके अपने प्रदेश तेलंगाना में तो अवश्य है, लेकिन उनके चेहरे का अन्य राज्यों में कुछ खास असर नहीं होगा। दूसरी ओर ममता बनर्जी की टीएमसी और हेमंत सोरेन की झारखंड मुक्ति मोर्चा की पहुंच भी अपने ही राज्यों तक सीमित है।

  • 2009 के लोकसभा चुनाव के पहले वाम मोर्चे ने बीएसपी, बीजेडी, टीडीपी, AIADMK, जेडीएस, HJC, और एमडीएमके के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील मोर्चा बनाया, पर नतीजा अच्छा नहीं रहा। चुनाव से पहले इस मोर्चे के सदस्यों की संख्या 102 थी जो घटकर 80 रह गईं थीं।
  • 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले 2013 में राजनीतिक दल ‘गैर बीजेपी और गैर कांग्रेस मोर्चा’ खड़ा करने के लिए कवायद की गई। इनमें 4 वामपंथी दलों के साथ सपा, जेडीयू, AIADM, जेडीएस, झारखंड विकास मोर्चा, असम गण परिषद और बीजडी शामिल थे। हर बार की तरह इस बार भी नाकाम साबित हुआ।

ममता बनर्जी को पीएम मोदी का डर !
देश में वाममोर्चा के गढ़ रहे त्रिपुरा के चुनावी परिणाम पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार के लिए खतरे की घंटी हैं। त्रिपुरा में महज पांच साल के भीतर शून्य से शिखर तक पहुंचने वाली भाजपा ने जिस तरह वाममोर्चा के इस लाल किले को ढहा दिया है उसका असर पश्चिम बंगाल विधानसभा के 2021 के चुनावों पर पड़ना तय है। खासकर तब जबकि भाजपा उपचुनाव में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रही है और वामपंथी दलों को पीछे ढकेलते हुए दूसरे स्थान पर काबिज हो चुकी है।

राष्ट्रीय जनता दल के साथ हेमंत सोरेन
21 फरवरी, 2018 को झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) प्रमुख लालू प्रसाद यादव से जेल में मुलाकात की। हेमंत सोरेन के साथ कुणाल षाडंगी ने भी लालू यादव से मुलाकात की। मुलाकात के बाद हेमंत सोरेन ने कहा भी कि लालू जी ने साथ मिल कर काम करने को कहा है और महागठबंधन के स्वरूप पर चर्चाएं चल रही हैं। समय आने पर इसे सार्वजनिक किया जाएगा। ऐसे में कयास लगा जा रहे हैं कि आने वाले दिनों में बिहार की तर्ज पर झारखंड में जेएमएम और राजद अन्य दलों के साथ मिलकर कोई गठबंधन बनाएं।

कांग्रेस और लेफ्ट के एक साथ आने के संकेत
त्रिपुरा में मिली हार के बाद देश की राजनीति से लेफ्ट साफ होता हुआ नजर आ रहा है। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2014 तक लेफ्ट का वोटर उससे दूर होता दिखा है। पिछले 14 सालों के संसदीय चुनावों पर गौर करें तो लेफ्ट का न सिर्फ वोट शेयर लगातार गिरता जा रहा है बल्कि उसकी सीटों में भी जबरदत गिरावट आई है।

वर्ष 2004 2009 2014
CPI 10 04 01
CPM 43 16 09
वोट शेयर 7 प्रतिशत 4 प्रतिशत 2.5 प्रतिशत

लेफ्ट का जनाधार 2004 से 2014 तक आते आते खत्म होने के कगार पर पहुंच गया है। जहां 2004 में लेफ्ट पार्टियों का वोट शेयर 7 प्रतिशत हुआ करता था, वो 2004-2014 के बीच केवल 2.5 प्रतिशत आकर सिमट गया है। इस औसत के अनुसार आने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव में लेफ्ट का वोटर शेयर 1 प्रतिशत से भी कम हो जाएगा।

त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय के चुनाव परिणामों से पहले लेफ्ट और कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के पक्ष में नहीं था, लेकिन अब परिस्थियां बदल गई हैं। लेफ्ट और कांग्रेस के एक बार फिर मंच पर आने की संभावना बढ़ गई है। हालांकि पश्चिम बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था, लेकिन इस गठबंधन की करारी शिकस्त हुई थी।

कांग्रेस-एनसीपी का साथ आना तय
महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस का एक साथ आना तय लग रहा है, लेकिन ये भाजपा को कड़ी टक्कर दे पाएंगे, इसपर संदेह है। बीते साढ़े तीन सालों में महाराष्ट्र में जितने भी लोकल बॉडी चुनाव हुए हैं उनके परिणामों को देखें तो ये साफ है कि सीएम देवेंद्र फड़णवीस की लोकप्रियता बढ़ी है और भाजपा का जनाधार भी लगातार बढ़ता चला जा रहा है।

कांग्रेस-डीएमके का बन रहा समीकरण
तमिलनाडु में यूपीए और कांग्रेस की स्थिति ‘तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्हीं से लड़ाई’ वाली रही है। यपीए सरकार की श्रीलंका नीति से परेशान डीएमके ने मजबूरी में 2014 का चुनाव कांग्रेस से अलग लड़ा और करारी हार हुई। इसके बाद 2016 के विधानसभा चुनाव में दोनों ही दल एक साथ आ गए फिर भी AIADMK के मुकाबले इनकी बुरी स्थिति रही थी और हार हुई। अब एक बार फिर सुगबुगाहट है कि दोनों ही दल एक साथ आ जाएंगे और चुनावी गठबंधन बनाएंगे, लेकिन ये तय है कि पीएम मोदी ने एआईएडीएमके के दोनों ही धड़ों को जब से एक कर दिया है तभी से तमिलनाडु की राजनीति में कांग्रेस-डीएमके गठबंधन के लिए मुश्किल हालात हो गए हैं।

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