Home विचार विभाजनकारी और समझौतावादी हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

विभाजनकारी और समझौतावादी हैं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी

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देश के 125 करोड़ लोगों के जीवन की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी, लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के कंधों पर है। आजादी के बाद जनता के लिए घर, सड़क, रोशनी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा की जरूरतों को पूरा करने का काम सबसे पहले कांग्रेस पार्टी के कंधों पर आया, लेकिन 70 वर्षों में इन जरूरतों को पूरा करने का कोई मजबूत तंत्र भी कांग्रेस नहीं दे सकी, जिसकी आशा करोड़ों देशवासियों को इस दल के नेतृत्व से थी।

यहां प्रश्न उठता है कि कांग्रेस ऐसा करने में क्यों विफल रही? इस विफलता के मूल में कांग्रेस का नेहरू-गांधी परिवार के कब्जे में चले जाना है। इस कारण से कांग्रेस पर समझौतावादी, विभाजनकारी और ‘ सब चलता है’ की वैचारिक दृष्टि हावी हो गई, इस वैचारिक प्रवाह से कांग्रेस धीरे-धीरे देश से अधिक सत्ता को साधने और बनाये रखने के लिए समर्पित हो गई। आज कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में इसी वैचारिक प्रवाह से सत्ता को प्राप्त करना चाहती है, क्योंकि वह मानती है कि इन्हीं विचारों के बल पर दशकों तक सत्ता हाथ में रही है औऱ आगे भी सत्ता इसी बल पर प्राप्त होगी। यह समझना जरूरी है कि राहुल गांधी की समझौतावादी, विभाजनकारी औऱ ‘सब चलता है’ की सोच से देश के ज्वलंत प्रश्नों पर क्या समाधान निकलतें हैं-

देश में युवाओं के रोजगार के लिए 
देश के 125 करोड़ लोगों में से 65 प्रतिशत युवाओं के लिए, समृद्धशाली जीवन की पहली शर्त रोजगार है। अर्थव्यवस्था में रोजगार प्राप्त करने के लिए कृषि, उद्योग और सेवाओं का एक विस्तृत क्षेत्र है, लेकिन इसके लिए युवाओं को आधुनिक व्यवस्था में दक्ष होना जरूरी है। 2004 से 2014 तक राहुल गांधी की कांग्रेस सरकार के हाथों में देश की सत्ता थी, इन दस सालों में कांग्रेस ने ऐसा कोई तंत्र विकसित करने का काम नहीं किया, जिससे आज के इन युवाओं के पास किसी भी क्षेत्र में कौशल विकसित होता और रोजगार कर रहे होते। दूसरी बड़ी त्रासदी यह हुई कि उन दस सालों में कांग्रेस ने ऐसा कोई तंत्र नहीं बनाया जिससे अर्थव्यवस्था में पैदा हो रहे रोजगार के अवसर आदि का विवरण एकत्रित किया जा सके। आज, राहुल गांधी कांग्रेस के काम करने के तरीके के खोट को छिपाने के लिए जर्मनी के हैम्बर्ग में बोलते हैं कि रोजगार न मिलने से युवा मॉब लिचिंग और ISIS के आतंकवादी बन रहे हैं। अगर, राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस सत्ता के लिए देश के हितों से समझौते नहीं करती और वोट बटोरने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण के आधार पर देश के विभाजन की नीति नहीं अपनाती तो देश में युवाओं को रोजगार मिलने के पर्याप्त अवसर होते।

देश में महिलाओं की स्थिति के लिए
देश की आधी आबादी के लिए कांग्रेस 70 सालों में और विशेषकर 2004 से 2014 के बीच दस सालों में यदि कोई कारगर तंत्र स्थापित करती तो आज महिलाओं को स्थिति प्रशासन और समाज में पुरुषों के बराबर होती। राहुल गांधी आज कहते हैं कि पुरुषों का महिलाओं को देखने का नजरिया बदलना होगा, लेकिन राहुल गांधी ने पिछले दस सालों में महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए मिले सारे अवसरों पर कोई कदम नहीं उठाया। आज भी कांग्रेस की वर्किंग कमेटी में महिलाओं की संख्या नहीं के बराबर है। राहुल गांधी और कांग्रेस ने यदि महिलाओं को देखने का अपना नजरिया बदल दिया होता तो आज बात ही कुछ और होती। महिलाओं के मुद्दे पर राहुल गांधी के समझौतावादी नजरिए के कुछ मामले-

कांग्रेस के शासनकाल में 09 मार्च 2010 को राज्यसभा से संसद में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का विधेय़क पारित होने के बावजूद भी 4 सालों तक अपने सहयोगी दलों-समाजवादी, राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यू) के दबाव में संसद से पारित करवा कर कानून नहीं बना सके।

• आज 33 प्रतिशत महिला आरक्षण की मांग करने वाले राहुल गांधी ने 17 जुलाई 2018 को जब कांग्रेस वर्किंग कमेटी के 51 सदस्यों की घोषणा की तो उसमें  07 महिलाएं थी, जो मात्र 13 प्रतिशत हैं। यदि राहुल गांधी की मां, सोनिया गांधी को इस सूची से निकाल दिया जाए तो मात्र 11 प्रतिशत ही महिलाएं, कांग्रेस वर्किंग कमेटी में है।

• आज राहुल गांधी तीन तलाक के मामले पर लोकसभा से पारित विधेयक को राज्यसभा से पारित नहीं होने दे रहे हैं। इससे पूर्व 1984 में तत्कालीन कांग्रेस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सर्वोच्च न्यायलय के आदेश को कि मुस्लिम महिला शाहबानो को तलाक के बाद पति उसके खर्च के लिए धन दे, संसद में कानून लाकर रोक दिया।

वोट बैंक की राजनीति के लिए
कांग्रेस ने देश में सत्ता पाने और उसे बनाये रखने के लिए देश को धर्म और जाति के आधार पर वोट बैंक में बदल दिया। चुनावों के वक्त इस वोट बैंक से वोट निकालने के लिए कांग्रेस चेक की तरह तमाम तरह के हथकंडे इस्तेमाल करती रही, आज भी राहुल गांधी उसी वैचारिक प्रवाह में काम कर रहे हैं। गुजरात का चुनाव हुआ तो हिन्दुओं को लुभाने के लिए मंदिर-मंदिर माथा टेका और मुसलमानों के मुद्दों को छुआ तक नहीं जबकि कर्नाटक चुनाव में मस्जिदों और दरगाहों के चक्कर लगाये। राहुल गांधी की कांग्रेस अपने इस वोट बैंक की राजनीति को धर्मनिरपेक्षता का चोला पहनाकर ढकने का काम करती है। एक तरफ कांग्रेस धर्म के नाम पर लोगों को बांटने का काम करती है तो दूसरी तरफ जातियों के आधार पर हिन्दुओं को विभाजित करके अपनी सत्ता वापस पाना चाहती है। कांग्रेस के इस दोहरे चरित्र के बाद भी राहुल गांधी जर्मनी के हैम्बर्ग में कहते हैं कि यदि समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का काम नहीं किया गया तो, मुख्यधारा से कटे हुए लोग ISIS में जैसे आतंकवादी संगठनों में शामिल हो जाएंगें।

राहुल गांधी देश में विभाजनकारी और समझौते की विचारधारा के प्रतीक हैं, जिसने 70 सालों तक शासन करके देश को हमेशा घुटनों के बल चलना ही सिखाया है।

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