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बड़े मियां-छोटे मियां ने देश के अर्थतंत्र से किया खिलवाड़ !

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21 दिसम्बर 1963 को संसद में डॉ राममनोहर लोहिया ने कहा, ”सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है।” स्पष्ट है कि कांग्रेस के शासन काल में ही भ्रष्टाचार और सिंहासन का जबरदस्त नाता बन चुका था। बीतते वक्त के साथ यह और भी गहरा होता गया और यूपीए-2 के शासनकाल में यह अपने चरम पर पहुंच गया। स्थिति ऐसी आ गई कि जिन शीर्ष पदों पर देश भरोसा करता है वही भ्रष्टाचार के कृत्यों में गहरे तक लिप्त होता चला गया। तत्कालीन वित्त मंत्री पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति चिदंबरम का भ्रष्टाचार इसी श्रेणी में आता है।

आइये हम एक नजर डालते हैं कि पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने देश के अर्थतंत्र के साथ कैसे खिलवाड़ किया।

चिदंबरम ने दिया 80-20 नीति का नाजायज लाभ
अगस्त, 2013 में यूपीए-2 की सरकार ने 80:20 नियम लागू किया था। इस नियम के तहत व्यापारी उसी स्थिति में सोने का आयात कर सकते थे, जबकि उन्होंने अपने पिछले आयात का 20 प्रतिशत सोना निर्यात किया हो। लेकिन इस योजना के क्रियान्वयन में चिदंबरम ने ‘अनैतिक’ रास्ता अपनाया और अपने चहेतों को लाभ पहुंचाया। दरअसल 16 मई 2014 को जब लोकसभा चुनाव के परिणाम आ रहे थे और कांग्रेस नीत यूपीए की हार हो चुकी थी, उसी दिन तत्कालीन वित्त मंत्री ने 7 कंपनियों को गोल्ड स्कीम मंा एंट्री दे दी। सवाल उठ रहे हैं कि पी चिदंबरम ने ऐसा क्यों किया?

नीरव मोदी, मेहुल चोकसी का पी चिदंबरम कनेक्शन
80:20 स्कीम के तहत जिन 7 कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया उनके भगोड़ो घोटालेबाज नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से संबंध हैं। दरअसल इस योजना का इस्तेमाल चोकसी सहित अन्य जूलर्स ने ब्लैक मनी की राउंड ट्रिपिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए किया। राउंड ट्रिपिंग का मतलब है कि कालाधन देश के बाहर जाता है और व्हाइट बनकर वापस लौटता है। बड़ी बात ये है कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम इससे अवगत थे।

सीएजी ने चिदंबरम के फर्जीवाड़े पर उठाए थे सवाल
अब सवाल उठता है कि जिस दिन कांग्रेस हार रही थी उस दिन सात कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया? सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि सीएजी ने वित्त मंत्रालय को यह जानकारी दे दी थी कि सीएजी रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि जूलर्स को 1 अमेरिकी डॉलर की कमाई के लिए सरकार को ड्यूटी के रूप में 221.75 रुपये का खर्च वहन करना पड़ता है। गौरतलब है कि नवंबर 2014 में मोदी सरकार ने सोने के आयात पर प्रतिबंध को खत्म करते हुए 80:20 स्कीम को खत्म कर दिया था।

पी चिदंबरम के कार्यकाल में क्यों बनाए गए नियम?
सवाल ये कि आखिर 2013 में यूपीए सरकार ये नियम लेकर आई क्यों? तो क्या पी चिदंबरम ने इसका गलत इस्तेमाल करवाने के उद्देश्य से ही ये नियम लाया था? हालांकि यह अभी जांच का विषय है, परन्तु साफ है कि इसमें पी चिदंबरम का ‘हाथ’ अवश्य रहा होगा। एक के बाद एक ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जिनमें पी चिदंबरम का हाथ है या फिर कांग्रेस कनेक्शन का।

सात अन्य मामलों में दर्ज हो सकती है FIR
दरअसल पी चिदंबरम यूपीए सरकार में मई 2004 से 2009 और अगस्त 2012 से मई 2014 के बीच दो बार वित्तमंत्री थे। ईडी ने पी चिदंबरम के वित्तमंत्री रहते हुए दिये गए कुल 2721 एफआइपीबी क्लीयरेंस की पड़ताल की थी। इनमें 54 मामले संदेहास्पद पाए थे। ईडी ने इन सभी मामले की फाइल एफआइपीबी से तलब की और उनकी गहन पड़ताल की। यही नहीं, एफआइपीबी के तत्कालीन अधिकारियों को भी तलब कर पूछताछ की गई। अंत में कुल आठ ऐसे मामले मिले जिनमें सीधे तौर पर गड़बड़ी के सबूत मिले थे। ईडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा जिन आठ मामले को सीबीआइ के पास जांच शुरू करने के लिए भेजा गया है, उन सभी मामलों में एफआइपीबी क्लीयरेंस पाने वाली कंपनियों की ओर से कार्ति चिदंबरम और उनकी सहयोगी की कंपनियों में निवेश किया गया था।

पी चिदंबरम ने दी थी अवैध अनुमति
एफआइपीबी क्लीयरेंस में घोटाले का खुलासा एयरसेल-मैक्सिस डील की जांच के दौरान हुआ था। एफआइपीबी नियम के तहत वित्तमंत्री केवल 600 करोड़ रुपये तक विदेशी निवेश को मंजूरी दे सकते थे, इससे अधिक के क्लीयरेंस के लिए आर्थिक मामलों का मंत्रिमंडलीय समिति की मंजूरी जरूरी है। लेकिन वित्तमंत्री रहते हुए पी चिदंबरम ने एयरसेल में मैक्सिस ग्रुप को 3500 करोड़ रुपये के विदेश निवेश को मंजूरी दे दी। इसके बाद एफआइपीबी क्लीयरेंस की सभी फाइलों की पड़ताल शुरू हुई, तो एक-के-बाद एक घोटाले के सूत्र उजागर होने लगे।

कार्ति चिदंबरम को दी गई थी रिश्वत
मामला 2007 का है। उस वक्त पी चिदंबरम वित्त मंत्री थे। आरोप है कि उन्होंने ही कार्ति का काम आसान बनाया था। गौरतलब है कि 2007 में आईएनएक्स मीडिया को विदेश से 305 करोड़ रुपए प्राप्त करने के लिए विदेशी निवेश संवर्द्धन बोर्ड की मंजूरी देने में अनियमित्ताएं हुईं। उस समय पी चिदबंरम वित्त मंत्री थे। इसी मामले में सीबीआई ने आईएनएक्स मीडिया, इसके डायरेक्टरों पीटर और इंद्राणी मुखर्जी के साथ कार्ति चिदंबरम का नाम भी जोड़ा गया था। इंद्राणी मुखर्जी और कार्ति चिदंबरम की आमने-सामने पूछताछ के बाद इंद्राणी मुखर्जी ने साफ किया कि वह अपने पति पीटर मुखर्जी के साथ नॉर्थ ब्लॉक में चिदंबरम से मिली थी। टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट के अनुसार इंद्राणी ने यह भी माना कि उसकी दिल्ली के एक होटल में कार्ति से मुलाकात हुई थी जहां उसने रिश्वत के रूप में 1 मिलियन डॉलर की मांग की।

कद्दावर नेता को ट्रांसफर किए गए थे 1.8 करोड़
मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जांच कर रहे प्रवर्तन निदेशालय ने दावा किया है कि कार्ति ने एक प्रभावशाली नेता के बैंक अकाउंट में 1.8 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे। देश के पूर्व वित्ते मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति ने इन रुपयों को रॉयल बैंक ऑफ स्कॉटलैंड (RBS) की चेन्नई स्थित शाखा में अपने अकाउंट से ट्रांसफर किए थे। टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट अनुसार जिस शख्स को रुपये ट्रांसफर किए गए, वह कद्दावर नेता हैं और उन्होंने अपने दशकों के राजनीतिक करियर में केंद्र सरकार में बहुत ही अहम जिम्मेदारियों को निभाया है। हालांकि अफसरों ने उस नेता का नाम नहीं लिया। उन्हों ने कहा कि इससे जांच प्रभावित हो सकती है। ED अफसरों का कहना है कि यह रकम 16 जनवरी, 2006 से लेकर सितंबर 2009 के बीच पांच किस्तों में उस नेता को ट्रांसफर की गई।

फरार हीरा कारोबारी की दोहरी नागरिकता की अनदेखी
यूपीए सरकार ने कई अनियमितताएं कीं जिनका एक के बाद एक खुलासा होता जा रहा है। यूपीए-2 के दौरान हीरा कारोबारी जतिन मेहता की दोहरी नागरिकता को अनदेखा किया और उन्हें विदेशी पासपोर्ट पर देश की यात्रा करने की अनुमति दी। बैंकों को 6700 करोड़ का चूना लगाकर भागने वाले मेहता के पास 2012-13 के बीच दो पासपोर्ट थे। ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के अनुसार यूपीए सरकार ने ना सिर्फ इस तथ्य को अनदेखा किया कि मेहता ने अवैध रूप से दो पासपोर्ट रखे हुए है, लेकिन उन्हें अपने विदेशी पासपोर्ट पर भारत की यात्रा करने की इजाजत दी। खुलासे के अनुसार मेहता के पास भारतीय पासपोर्ट के अलावा सेंट किट्स और नेविस, जो कि टैक्स हेवेन है का भी पासपोर्ट का था। यह ध्यान देने वाली बात है कि भारतीय कानून दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता है।

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