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राहुल गांधी के बाद प्रियंका वाड्रा भी फेल… सरकार बनाना तो दूर बचाने में भी विफल भाई-बहन की जोड़ी

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उत्तर प्रदेश के साथ पांच राज्यों में जारी विधानसभा चुनावों के एग्जिट पोल पर विश्वास किया जाए तो राहुल गांधी की तरह ही प्रियंका गांधी वाड्रा भी फेल हो गई हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की परिवार के बल पर पार्टी चलाने की कोशिश सफल नहीं हो पा रही है। सोनिया गांधी ने अपने बेटे राहुल गांधी को राजनीति में स्थापित करने की जी-तोड़ कोशिश की। पार्टी में कई वरिष्ठ नेताओं के रहते राहुल को अध्यक्ष तक बनाया, पर एक के बाद एक कई हार के बाद आखिरकार वो खुद अध्यक्ष पद से हट गए। इसके बाद सोनिया गांधी ने बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा को राजनीति में उतार उन्हें उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी। लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली कहावत को साबित किया।

इस बार विधानसभा चुनावों की बागडोर राहुल गांधी की जगह बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा के हाथों में थमा सोनिया गांधी सोच रही थी कि दादी इंदिरा गांधी से शक्ल-सूरत मिलने का फायदा प्रियंका को मिल सकता है। प्रियंका के नेतृत्व में यूपी चुनाव कराने का फैसला कर सोनिया गांधी ने एक तरह से अपने बेटे की प्रतिभा की इस सच्चाई को भी स्वीकार कर लिया कि वो पार्टी का नेतृत्व करने के लायक नहीं हैं। खुद राहुल गांधी ने भी कई बार कोशिश करने के बाद कामयाबी ना मिलने पर मान लिया कि वो कांग्रेस की नैया को किनारे नहीं लगा सकते।

परिवार के साथ प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा पर कई आरोप
गांधी परिवार का नाम नेशनल हेराल्ड स्कैंडल, अगस्ता वेस्टलैंड घोटाला, बोफोर्स घोटाला, मारुति घोटाला और मूंदड़ा स्कैंडल जैसे घोटाले में तो आता ही रहा है। सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा भी कई आरोपों में घिरे हैं। बीकानेर में जमीन घोटाले और वाड्रा-डीएलएफ घोटाले के साथ जमीन के कई सौदों में हुए घोटालों में उनका नाम जुड़ा रहा है। 2008 में हरियाणा के एक जमीन सौदे को लेकर वाड्रा पर तो यहां तक आरोप है कि अपने राजनीतिक रसूख के बूते इस सौदे में उन्होंने एक पैसा लगाये बिना 50 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। साफ है अब जनता आरोपियों और भ्रष्टाचार में शामिल लोगों से परहेज करने लगी है।

परिवार से बाहर के चेहरे पर भरोसा नहीं
सोनिया गांधी ने भले ही कांग्रेस पर अपनी लगाम कस दी हो, लेकिन आज स्थिति ये है कि पार्टी परिवारवाद के साये में पूरी तरह घिर चुकी है। अवसर की तलाश में युवा नेता पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। वंशवाद की राजनीति के इस ढांचे में कांग्रेस के अनुभवी नेता भी सरेंडर कर चुके हैं। नेहरू-गांधी परिवार इनके दिमाग पर राज करे, इसे शायद ये अपनी नियति मानकर चलते हैं। क्योंकि पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अतीत में नेहरू-गांधी परिवार के कदम के विरोध में आवाज उठाने वाले नेताओं का हश्र देख चुके हैं।

राहुल- प्रियंका की राजनीति का अंत?
प्रियंका के भाई राहुल गांधी ने 2004 में राजनीति की शुरुआत की थी। राहुल के चेहरे को आगे कर पार्टी ने कई विधानसभा चुनावों के साथ पिछला लोकसभा चुनाव भी लड़ा था। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली सीटें राहुल की नेतृत्व क्षमता की बानगी देने के लिए काफी हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में पिछले लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस 17 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में खाता भी खोल नहीं सकी। यूपी और बिहार जैसे राज्यों में महज 1-1 सीटों से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस पार्टी लोकसभा में सीटों की संख्या के लिहाज से 52 के साथ दूसरे सबसे न्यूनतम स्थान पर पहुंच गई। इसके पिछले लोकसभा चुनाव में उसने 44 सीटें जीती थीं। राहुल के रहते लोकसभा चुनावों में कांग्रेस का सबसे खराब प्रदर्शन सामने आया…विधानसभा चुनावों में तो पार्टी सरकार बनाने में तो दूर बचा पाने में भी नाकाम रही। तो क्या मान लिया जाए कि राजनीति की दुनिया में राहुल-प्रियंका की जोड़ी बॉलीवुड फिल्मों की उस जोड़ी की तरह नजर आ रहे हैं जो लगातार फ्लॉप फिल्में देने के बाद इंडस्ट्री से बाहर हो जाते हैं।

देखिए राहुल- प्रियंका काल में किस तरह कांग्रेस मुक्त हो रहा है भारत
सवाल उठता है कि वंशवाद की राजनीति से राहुल- प्रियंका कब तक करियर बचाए रखेंगे। लगातार मिल रही हार से साफ है कि जिस राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के भरोसे पार्टी देश में फिर से पैर जमाने की कोशिश कर रही है वह बेहद कमजोर है और उनके नेतृत्व में पार्टी कांग्रेस मुक्त भारत की ओर अग्रसर है।

आइए एक नजर डालते हैं राहुल- प्रियंका काल में कैसे सिकुड़ता चला गया कांग्रेस का जनाधार-  

2019: 52 सीटों पर सिमट गई कांग्रेस
मतदाताओं का कांग्रेस से विश्वास उठ चला रहा है। कांग्रेस लोकसभा में नेता विपक्ष बनने लायक पार्टी भी नहीं बची है। 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को सिर्फ 52 सीटों पर संतोष करना पड़ा। आज पार्टी की हालत ये हो गई है कि पुराने नेता भी किनारा करने लगे हैं। लगातार मिल रही हार के बाद अब तो पार्टी की अस्मिता पर सवाल उठने लगा है।

2018: हार से नए साल का स्वागत
साल 2018 भी कांग्रेस के लिए शुभ साबित नहीं हुआ। नए साल में पूर्वोत्तर में भी पार्टी को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। पार्टी का अस्तित्व बचाने के लिए राहुल गांधी ने पूर्वोत्तर में ताबड़तोड़ कई रैलियां की, लेकिन यहां कामयाब नहीं हो सके। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय में पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा। 

2017 में सात में से छह राज्यों में शिकस्त
वर्ष 2017 में सात राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने भी राहुल गांधी की पोल खोल दी। यूपी, उत्तराखंड, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस को भारी हार मिली। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता और मेहनत की हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी किसी पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों। दूसरी ओर इन चुनावों में भी राहुल के मुकाबले अखिलेश एक युवा नेता के तौर पर जनता के सामने उभरकर आए। अखिलेश में लोगों ने राहुल के मुकाबले अधिक उम्मीद देखी जबकि राहुल अपने भाषण की शैली आज भी पुराने ढर्रे की अपनाए हुए हैं। न तो उनके भाषण में कोई तीखापन है और नही वे जनता को कोई विजन ही दे पाए हैं।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार
2015 में महागठबंधन के चलते बिहार में जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2014 में 44 सीटों पर सिमट गई
दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की भूमिका सीमित कर दी गई है और युवा नेतृत्व के नाम पर राहुल को थोप दिया गया है। 2014 में पार्टी की किरकिरी हर किसी को याद है। जब 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार
कांग्रेस की हालत खराब होती जा रही है। लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

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