Home विचार देश में आतंकवाद की जननी तो कांग्रेस है राहुल गांधी जी !  

देश में आतंकवाद की जननी तो कांग्रेस है राहुल गांधी जी !  

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सोमवार 26 फरवरी, 2018  को कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक की एक सभा में कहा कि जब हम सत्ता में थे तो आतंकवाद नहीं था, लोग नहीं मारे जाते थे, आज हर दिन हमारे सेना के जवान शहीद हो रहे हैं। राहुल गांधी की बात में इतनी सच्चाई जरूर है कि हमारे जवान भी मारे जा रहे हैं, लेकिन सच यह भी है कि आतंकवाद पर करारा प्रहार भी किया जा रहा है। कश्मीर में बीते साल ही 200 से अधिक आतंकियों को ढेर किया जा चुका है। इसके साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुआई में आतंकवाद के विरूद्ध विश्व जनमत तैयार हो गया है और इस पर विश्वव्यापी कार्रवाई की नीति बनाई जा रही।

दरअसल आतंकवाद देश के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है, लेकिन इसके लिए जिम्मेवार कौन है? अगर मुद्दे की गहराई में जाएं तो स्पष्ट है कि इसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेवार है। हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसके सटीक कारण हैं। उत्तर से लेकर दक्षिण, पूरब से लेकर पश्चिम, जहां कहीं भी आतंकवाद फैला है इसका कारण कांग्रेस है। आइये इस रिपोर्ट के जरिये इसका विश्लेषण करते हैं।

कांग्रेस ने कश्मीर में बढ़ाया आतंकवाद
‘फूट डालो और राज करो’ की नीति सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ने अपने गठन की शुरुआत से अपना रखी है। कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद के पलने-बढ़ने के पीछे भी कांग्रेस की यही कुत्सित सोच है। 1948 में महाराजा हरि सिंह ने जब कश्मीर का भारत में संपूर्ण विलय करना चाहा तो देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने मिलकर धारा 370 और 35A जैसे प्रावधान कर कश्मीर को विशेष दर्जा दिला दिया। यहीं से कश्मीर में अलगाववाद की भावना पनपी थी क्योंकि कश्मीर के अलग संविधान हो गए, अलग झंडा हो गया और अधिकतर मामलों में स्वायत्तता मिल गई। इसके बाद भी कश्मीर में जब भी शांति की उम्मीद जगी कांग्रेस ने अलगाववाद की आग में घी डालने का काम किया। कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर चुप्पी साधे रखी और इस्लाम के नाम पर कट्टरता को बढ़ने दिया।

1965, 1971 में जब भारत ने पाकिस्तान से युद्ध जीत लिया तब भी कांग्रेस ने कश्मीर के मुद्दे को हल करने का प्रयास नहीं किया। मुस्लिम वोटों के चक्कर में तुष्टिकरण की नीति अपनाई और यह आज अपने चरम पर पहुंच गया है। 1990 के दशक में जब देश कांग्रेस के शासन के अधीन था तो कश्मीर में हिंदुओं के साथ जुल्मो सितम किए जा रहे थे। उन्हें खदेड़ा जा रहा था, महिलाओं का उत्पीड़न किया जा रहा था, पांच लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा, लेकिन कांग्रेस अपने वोट बैंक के लिए चुप थी। उसी दौर में आतंकवाद अपने चरम पर पहुंच गया था, लेकिन कांग्रेस ने उसे बढ़ने दिया। आज कांग्रेस की इसी तुष्टिकरण की राजनीति का नतीजा है कि कश्मीर में कट्टरपंथी जमात हावी हो चुका है।

कांग्रेस ने पंजाब में बढ़ाया अलगाववाद
पंजाब में आतंकवाद क्यों कर बढ़ा, कैसे बढ़ा? … इसकी तह में जाएं तो पता लगेगा कि कांग्रेस ने पंजाब को अलगाववाद-आतंकवाद की आग में झोंक दिया। 1970 के दशक में कांग्रेस ने अकाली दल को किनारे लगाने के लिए खालिस्तानी आतंकवादियों की पीठ थपथपायी थी। कांग्रेस के तत्कालीन महामंत्री राजीव गांधी ने भिंडरावाले जैसे आतंकी सरगना को सन्त की उपाधि दी थी और उसे दिल्ली बुलाकर अनावश्यक महत्व दिया था। इसी भिंडरावाले ने कांग्रेसी सिख नेताओं, खास तौर से ज्ञानी जैल सिंह की शह पर स्वर्णमन्दिर परिसर में स्थित अकाल तख्त पर कब्जा कर लिया था और वहां सैकड़ों हथियारबन्द आतंकियों ने अपना अड्डा बना लिया था। यह 1982-83 का समय था, जब पंजाब में कांग्रेस के दरबारा सिंह की ही सरकार थी। ये आतंकी ही आगे चलकर कांग्रेस के लिए भस्मासुर सिद्ध हुए। पहले तो कांग्रेस ने इन आतंकियों को इज्जत बख्शी और उन पर लगाम नहीं लगायी, लेकिन जब आतंकवाद हद से अधिक बढ़ गया तो स्वर्णमन्दिर पर बहुत गलत तरीके से हमला किया। उन्होंने इस बात का ध्यान नहीं रखा कि सीधे स्वर्णमन्दिर पर हमला करने से सिख बंधुओं की भावनाएं बुरी तरह आहत होंगी।

वास्तव में यह इन्दिरा गांधी की सहज प्रवृत्ति थी कि पहले तो किसी समस्या को हद से ज्यादा बढ़ जाने देती थीं और फिर उसको हल करने के नाम पर एकदम उग्र कार्रवाई करके उसे उचित ठहराती थीं। यही उन्होंने स्वर्णमन्दिर में घुसे हुए सिख आतंकवादियों को समाप्त करने के लिए किया। जून 1984 में आपरेशन ब्लू स्टार के नाम से हुई इस कार्रवाई में आतंकी सरगना भिंडरावाले मारा गया और उसके सभी साथी भी ढेर कर दिए गए। लेकिन देश को और स्वयं कांग्रेस को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इन्दिरा गांधी की हत्या हुई, जिसके बाद हजारों सिखों का कत्ल किया गया।

कांग्रेस ने पूर्वोत्तर में लगाई मजहबी आग
पूर्वोत्तर में अलगाववाद और आतंकवाद के लिए कांग्रेस की नीतियां जिम्मेवार हैं। 1972 में कांग्रेस सरकार को असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड को अलग करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस की सत्ता आधारित नीतियों के कारण असम और त्रिपुरा में बंगाली शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1961 में ही यह संख्या छह लाख के ऊपर थी, आज यह बढ़कर ढाई करोड़ हो गई है। उस दौर में नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस की केंद्र सरकार ने जबरन बंगाली शरणार्थियों को समाहित करने का दबाव डाला तो तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलई ने इसका विरोध किया, लेकिन जवाहर लाल हरू ने विकास मद के दिये जाने वाले केंद्रीय अनुदान में भारी कटौती की धमकी दी। परिणास्वरूप राज्य सरकार को घुटने टेकने पड़े।

ये असम के मूल निवासियों के साथ कांग्रेस का सबसे क्रूर मजाक था। इसके नतीजे में असम हिंसा की आग में जल उठा। कांग्रेस की शह पर असम में बांग्लादेशियों को असम के लोगों की जमीन पर बसने की इजाजत दी गई । कांग्रेस ने मिजो खासी जातियों को लुभाने के लिए इन्हें बसाया लेकिन इस क्षुद्र राजनीति के कारण 1980 में अवैध बांग्लादेशियों के विरूद्ध हिंसा भड़क उठी, लेकिन इंदिरा गांधी ने इसे क्रूरता पूर्वक दबा दिया। इतना ही नहीं इंदिरा गांधी ने 1983 में लाखों अवैध बांग्लादेशियों का नाम मतदाता सूची में दर्ज करव दिया। मूल निवासियों ने विरोध किया, मतदान 10 प्रतिशत ही हो सका। लेकिन इंदिरा गांधी की निरंकुश नीति के कारण लोगों की भावनाओं का खयाल नहीं किया गया और वहां अवैध घुसपैठियों को छिपाने के लिए अवैध परिव्रजन (पहचान अधिकरण) अधिनियम पारित कर दिया। आज असम में बांग्लादेशियों की आबादी 34 प्रतिशत हो गई है जिसकी जिम्मेदार कांग्रेस ही है।

ग्रेटर नागालैंड, बोडोलैंड और स्वाधीन अहोम जैसे आंदोलन कांग्रेस की कुत्सित नीतियों का ही परिणाम है। दरअसल इस देश को बड़ा ही विचित्र लोकतंत्र बना दिया गया है। कांग्रेस ने जहां हर विघटनकारी तत्वों को पनाह दिया है वहीं देशभक्तों सजा दी है। यहां कोई भी संगठन हाथ में बंदूक लेकर अपनी अनुचित मांग रखता है और अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर ऐसा करने दिया जाता है। हाल में ही सेना प्रमुख बिपिन रावत ने जब इसी मुद्दे को उठाया तो उन्हें कांग्रेस समेत तमाम तथाकथित सेक्युलर जमात ने चुप कराने की कोशिश की। लेकिन जुलाई 2017 में पाकिस्तान के लश्कर ए तैयबा ने साफ कहा है कि वह पूर्वोत्तर को भारत से मुस्लिम आबादी के जोर पर अलग कर बांग्लादेश में मिलाना चाहता है।

कांग्रेस ने दक्षिण में द्रविड़नाडु का दिया साथ
1940 में जस्टिस पार्टी के ईवी रामास्वामी ‘पेरियार’ ने दक्षिण भारत के राज्यों को मिलाकर द्रविड़नाडु की मांग की थी। पहले ये मांग सिर्फ तमिलभाषी क्षेत्रों के लिए थी, लेकिन बाद में द्रविडनाडु में आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, ओडिशा और तमिलनाडु को भी शामिल करने की बात कही गई। हालांकि  5 अक्टूबर,  1963 में हुए 16वें संविधान संशोधन में देश की अखंडता की कसम की शर्त को भी शामिल किया गया कि कोई भी राजनीतिक दल भारत देश में तभी राजनीति कर पाएगा, जब वो भारत की अंखडता को स्वीकार करेगा। लेकिन केंद्र सरकार ने वर्ष 2017 में जब पशु क्रूरता का निवारण अधिनियम में बदलाव किया तो कांग्रेस ने इसे आधार बनाकर देश के टुकड़े करने की मांग उठा दी। सबसे पहले केरल में यूथ कांग्रेस के एक नेता ने सरेआम गाय के बछड़े को काटा और उसके मांस बांटे। इसके बाद कांग्रेस के नेताओं ने फिर से द्रविड़नाडु की मांग उठा दी। सोशल मीडिया पर इसको लेकर कैंपेन भी चलाए गए, सिर्फ इसलिए कि मोदी सरकार द्वारा लाए गए इस कानून को आधार बनाकर सत्ता की सीढ़ी चढ़ी जा सके। जाहिर है कांग्रेस अपनी कुत्सित राजनीति के कारण देश के टुकड़े करने से भी परहेज नहीं करती है।

पश्चिम में फैलाई दंगों की आग
पश्चिम भारत में भी यदा-कदा अलगाववाद की आग को हवा देती रही है कांग्रेस। महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में नक्सलवाद को बढ़ावा देने में भी कांग्रेस नेताओं के हाथ सामने आए हैं, वहीं गुजरात के सरक्रीक को लेकर कांग्रेस की राजनीति भी देश के टुकड़े करने की रही है। पाकिस्तान से लगती गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्रों को पाकिस्तान में मिलाने को लेकर कई बार आंदोलन पर कांग्रेस ने चुप्पी इसलिए साध ली कि वहां मुस्लिम आबादी अधिक है। इसी तरह 1993 में मुंबई में हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद भी कांग्रेस की भूमिका संदिग्ध रही। मुंबई में दंगे भड़कने दिए और हिंदुओं पर जुल्म किए।  

 

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