Home समाचार हर बात पर विरोध-प्रदर्शन कर खुद को अलग-थलग कर रहे हैं मुसलमान?

हर बात पर विरोध-प्रदर्शन कर खुद को अलग-थलग कर रहे हैं मुसलमान?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह कई बार कह चुके हैं कि नागरिकता संशोधन कानून भारतीय मुसलमानों को किसी भी तरह प्रभावित नहीं करता है। इस कानून का देश में रहने वाले मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बावजूद विपक्षी पार्टियां जान-बूझकर मुसलमानों को भड़का रही हैं। वोटबैंक के कारण मुसलमानों के दिल में डर फैलाया जा रहा है। उन्हें हिंसा और तोड़फोड़ के लिए उकसाया जा रहा है। ध्रुवीकरण की राजनीति के चक्कर में मुसलमान इन पार्टियों के बहकावे में आकर हिंसक प्रदर्शन और तोड़फोड़ कर रहे हैं। इससे देश की संपत्ति का तो नुकसान हो ही रहा है, वे खुद देश के अन्य समुदायों की नजर में अलग-थलग पड़ते जा रहे हैं।

नागरिकता संशोधन कानून में साफ है कि यह देश में रहने वाले मुसलमानों के बारे में नहीं है। नागरिकता संशोधन कानून का इस देश में रह रहे मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है। यह उन देशों के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है। यह तीन देशों के अल्पसंख्यकों को एक तय अवधि के बाद नागरिकता देने की बात करता है, देश के किसी अल्पसंख्यकों की नागरिकता लेने या छीनने की बात नहीं करता। यह दूसरे देश के मुसलमानों को यहां शरण लेने से भी नहीं रोकता है। साफ है कि इस एक्ट के जरिए किसी की नागरिकता नहीं छीनी जा रही है, ये एक्ट नागरिकता देने के लिए है। इसके बावजूद साजिश के तहत विपक्षी पार्टियां देश के अल्पसंख्यकों को बरगला रही हैं।

कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी पार्टियों ने इसका विरोध कर हिंसक गतिविधियों को बढ़ावा दिया, जिसकी वजह से हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं हुई हैं। सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया है। इसका खामियाजा तोड़फोड़ करने वालों को भुगतना ही पड़ेगा। जिस तरह से देश के मुसलमान सिर्फ मुस्लिम संबंधित मुद्दों पर धर्मनिरपेक्षता का नारा लगाकर सड़कों पर आ जाते हैं उससे बहुसंख्यक समुदाय के लोगों की नजर में उनके प्रति एक अलग ही धारणा बनती जा रही है। लोग मानने लगे हैं कि मुसलमान दूसरे समुदाय के साथ शांति से रह ही नहीं सकते। शांति के साथ तभी तक रहते हैं जब-तक अल्पसंख्यक रहते हैं। बहुसंख्यक होते ही दूसरे समुदाय वालों को परेशान करना शुरू कर देते हैं। इसका उदाहरण ज्यादातर मुस्लिम देशों में दूसरे समुदाय की कम होती आबादी है।

धर्म के आधार पर बंटवारे के बाद जहां पाकिस्तान में अन्य समुदाय की आबादी घटती चली गई वहीं भारत में बढ़ती गई। भारत में उन्हें बराबरी का अधिकार दिया गया, यहां तक की अल्पसंख्यकों के नाम पर अतिरिक्त सुविधाएं भी दी गईं। देश के बहुसंख्यकों को लगता है कि हमसे ज्यादा अधिकार इन अल्पसंख्यकों को है। फिर भी लगातार अल्पसंख्यक होने का रोना रोते हैं और खुद को पीड़ित बताते हैं।

अगर विभाजन के बाद मुस्लिम देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित नहीं किया होता तो उन्हें भागने की जरूरत ही नहीं पड़ती। अगर पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं को भी हिंदुस्तान के अल्पसंख्यकों की तरह सारे अधिकार मिले होते तो उन्हें अपना घर-बार और कारोबार छोड़कर भागना नहीं पड़ता। अब जब उन्हें जबरन धर्म परिवर्तन, प्रताड़ना और उत्पीड़न का शिकार होने के बाद मजबूरी में पाकिस्तान से हिंदुस्तान आना पड़ रहा है तो इसका विरोध होने पर हिंदुओं के मन में खटास पैदा हो रही है। कुछ हिंदुओं का तो यहां तक कहना है कि मुस्लिम समुदाय के लोग दर्जनों मुस्लिम देश जा सकते हैं लेकिन हिंदू कहां जाएंगे?

बात तो यहां तक हो रही है कि बेहतर जीवनस्तर और सुविधाओं के लिए भारत में घुसपैठ करने वाले पाकिस्तानी, बांग्लादेशी और रोहिंग्या मुसलमानों को यहां चुपके से बसाया जा रहा है। लाखों की संख्या में चोरी-छिपे मुस्लिम बहुल इलाकों में उनका राशन और आधार कार्ड तक बनाया जा रहा है। लेकिन जब बात हिंदुओं की आती है तो मुसलमान सड़क पर आ जाते हैं और तोड़फोड़ शुरू कर देते हैं। दुनिया भर में कहीं भी ये शांति से नहीं रह सकते।

इनको बढ़ावा देनी वाली पार्टियों के लिए भी सेकुलर का मतलब भी सिर्फ मुसलमान होता है। सेकुलर का जाप तभी करते हैं जब मुसलमानों की बात होती है। लेकिन जब मुसलमान दूसरे समुदाय के लोगों को प्रताड़ित करते हैं तो धर्मनिरपेक्षता की बात भूल ये सेकुलरवादी पार्टियां चुप्पी साध लेती हैं। मुसलमानों के खिलाफ हल्की-फुल्की घटना भी हो तो सारे अवार्ड वापसी वाले सेकुलर का बोर्ड लगाकर सड़कों पर उतर आते हैं।

आजादी के बाद से ही कांग्रेस और अन्य पार्टियां कई मुद्दों पर मुस्लिम ध्रुवीकरण के कारण बहुसंख्यक समुदाय को नाराज तो करती ही रही, साथ ही अल्पसंख्यकों में डर की भावना भरकर पिछड़ा बनाए रखी। इसमें कई मुस्लिम बुद्धिजीवी और बॉलीवुड के फिल्मकार भी मुद्दे को बिना जाने-समझे गलत जानकारी देकर लोगों को बरगलाते रहे। कई सेलिब्रिटी ने भी सोशल मीडिया पर अधकचरे ज्ञान का सबूत देकर लोगों को भड़काने का काम किया। सड़क पर उतर कर तोड़फोड़ करने वाले ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं कि वे किस बात पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। हिंसक प्रदर्शन करने वाले लोगों को सीएबी, सीएए और एनआरसी के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है। ऐसे में वे खुद को एक दायरे में सीमित करते जा रहे हैं।

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इससे बचने के लिए खुद मुस्लिम समाज के लोगों को आगे आना होगा और उन्हें झूठी अफवाहों पर ध्यान देना बंद करना होगा। उन्हें बताना होगा कि कुछ पार्टियों के दोगलेपन के चक्कर में नहीं फंसना है। इससे पहले कि कोई खतरनाक स्थिति पैदा हो या वैमनस्यता का जहर और फैले, उन्हें इसका सही इलाज ढूंढना ही होगा।

 

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