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शीर्ष तीन संवैधानिक पदों को सुशोभित कर रहे हैं आरएसएस के सदस्य,  संगठन की देशभक्ति के सामने नेहरू भी थे नतमस्तक

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वर्तमान में देश में संवैधानिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण चार पदों में से तीन पर आरएसएस से जुड़ी शख्सियत पदस्थापित हैं। देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तीनों ही आरएसएस के सदस्य रहे हैं। 1925 में बने आरएसएस का राष्ट्र निर्माण में अहम योगदान है। स्वयं सेवक संगठन के तौर पर आरएसएस के सदस्यों का देश निर्माण में अप्रतिम योगदान है। हालांकि गाहे-बगाहे आरएसएस को लेकर राजनीति भी होती रहती है। विशेषकर कांग्रेस के नेता आरएसएस को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं, लेकिन उन्हें आरएसएस को लेकर पंडित जवाहर लाल नेहरू के विचारों को भी जानना चाहिए। दरअसल देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू राष्ट्र निर्माण में आरएसएस के योगदान से बेहद प्रभावित थे और 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद उन्होंने आरएसएस को राजपथ की परेड में शामिल होने का न्योता भी दिया था।

पंडित नेहरू ने RSS को राजपथ परेड में किया था शामिल
गणतंत्र दिवस की परेड में आमतौर पर सेना, पैरामिलिट्री, एनसीसी और स्कूलों से दस्ते होते हैं, लेकिन 1963 की परेड में RSS का शामिल होना एक नई बात थी। दरअसल RSS ने चीन के साथ हुई लड़ाई में फौज की मदद की थी। इस बात का आभार जताने के लिए उन्हें प्रधानमंत्री नेहरू ने परेड में हिस्सा लेने का न्योता दिया था। गणतंत्र दिवस पर फौज की टुकड़ियों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी पर होने वाली परेड में हिस्सा लिया। उस दिन राजपथ पर 3500 स्वयंसेवकों ने परेड की थी।  आलोचना होने पर नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गया।”

पाक के हमले के बाद नेहरू ने RSS से मांगी थी सहायता
देश की आजादी के ठीक बाद जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मदद मांगी थी। संघ के स्वयंसेवक मदद के लिए जम्मू-कश्मीर गए भी थे। दरअसल स्वतंत्रता के बाद महाराजा हरि सिंह जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ विलय के समझौते पर साइन नहीं कर रहे थे, जबकि शेख अब्दुल्ला इसके लिए उन पर दबाव डाल रहे थे। नेहरू दुविधा में थे। तभी पाकिस्तान ने अचानक हमला कर दिया और उसके सैनिक उधमपुर तक आ गए थे। चूंकि हमला अचानक हुआ था, इसलिए सेना के पास उस समय तत्काल पहुंचने के लिए अत्याधुनिक उपकरण नहीं थे। उस समय नेहरू जी ने तत्कालीन आरएसएस प्रमुख गुरु गोलवल्कर को पत्र लिखकर आरएसएस के स्वयंसेवकों की मदद मांगी थी।

देश के सीमा की निगरानी भी करता रहा है आरएसएस
संघ के स्वयंसेवकों ने अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पाकिस्तानी सेना की गतिविधियों पर बगैर किसी प्रशिक्षण के लगातार नजर रखी थी। यह काम न नेहरू-माउंटबेटन सरकार कर रही थी, न हरिसिंह सरकार। उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर की सीमा लांघने की कोशिश की, तो सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए लड़ाई में प्राण दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश रहे के टी थॉमस कर चुके हैं तारीफ
4 जनवरी, 2018 को केरल के एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज केटी थॉमस भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों के मुरीद हैं। उनके अनुसार- संविधान, लोकतंत्र और सेना के बाद आरएसएस की वजह से देश के लोग सुरक्षित हैं। अगर किसी संगठन को आपातकाल से देश को मुक्त कराने का क्रेडिट दिया जाना चाहिए, तो मैं आरएसएस को दूंगा। उन्होंने साफ कहा कि देश में एक संविधान है, लोकतंत्र है और सेना है। इन तीनों के अलावा चौथा आरएसएस है, जिसने देश को मजबूत किया है। इन चारों की वजह से हमारा देश सुरक्षित है।

हर आपदा में RSS के सदस्यों ने निभाई है भूमिका
संघ ने 1971 के उड़ीसा चक्रवात और 1977 के आंध्र प्रदेश चक्रवात में राहत कार्यों में बड़ी भूमिका निभाई है। विभाजन के दंगे भड़कने पर, जब नेहरू सरकार पूरी तरह हैरान-परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे। भोपाल त्रासदी से लेकर 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों से लेकर गुजरात के भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा तक – संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया है।  भारत में ही नहीं, नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में आरएसएस ने अपनी भूमिका निभाई है।

जाति-धर्म से परे राष्ट्र निर्माण है RSS का उद्देश्य
आरएसएस की विचारधारा को मामने वाले लोगों का स्पष्ट मानना है कि हिन्दू धर्म में सामाजिक समानता के लिये संघ ने दलितों और पिछड़े वर्गों को मन्दिर में पुजारी पद के प्रशिक्षण का पक्ष लिया है। उनके अनुसार सामाजिक वर्गीकरण ही हिन्दू मूल्यों के हनन का कारण है। महात्मा गांधी ने 1934 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शिविर की यात्रा के दौरान वहां पूर्ण अनुशासन देखा और छुआछूत नाम की चीज नहीं देखी। इसका दूसरा पहलू ये है कि संघ से जुडे सेवा भारती ने जम्मू कश्मीर से आतंकवाद से परेशान 57 अनाथ बच्चों को गोद लिया जिनमें 38 मुस्लिम और 19 हिंदू हैं।

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