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एनपीए पर झूठ बोल रही कांग्रेस का रघुराम राजन ने खोला कच्चा चिट्ठा

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रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के खुलासे ने कांग्रेस के झूठ का पर्दाफाश कर दिया है। गैर निष्पादित परिसंपत्तियों यानि एनपीए को लेकर संसदीय समिति को भेजे जवाब में उन्होंने मनमोहन सिंह की सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। राजन ने साफ किया है कि घोटालों की जांच के कारण सरकार ने निर्णय लेने में देरी की जिससे एनपीए बढ़ता गया। राजन ने अपने जवाब में इसके लिए ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ को जिम्मेदार बताया है। रघुराम राजन के अनुसार 2006-08 के बीच यूपीए के कामकाज ने भारत की बैंकिंग संरचना में एनपीए में वृद्धि की।

आपको बता दें कि डॉ. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता वाली संसदीय प्राक्कलन समिति ने राजन से इस बारे में उपस्थित होकर जवाब देने को कहा था। राजन के जवाब से साफ हो गया कि यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक ऐसी सरकार का जिसने भारतीय बैंकिंग प्रणाली को पंगु बना दिया।

गौरतलब है कि जब वर्तमान मोदी सरकार ने देश की कमान संभाली तो यह आंकड़ा लगभग 2 लाख करोड़ बताया जा रहा था। 2017 के मध्य तक यह 10.5 लाख करोड़ रुपये हो गया था। प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में इस बात का खुलासा भी किया था कि पब्लिक सेक्टर के बैंकों में एनपीए 36 प्रतिशत की जगह 82 प्रतिशत है। उन्होंने कहा कि जब हमारी सरकार 2014 में बनी। हमने बैंकों से कड़ाई की तो बैंकों से सही आंकड़े सामने आने लगे। उन्होंने बताया कि कागजों पर 2 लाख करोड़ बताया गया लेकिन वास्तव में वह 9 लाख करोड़ रुपए था।

कांग्रेस और उनसे ताल्लुक रखने वाली कंपनियों के लूट का आलम यह था कि आजादी से लेकर वर्ष 2008 तक बैंकों ने 18 लाख करोड़ रुपए कर्ज दिए, जबकि 2008 से लेकर 2014 तक के बीच बैंकों ने 52 लाख करोड़ रुपए कर्ज दिए। आप समझ सकते हैं कि 60 सालों में 18 लाख करोड़ और 6 साल में 52 लाख करोड़, लगभग दो गुने से भी कहीं ज्यादा लोन बांटे गए।

अब सत्य ये है कि 9 लाख 52 हजार करोड़ एनपीए की रकम में से आधे वित्तीय प्रणाली में वापस आ चुके हैं। बैंकों के फंसे हुए नौ लाख करोड़ रुपये के एनपीए में से 4 लाख करोड़ रुपये वापस आ चुके हैं।

2014 से पहले जिन 12 बड़े डिफॉल्टरों को लोन दिया गया, उनके खिलाफ हमने कार्रवाई की। इसी तरह 27 और बड़े लोन खाते हैं, जिनमें 1 लाख करोड़ रुपए का एनपीए है। इसकी वापसी का भी इंतजाम किया जा रहा है।

कंपनी मामलों के मंत्रालय के अनुसार ऋणशोधन औरदिवाला संहिता (IBC)-2016 बनाए जाने से बैंकों के फंसे हुए नौ लाख करोड़ रुपये के कर्ज के आधे से कम की रकम प्रणाली में वापस आ चुकी है।
आपको बता दें कि सरकार ने डूबे हुए कर्ज को लेकर दो तरह की रणनीति अपनाई है। एक तरफ, सरकार ने आईबीसी को अमल में लाया है, जिसके तहत छह माह की अवधि के लिए ऋणशोधन समाधान की प्रक्रिया शुरू की गई है, तो दूसरी तरफ सरकार ने सरकारी बैंकों के पुनर्पूजीकरण के लिए 2.11 लाख करोड़ रुपये के पैकेज को मंजूरी दी है।

जब 4 वर्षो बाद स्थिति मोदी सरकार के हाथ में है तब जाकर पंजाब नेशनल बैंक अपने शेयरों में आयी गिरावट को झेल सका है। यही नीरव मोदी का मामला और 82 प्रतिशत की एनपीए भारत की जनता और देशी विदेशी निवेशकों को 2/3 वर्ष पहले पता लगता तो जहां पंजाब नेशनल बैंक का दिवालिया होना तय था, वहीं पर भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा कर 1991 से भी ज्यादा बुरी स्थिति में पहुंच जाती।

मोदी सरकार ने तमाम ऐसे कदम उठाए हैं, जिनके बाद बैंकों का पैसा हड़पने वालों की रातों की नींद उड़ गई है। अब कोई भी कारोबारी सपने में भी घोटाला करने की सोच भी नहीं सकता है

एलओयू जारी करने से रोक
केंद्र सरकार के सख्त निर्देशों के चलते भारतीय रिजर्व बैंक ने सभी बैंकों को लेटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) जारी करने से रोक दिया है। रिजर्व बैंक की अधिसूचना के बाद अब कोई भी कॉमर्सियल बैंक आयात के लिए ट्रेड क्रेडिट के तौर पर एलओयू और एलओसी जारी नहीं कर पाएगा। जाहिर है कि नीरव मोदी ने इसी तरह के एलओयू के जरिए पीएनबी को हजारों करोड़ का चूना लगाया है। दरअसल लेटर ऑफ अंडरटेकिंग एक तरह की बैंक गारंटी होती है, जो विदेशों से होने वाले निर्यात के भुगतान के लिए जारी की जाती है। इसका मतलब यह है कि अगर लोन लेने वाला इस लोन को नहीं चुकाता है, तो बैंक पूरी रकम ब्याज समेत बिना शर्त चुकाएगा। एलओयू को बैंक एक निश्चित समय के लिए जारी करता है। बाद में जिसे एलओयू जारी किया गया, उससे पूरा पैसा वसूला जाता है।

50 करोड़ से अधिक के NPA की जांच सीबीआई को
मोदी सरकार ने सभी सरकारी बैंकों को 50 करोड़ से अधिक के NPA की जांच करने और कुछ भी गड़बड़ी मिलने पर मामला सीबीआई को सौंपने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून, फेमा, और आयात-निर्यात नियमों के उल्लंघन से जुड़े मामलों की जांच में प्रवर्तन निदेशालय और राजस्व खुफिया निदेशालय को शामिल करने का भी निर्देश दिया है। बड़े वित्तीय लोन देने में बैंकों के बड़े अधिकारी शामिल होते हैं, इसके लिए मोदी सरकार ने सभी बैंकों को वरिष्ठ अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही सभी बैंकों से अपनी कमियों को पहचानने और इन्हें दूर करने का निर्देश दिया है।

 

 

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