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देश ही नहीं दुनिया के सर्वमान्य नेता बने पीएम मोदी, अब बनेंगे विश्व शांति दूत, दुनिया के लोकप्रिय नेताओं में पहले से ही हैं नंबर वन

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भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता देश ही नहीं दुनिया में लगातार बढ़ रही है। कई सारे सर्वे एवं अप्रूवल रेटिंग में वह लंबे समय से दुनिया के लोकप्रिय नेताओं में पहले से ही नंबर वन हैं। उनकी इन्हीं लोकप्रियता एवं वैश्विक स्तर पर सभी देशों के साथ अच्छे संबंध बनाने की पहल की वजह से अब उन्हें विश्व शांति दूत के रूप में देखा जाने लगा है। मेक्सिको के राष्ट्रपति आंद्रियास मैनुएल लोपेज ओब्राडोर ने विश्व शांति के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कमीशन बनाने की बात की है और सुझाव दिया है कि इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शामिल किया जाए। यह अनायास नहीं है कि मेक्सिको के राष्ट्रपति को पीएम मोदी की याद आ गई हो बल्कि इसमें पीएम मोदी के आठ साल की कड़ी मेहतन छुपी हुई है जिसके तहत उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को न केवल मजबूत किया बल्कि वैश्विक स्तर पर सभी देशों के साथ अच्छे संबंध विकसित किए। कोरोना काल में भारत ने जिस तरह से बिना भेदभाव के दुनिया के अधिकतर देशों को कोविड वैक्सीन मुहैया करवाया उससे भारतीय दर्शन ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ की भावना वैश्विक स्तर पर पहुंची और पीएम मोदी की छवि एक ग्लोबल लीडर के तौर पर बनी। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से तमाम ग्लोबल रेटिंग में पीएम मोदी वैश्विक स्तर पर सबसे लोकप्रिय नेता बने हुए हैं। यह अलग बात है कि देश के प्रधानमंत्री का वैश्विक स्तर पर बढ़ता कद तथाकथित वामपंथियों एवं लिबरल गैंस को रास नहीं आ रहा है।

मेक्सिको के राष्ट्रपति के प्रस्ताव से पीएम मोदी बनेंगे विश्व शांति दूत

मेक्सिको के राष्ट्रपति आंद्रियास मैनुएल लोपेज ओब्राडोर ने विश्व शांति के लिए एक अंतरराष्ट्रीय कमीशन बनाने की बात की है और सुझाव दिया है कि इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शामिल किया जाए। ओब्राडोर चाहते हैं कि पांच साल तक दुनिया में शांति कायम करने के लिए एक कमीशन बनाया जाए। वह इसमें मोदी, ईसाइयों के धर्म गुरु पोप फ्रांसिस और यूनाइटेड नेशंस के महासचिव एंतोनियो गुतरेस को रखना चाहते हैं। ओब्राडोर का कहना है कि वह यूनाइटेड नेशंस के सामने अपना यह प्रस्ताव रखेंगे। मेक्सिको के राष्ट्रपति ने जिस तरह सिर्फ तीन लोगों के पैनल का सुझाव दिया और फिर उसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शामिल किया, उससे पता चलता है कि उनकी नजर में भारत की कितनी अहमियत है। मेक्सिको के राष्ट्रपति ने अगर वैश्विक नेता के रूप में प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिया है तो इसकी अपनी खास वजहें हैं। प्रधानमंत्री के रूप में वैश्विक मंचों पर मोदी की अपील का असर तो है ही साथ ही भारत की अपनी खासियतों का भी इसमें बड़ा रोल है।

दुनिया भर में युद्धों को रोकने के लिए पहल

इस शांति आयोग का उद्देश्य दुनिया भर में युद्धों को रोकने के लिए एक प्रस्ताव पेश करना और कम से कम पांच साल के लिए एक संधि करने के लिए समझौता करना होगा। मेक्सिको के राष्ट्रपति के प्रस्ताव के अनुसार वे तीनों मिलेंगे और जल्द ही हर जगह युद्ध को रोकने का प्रस्ताव पेश करेंगे, कम से कम पांच साल के लिए एक संधि करने के लिए किसी समझौते पर पहुंचेंगे। ताकि दुनिया भर की सरकारें अपने लोगों, विशेष रूप से पीड़ित लोगों की मदद करने के लिए खुद को समर्पित कर सकें। इससे सभी देशों को यह अहसास होगा कि हमारे पास बिना तनाव, बिना हिंसा और शांति के पांच साल हैं।

भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विश्व शांति के पक्ष में रहा

भारत दुनिया का एक बड़ा लोकतांत्रिक देश है। कोरिया वॉर से लेकर गुट निरपेक्ष आंदोलन तक, भारत हमेशा ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विश्व शांति के पक्ष में रहा है। भारत ने हमेशा ही इस बात पर बल दिया है कि किसी भी देश को दूसरे देश की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। यूक्रेन युद्ध में अमेरिका की अगुवाई वाले नैटो और रूस के बीच तनाव किस कदर बढ़ा यह सबने देखा। उसके बाद तमाम देशों पर दबाव आया कि वे किसी न किसी पक्ष की ओर खड़े हों, लेकिन भारत ने अपनी तटस्थ नीति बनाए रखी। भारत ने युद्ध का विरोध किया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ लाए गए प्रस्तावों पर वोटिंग से बाहर रहा।

शांति के लिए चीन, रूस और अमेरिका को आमंत्रित किया

युद्ध जैसी कार्रवाइयों को समाप्त करने का आह्वान करते हुए मेक्सिको के राष्ट्रपति ने चीन, रूस और अमेरिका को शांति का रास्ता खोजने के लिए आमंत्रित किया और उम्मीद जताई कि तीनों देश मध्यस्थता को सुनेंगे और इसे स्वीकार करेंगे जैसा कि हम प्रस्तावित कर रहे हैं। उन्हें बताया कि उनके टकराव के कारण यह सब हुआ है। उन्होंने विश्व आर्थिक संकट को जन्म दिया है, उन्होंने मुद्रास्फीति में वृद्धि की है और भोजन की कमी, अधिक गरीबी पैदा की। और सबसे बुरी बात यह है कि एक साल में टकराव के कारण इतने सारे इंसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। यही उन्होंने एक साल में किया है। ओब्रेडोर के अनुसार, प्रस्तावित युद्धविराम ताइवान, इजराइल और फिलिस्तीन के मामले में समझौतों तक पहुंचने में मदद करेगा और अधिक टकराव को बढ़ावा देने वाला नहीं होगा। इसके अलावा, उन्होंने आग्रह किया कि दुनिया भर की सभी सरकारों को संयुक्त राष्ट्र के समर्थन में शामिल होना चाहिए, न कि नौकरशाही तंत्र जिसमें प्रस्ताव और पहल पेश किए जाते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति में भारत का बढ़ता दायरा

भारत क्वॉड और ब्रिक्स जैसे रणनीतिक और आर्थिक मंचों का अहम सदस्य है। भारत ने एक और अहम ग्रुप I2U2 के जरिए भी अपनी भूमिका का दायरा बढ़ाया है। इस ग्रुप में भारत, इजरायल, अमेरिका और यूएई शामिल हैं। इस साल जुलाई में इसकी पहली शिखर बैठक हुई थी। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती अहमियत का अंदाजा इस बात से भी लगता है कि पिछले दिनों जब अमेरिका की पहल पर इजरायल और अरब देशों ने हाथ मिलाया तो उस कूटनीतिक पहल में भारत भी शामिल था।

इजरायल-फिलिस्तीन विवाद और पीएम मोदी की भूमिका

मेक्सिको के राष्ट्रपति ने अपने बयान में यूक्रेन और ताइवान के अलावा इजरायल-फिलिस्तीन विवाद का भी जिक्र किया। इजरायल-फिलिस्तीन विवाद में भारत की अपनी खास नीति रही है। भारत ने फिलिस्तीन के बंटवारे के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का विरोध किया था। जिन 13 देशों ने उस प्रस्ताव का विरोध किया, उनमें भारत इकलौता गैर-अरब देश था। 1948 के उसी प्रस्ताव के जरिए इजरायल का वजूद सामने आया था। लेकिन जवाहर लाल नेहरू के जमाने में ही भारत ने इजरायल को मान्यता भी दी थी। उसके बाद से भारत का रुख कमोबोश फिलिस्तीन के पक्ष में रहता आया। हाल के वर्षों पीएम मोदी के नेतृत्व में इजरायल से संबंध कहीं ज्यादा मजबूत हुए हैं। फिर भी संतुलन की नीति अब भी बनी हुई है। मेक्सिको के राष्ट्रपति ओब्राडोर ने मोदी, पोप और गुतरेस की सदस्यता वाले कमीशन के जरिए अगर इजरायल-फिलिस्तीन विवाद सुलझने की उम्मीद जताई है तो इसके पीछे अरब देशों के साथ ही इजरायल से भी भारत के उतने ही मजबूत संबंधों की तस्वीर होगी। ओब्राडोर ने यह उम्मीद की है कि प्रधानमंत्री मोदी इस इलाके में शांति कायम करने में मददगार साबित होंगे।

PM chairing the 7th Governing Council Meeting of NITI Aayog, in New Delhi on August 07, 2022.

चाणक्य नीति से मेल खाता है मोदी के कामकाज का तरीका

ग्लोबल लीडर के तौर पर दुनिया के बड़े मंचों पर प्रधानमंत्री मोदी की धाक बढ़ती जा रही है। दुनिया में आतंक के बढ़ते प्रभाव और अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अब दुनिया के अन्य हिस्सों में भी युद्ध आहट सुनाई दे रही है। इन सब के बीच दुनिया की निगाहें देश के प्रधानमंत्री मोदी पर आ टिकी हैं। इतिहासकार मानते हैं कि मोदी के कामकाज का तरीका चाणक्य की नीति से मेल खाता है। इसी नीति के सहारे सैकड़ों साल पहले चंद्रगुप्त मौर्य ने शक्तिशाली मौर्य साम्राज्य की नींव रखी थी। नरेंद्र मोदी ने जब जापान का दौरा किया तो काशी को क्योटो के तर्ज पर विकसित करने का समझौता किया था। इसी के साथ ही वाराणसी मोदी की विदेश नीति का केंद्र बनकर उभरा। दरअसल, बौद्धधर्म को मानने वालों के लिए वाराणसी का काफी महत्व है। यहां सारनाथ में महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। बौद्ध धर्म को मानने वाले देश अब तक अलग-थलग थे। मोदी सभी बौद्ध देशों को अपने साथ एक मंच पर लाकर भारत को नई महाशक्ति के रूप में विकसित करना चाह रहे हैं। इससे चीन को घेरने के साथ-साथ एक कड़ा संदेश दिया जा सकता है। उनकी यह विदेश नीति चाणक्य की नीतियों का ही एक नमूना है।

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