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सरकार को बदनाम करने के लिए लिबरल मीडिया और कांग्रेस फैला रही है भ्रम

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प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और रेल किराया को लेकर लिबरल मीडिया और कांग्रेस पार्टी लगातार झूठ फैलाकर सरकार को बदनाम करने की कोशिश कर रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि गरीब मजदूरों से किराया वसूला जा रहा है जबकि किराया देने के लिए उनके पास पैसे नहीं है, लेकिन हकीकत ये है कि राज्यों के अनुरोध पर ही मजदूरों को वापस भेजने के लिए रेल सेवा शुरू करने का फैसला किया है और इससे भी बड़ी बात यह है कि इन मजदूरों की वापसी का खर्च 85 फीसदी रेलवे और सिर्फ 15 फीसदी राज्यें सरकारों द्वारा वहन किया जा रहा है। प्वाइंट्स के जरिए जानिए कांग्रेस और लिबरल मीडिया की हकीकत। 

प्वाइंट नंबर 1-पहले सभी राज्य सरकारों ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया कि बसों से मजदूरों को लाना महंगा पड़ेगा इसलिए ट्रेन चलाकर उनको घर वापस पहुंचाया जाए।

प्वाइंट नंबर 2– केंद्र सरकार ने राज्यों की इस सलाह को टीम इंडिया की स्पिरिट को ध्यान में रखते हुए देश से अलग अलग हिस्सों से 100 श्रमिक ट्रेनें चलाने का फैसला किया। 

प्वाइंट नंबर 3 सामान्य समय में ट्रेन के किराए पर सरकार 43 प्रतिशत छूट देती है लेकिन इस आपात काल में सोशल डिस्टेंसिंग के कारण ट्रेनों में यात्रियों की संख्या कम है इसलिए रेल मंत्रालय ने 85 प्रतिशत की छूट दी है।

प्वाइंट नंबर 4- श्रमिक ट्रेनों के चलने से पहले सभी राज्य सरकारों ने यह माना था कि 15 प्रतिशत किराया देने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी, इसलिए रेल मंत्रालय ने सभी टिकट राज्य सरकार के स्थानीय प्रशासन को सौंप दिए।

 

प्वाइंट नंबर 5– महाराष्ट्र, केरल, पश्चिम बंगाल और झारखंड की राज्य सरकारों ने 15 प्रतिशत किराया खुद न देकर मजदूरों के ऊपर लाद दिया। केरल ने तो यहां तक कह दिया कि यह किराया केंद्र सरकार दे।

प्वाइंट नंबर 6-केंद्र सरकार से विपक्ष के शासन वाले राज्यों ने वादा खिलाफी की और टीम इंडिया की स्पीरिट को खत्म किया। आखिर पहले तैयार होने के बाद फिर अपने वायदे से मुकर क्यों गए। 

प्वाइंट नंबर 7- राज्य सरकारों के मुकरने के बाद सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर राजनीति शुरु कर दी और कहने लगीं कि कांग्रेस पार्टी किराये का खर्च उठाएगी, जबकि यह किराया राज्य सरकारों को देना है। 

प्वाइंट नंबर 8-आने वाले समय में कई ऐसी और भी ट्रेनें चलानी पड़ सकती है इसलिए केन्द्र सरकार किराये के ऐसे किसी मॉडल को नहीं अपना सकती है जिससे भविष्य में ट्रेन चलाना ही संभव न हो सके।

 

प्रवासी मजदूरों की घर वापसी और रेल किराया को लेकर लिबरल मीडिया और कांग्रेस भले ही भ्रम फैला रही है लेकिन हकीकत की पूरी कहानी ये है…

भारतीय रेलवे कर रहा है 85 फीसद खर्च

कांग्रेस द्वारा फैलाई जा रही झूठ की हकीकत ये है कि जरूरतमंद प्रवासी मजदूरों की घर वापसी के लिए  रेलवे 85% और राज्य सरकार सिर्फ 15% खर्चा उठा रही है। प्रवासी मजदूरों से एक भी पैसा नहीं लिया जा रहा है। इसके अलावा रेलवे यात्रा के दौरान खाना और पानी देने के साथ साथ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करके आधी क्षमता पर ट्रेन चला रहा है। खर्च में ट्रेन की वापसी किराया भी शामिल है। राज्य सरकरों को सिर्फ बचे हुए 15 प्रतिशत का ही भुगतान करना है, जो बहुत बड़ी रकम नहीं है। राज्य सरकारों को यह भार महज इस व्यवस्था में दायित्व सुनिश्चित करन के लिए दिया गया है चूंकि राज्य सरकार जाने वाले श्रमिकों की पहचान करती है, उनके स्वास्थ्य की स्क्रीनिंग करती है और उनकी आवश्यकताओं के हिसाब से उनकी जाने की प्राथमिकता तय करती है, इसलिए ही यह भार दिया गया है। 

राज्य सरकारों के आग्रह पर रेलवे का संचालन

देश में 23 मार्च से लॉकडाउन है और हवाई, रेल समेत यातायात के दूसरे साधन पूरी तरह हैं। प्रवासी मजदूरों को घर वापस लाने के मुद्दे को बिहार व झारखंड समेत कई राज्य सरकारों द्वारा बार बार उठाया गया जिसके बाद गृह मंत्रालय ने मजदूरों को वापस लाने की इजाजत दी है। केंद्र सरकार द्वारा रेल संचालन की अनुमति नहीं दी गई है तो फिर इसके लिए केंद्र सरकार जिम्मेदार कैसे है। 

राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित यात्रियों की ही घर वापसी

रेलवे केवल राज्य सरकारों द्वारा लाये गए एवं निर्धारित किए गये यात्रियों को ही स्वीकार कर रहे है। अन्य किसी यात्री समूह या व्यक्ति को रेल यात्रा करने की इजाजत नहीं है। इसके अलावा किसी भी स्टेशन पर कोई टिकट नहीं बेचा जा रहा है। रेलव केवल राज्य सरकारों द्वार मांगी गई रेलगाड़ी के अलावा और कोई गाड़ी नहीं चला रहा है। राज्य सरकारें जब गंतव्य के साथ जाने वालों की सूची देती हैं, तभी रेलवे उन लोगों के लिए विशेष ट्रेनों की व्यवस्था करती है।   

राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश में कांग्रेस 

कोरोना महामारी के संकट में भी कांग्रेस राजनीति करने से बाज नहीं आ रही है। प्रवासी मजदूरों की संख्या लाखों में है और इसका आंकड़ा राज्य सरकार के पास है। ऐसे में कांग्रेस का ये दावा सिर्फ हवा हवाई है क्योंकि कांग्रेस जानती है कि उसे पैसा नहीं देना है सरकार अपनी तरफ से ही पैसे चुकाएगी लेकिन लोगों की भावनाओं के साथ खेल राजनीति करना ही कांग्रेस का मसकद है। इस संबंध में सिर्फ और सिर्फ बयान जारी किया गया है। इसके लिए कोई रोडमैप नहीं है कि आखिर कैसे लोगों को पैसे देगी, मजदूरों की संख्या कितनी है इत्यादि। 

कांग्रेस शासित राज्य दें अपने हिस्से का किराया 

प्रवासी मजदूरों की वापस पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा बयान पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित है। कांग्रेस अध्यक्ष ने जो कुछ भी कहा है, उससे वास्तविक स्थिति में कोई खास बदलाव आने वाला नहीं है। क्योंकि, रेलवे पहले ही कुल भाड़े का 85 प्रतिशत खुद ही वहन कर रहा है। कांग्रेस पार्टी द्वारा मजदूरों के यात्रा भाड़े का खर्चा उठाने की बात कहने की बजाय यह बेहतर होता अगर वे अपनी राज्य सरकारों को ऐसे समय में राजनीति न करने और कांग्रेसी सरकारों के हिस्से में आने वाले भाड़े के शेयर को चुकाने का निर्देश देतीं।  

 

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