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सिद्धारमैया सरकार में अपराध, तुष्टिकरण और भ्रष्टाचार का बोलबाला

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कर्नाटक में 2013 के विधानसभा चुनाव के परिणाम जब घोषित हुए तो बहुत से लोगों की प्रतिक्रिया थी- कांग्रेस नहीं चाहिए। लोगों के मन का ये भाव इसलिए व्यक्त हो रहा था कि लोग कांग्रेस के कुशासन को फिर नहीं देखना चाहते थे। बीते साढ़े चार साल में यह बात एक बार फिर साबित हो गई है कि कांग्रेस की सरकार भ्रष्ट होने के साथ ही अपराध को संरक्षण देने का काम कर रही है। सिद्धारमैया सरकार में जहां एक ओर भ्रष्टाचार और अपराध चरम पर है, वहीं तुष्टिकरण के कारण आम लोगों में अविश्वास का भाव उत्पन्न हो गया है।

बढ़ता गया अपराध
सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल की बात करें तो अब तक 7748 हत्याएं, 7,238 बलात्कार और 11, 000 अपहरण की घटनाएं हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त दंगों के भी कई मामले सामने आ चुके हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवकों की हत्याओं का दौर भी लगातार जारी है। 

भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार
किसी आम जनता को कभी 70 लाख रुपये की घड़ी भेंट में मिली है, लेकिन इस तरह की भेंट कर्नाटक के मुख्यमंत्री को मिलती है। ऐसा इसलिए है कि यहां के मुख्यमंत्री जनता के पैसे को उद्योगपतियों पर लुटाते हैं। ये इससे भी पता लगता है कि जब सिद्धारमैया की सरकार बन रही थी तो कई ऐसे बड़े नामों को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया था, क्योंकि उनपर भ्रष्टाचार के आरोप थे। हालांकि बाद में इन्हें शामिल कर लिया गया।

तुष्टिकरण की राजनीति
कांग्रेस ने आजादी के बाद से अब तक मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति ही अपनाई है और कर्नाटक में यही कुछ हो रहा है। जनवरी, 2018 में एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ पिछले 5 सालों में दर्ज सांप्रदायिक हिंसा के केस वापस लिए जाने का आदेश दिया गया। जाहिर है इस सर्कुलर के आधार पर सिद्धारमैया सरकार ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का कार्ड खेल रही है और यहीं से हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति का आधार तैयार किया जा रहा है।

दूसरी ओर तथ्य ये है कि हिंदुओं की भावनाएं भड़काने वाले के एस भगवान पर तीस से अधिक केस किए जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है।

किसानों की आत्महत्या
कर्नाटक में किसानों की तंगहाली एक बड़ी समस्या है। सिद्धारमैया का कार्यकाल बीतने जा रहा है, लेकिन सिद्धारमैया ने किसानों की समस्याओं पर कोई ध्यान नहीं दिया। अब तक 3,781 किसानों ने आत्महत्या कर ली है। हास्यास्पद ये है कि केंद्र सरकार ने किसानों की सहायता (सब्सिडी) के लिए 1,685.2 करोड़ रुपये कर्नाटक सरकार को दिए, लेकिन राज्य सरकार ने महज 800 करोड़ रुपये ही खर्च किए। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने बिना केंद्र की सहायता के ही किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणा की थी।

जाहिर है सिद्धारमैया की सरकार हर मोर्चे पर फेल साबित हो रही है और अपने कारनामों के कारण लगातार कठघरे में है।

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