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अगर आप के स्कूल ‘अच्छे’ तो क्यों घट गए ‘बच्चे’!

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भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने को अपनी राजनीति का केंद्र बताने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल लगातार किसी न किसी तरह के घोटाले में पड़ते जा रहे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया एक तरफ दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था की तारीफों के पूल बांधते नहीं थक रहे वहीं दूसरी तरफ आंकड़े इन सब बातों से इतर नजर आते हैं।


कुछ स्कूलों की खूबसूरत तस्वीरों और गतिविधियों की बातें कर सोशल मीडिया पर इस तरह का माहौल बनाया गया जैसे कि दिल्ली के स्कूलों में केजरीवाल सरकार कमाल कर रही है लेकिन असल हालात तो कुछ और ही हैं। दिल्ली में शिक्षा क्षेत्र में करीब 46 प्रतिशत बजट का खर्च नहीं होने, ड्रॉप आउट में बढ़ोतरी, 500 स्कूलों में प्रिंसिपल के खाली पद, आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) श्रेणी के हजारों बच्चों को दाखिला न मिलने सहित शिक्षा के स्तर में लगातार गिरावट समेत कई बातें सामने आई हैं।

खोखला है केजरीवाल का दावा

असल में दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत बाकी शहरों के मुकाबले पहले से ही अच्छी है। देश के कई स्कूलों में जहां बच्चे जमीन पर बैठ कर पढ़ाई करने को मजबूर थे उस समय भी दिल्ली के स्कूल अच्छी बिल्डिंगों में चल रहे थे। इसलिए केजरीवाल सरकार का यह दावा बेमानी लगता है, जिसमें वो कहते हैं कि दिल्ली के पिछड़े स्कूलों को उन्होंने वर्ल्ड लेवेल का बना दिया है।

दिल्ली में शिक्षा के नाम पर स्कूलों में हुए राजनीतिक प्रयोग को बिना किसी रिसर्च के उत्कृष्ठ घोषित कर दिया गया, इसके साथ ही इसे आदर्श शिक्षा मॉडल मानते हुए बाकी जगहों पर लागू करने की वकालत भी शुरू हो गई। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि दिल्ली के जिस शिक्षा मॉडल का गुणगान करते केजरीवाल सरकार नहीं थकती है वो असल में एक लंबे-चौड़े झूठ पर आधारित है।

केजरीवाल सरकार की नीति से बच्चे हुए बेहाल

दिल्ली की शिक्षा क्रांति के बड़े-बड़े दावे करने वाली केजरीवाल सरकार असल में शिक्षा प्रणाली में बिल्कुल फेल साबित हो रही है। दिल्ली में नौंवी क्लास के लगभग आधे बच्चे हर साल फेल हो रहे हैं। ऐसी ही स्थिति 11वीं के बच्चों की भी है, जिसमें से हर साल लगभग एक तिहाई बच्चे फेल हो रहे हैं।

बात सिर्फ इतनी नहीं है कि बच्चे फेल हो रहे हैं, असल में केजरीवाल सरकार की नीति से फेल हुए बच्चों की परेशानी बढ़ भी गई हैं। इस नीति के तहत फेल हो चुके बच्चों को दोबारा परीक्षा में भी बैठने नहीं दिया जा रहा है। अगर सत्र 2017-18 की ही बात करें तो 66 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिन्हें दोबारा नामांकन नहीं करने दिया गया, जिसकी वजह से करीब 1 लाख बच्चे स्कूली शिक्षा नहीं ले पाए।

केजरीवाल सरकार की इस अघोषित नीति के चलते सबसे ज्यादा नुकसान 10वीं और 12वीं के छात्रों का हुआ जो फेल हो गए थे। इसमें से 91 प्रतिशत बच्चे दोबारा रजिस्ट्रेशन नहीं करा पाए, केजरीवाल सरकार ने यह बात खुद ही उच्च न्यायालय में मानी है।

नतीजे हैं बेहद भयावह

रिजल्ट के परिणामों को लेकर केजरीवाल सरकार अपनी तारीफ करने से कहीं नहीं चूकती है लेकिन वह इस बात को कभी नहीं बताती कि आखिर हर साल 12वीं की परीक्षा देने वाले छात्रों की संख्या में इतनी तेजी से कमी क्यों आ रही है।

दिल्ली सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 2005 से 2014 तक परीक्षा में बैठने वाले बच्चों की संख्या 60,570 से बढ़कर 1,66,257 हुई थी, वह 2015 से घटते-घटते 2018 में 1,12,826 रह गई। इसके साथ ही केजरीवाल सरकार का प्राइवेट को पहली बार पीछे छोड़ देने का दावा भी गलत है। 2005 में 13 अंकों से दिल्ली के सरकारी स्कूलों ने प्राइवेट स्कूलों को पछाड़ा और साल 2009 और 2010 में भी ऐसा हुआ। साथ ही पिछले 10 सालों में 12वीं के परिणाम कभी 85 प्रतिशत से कम नहीं रहे।


केजरीवाल सरकार 12वीं परिणाम का श्रेय खुद लेने में लगी हुई है लेकिन जैसे ही 10वीं क्लास के खराब परिणामों की बात आती है तो वह चुप्पी साध लेती है। वह इस बात को सामने नहीं लाती है कि 10वीं के सरकारी स्कूलों के परिणाम प्रइवेट स्कूलों के मुकाबले बहुत ही खराब हैं।

इस वर्ष की बात करें तो दिल्ली के सरकारी स्कूलों का रिजल्ट 71.58 प्रतिशत और प्राइवेट स्कूलों का 93.12 प्रतिशत रहा। पिछले सत्र में ये 69.32 प्रतिशत और 89.45 प्रतिशत था। मतलब पिछले साल 20 अंक से पीछे और इस साल 21 अंकों का फासला रहा है। जिन सरकारी स्कूलों ने साल 2013 में प्राइवेट स्कूलों को पीछे छोड़ा था, आज दो सालों से 13 साल के न्यूनतम आंकड़ों से भी पीछे हैं और इसकी जिम्मेवारी लेने के लिए कोई तैयार नहीं है।

इकॉनोमिक सर्वे की रिपोर्ट ने खोली पोल

दिल्ली इकॉनोमिक सर्वे 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक नामांकन लगातार घट रहे हैं। सत्र 2013-14 में जहां दिल्ली के 992 स्कूलों में 16.10 लाख विद्यार्थी पढ़ते थे, 2017-18 आते-आते बच्चों की संख्या घटकर 14.81 लाख रह गई। वहीं प्राइवेट स्कूलों की संख्या 2,277 से घटकर 1,719 हुई लेकिन लेकिन नामांकित बच्चों की संख्या 13.57 लाख से बढ़कर 16.21 लाख पहुंच गई।

रिपोर्ट यह इशारा भी करती है कि दिल्ली में बहुत से बच्चे स्कूली शिक्षा से दूर हैं। 2014-15 में दिल्ली स्कूली शिक्षा ले रहे बच्चों की संख्या 44.13 लाख थी, वह 2017-18 में घटकर 43.93 लाख पहुंच गई और दिल्ली की जनसँख्या बढ़ी तो बच्चे कम कैसे हो गए!

निगम के स्कूलों का साजिशन खात्मा

दिल्ली सरकार के पास केवल 1,030 स्कूल हैं और नगर निगम के जिम्मे लगभग 1,700 स्कूल आते हैं। प्राथमिक कक्षाएं अब तक नगर निगम के स्कूलों में होती थीं और माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चे दिल्ली सरकार के स्कूलों में जाते थे। केजरीवाल सरकार को जब 2017 में एमसीडी चुनाव में हार का सामना करना पड़ा तो अपने अधीन के स्कूलों में घट रहे नामांकन को रोकने और निगम स्कूलों को बंद करने के लिए आप सरकार ने बड़ी संख्या में अपने स्कूलों में प्राथमिक कक्षाओं में नामांकन लेना शुरू कर दिए।

इसके बाद 2014-18 के बीच रिकॉर्ड 319 स्कूलों में प्राथमिक कक्षाएं लगने लगीं। वर्तमान समय में 720 सर्वोदय विधालय की प्राथमिक कक्षाएं चल रही हैं, इसके साथ ही 144 स्कूलों में भी नर्सरी की पढ़ाई शुरू कर दी गई ताकि नगर निगम के स्कूलों को खत्म किया जा सके। राजनीतिक बदला लेने की नीयत से शिक्षकों के वेतन में देरी, स्कूलों के विकास पर ध्यान देने की बजाए उसे ख़राब साबित करने में ही सरकार लग गई।

गणित और विज्ञान स्कूलों से गायब

आज दिल्ली के एक तिहाई से भी कम सरकारी स्कूलों में विज्ञान की पढ़ाई होती है। इसके पीछे संसाधन की कमी का बहाना दे दिया जाता है और दो तिहाई स्कूलों में बच्चों को सामाजिक विज्ञान या वाणिज्य विषय लेकर पढ़ने के लिए विवस करदिया है।

दिल्ली की शिक्षा से विज्ञान के साथ-साथ गणित भी गायब है। साल 2020 में सीबीएसई ने 10वीं की परीक्षा में बेसिक मैथ को एक आसान विकल्प के रूप में दिया तो देश के 30 प्रतिशत बच्चों ने इसे चुना। वहीं दिल्ली के रिकॉर्ड 73 प्रतिशत बच्चों ने बेसिक मैथ चुना ताकि वे गणित में फेल न हो सकें, वहीं दिल्ली सरकार ने सर्कुलर निकाल कर शिक्षकों को कहा कि वे बच्चों को समझाकर बेसिक मैथ लेने को राजी करें।

दिल्ली के लाखों बच्चे आज भी शिक्षा से वंचित

दिल्ली में शिक्षकों की भारी कमी है, हजारों पद खाली पड़े हैं। इनकी कमी भारी संख्या में नियुक्त अतिथि शिक्षकों से की जाती है जिनकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में है। हाल ही में सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय को बताया कि 21,135 अतिथि शिक्षकों में से 16,383 शिक्षक नियुक्ति के लिए हुई परीक्षा में न्यूनतम अंक भी नही ला पाए। केजरीवाल सरकार इन्हीं शिक्षकों को स्थायी करने का दावा करती है। वहीं स्थायी प्राचार्य की कमी से भी दिल्ली के विद्यालय बेहद प्रभावित हैं, लगभग दो तिहाई स्कूलों में प्राचार्य पद खाली हैं।

500 नए स्कूल, 17000 शिक्षकों की बहाली, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के वादे, गिने-चुने स्कूलों की तस्वीर दिखाकर ये बताया जा रहा है कि शिक्षा में क्रांति हो गई है। आखिर इस कथित क्रांति से बच्चों को क्या फायदा हुआ जब आज भी दिल्ली के लाखों बच्चें स्कूली शिक्षा से वंचित हैं।

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