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खूब रंग ला रही हैं मोदी सरकार की आउट ऑफ बॉक्स नीतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीन साल के कार्यकाल की नीतियों का विश्लेषण

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इस बात की झलक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालने से पहले ही दे दी थी कि उनकी सरकार के कामकाज का अंदाज पिछली सरकार की तरह लकीर के फकीर जैसा नहीं होगा। सत्ता में आते ही उन्होंने बड़े और कड़े फैसलों के संकेत देने शुरू कर दिये…ऐसे फैसले जो पिछले शासन के दौरान पतन की राह में जा रहे देश को विकास की दौड़ में लाकर खड़ा कर सके। चुनौती बड़ी थी, अंग्रेजी में जिसे ‘हिमालयन टास्क’ कहते हैं वैसी थी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को बेहतर भविष्य देने के लिए के लिए इस चुनौती को कबूल किया…प्रधानमंत्री के रूप में मोदी देश को दुनिया में चल रही विकास की रेस में आगे ले जाने के लिए पहले दिन से लग गए।

पहली ही कैबिनेट बैठक से बड़ा संदेश
सत्ता संभालने के बाद मोदी कैबिनेट ने अपनी पहली ही बैठक में काले धन पर एसआईटी गठित कर दी। इस फैसले के साथ ही लोगों में ये संदेश मजबूती के साथ गया कि काले धन वालों पर शिकंजा कसने में मोदी सरकार सख्त से सख्त कदम उठाने से नहीं हिचकेगी। इसकी सबसे तगड़ी बानगी दिखी 8 नवंबर 2016 को हुए नोटबंदी के फैसले में..जिसने मोदी के ज्यादातर विरोधियों की नींद उड़ा दी। भ्रष्टाचार, काला धन और आतंकवाद पर शिकंजे के लिए उठाये गए इस कदम को ना सिर्फ देश भर में लोगों का समर्थन मिला…बल्कि इस कदम के साथ ही भारत डिजिटल लेनदेन की ओर तेजी में बढ़ता जा रहा है। नोटबंदी के बाद देश में नकदरहित कारोबार अपनाने का ट्रेंड मजबूत हो रहा है और डिजिटल लेनदेन में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। नोटबंदी का फैसला राजनीति के लिहाज से भी बेहद साहसिक फैसला था, क्योंकि कहने वाले ये भी कह रहे थे कि ये कदम कहीं मोदी सरकार पर भारी ना पड़ जाए। लेकिन उसके ठीक बाद पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी चार राज्यों में सरकार बनाने में कामयाब रही। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में तो बीजेपी को अभूतपूर्व सफलता मिली।

विदेश नीति में दोस्ती के साथ आक्रामकता भी
वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में ही सार्क देशों के प्रमुखों को आमंत्रित कर ये बता दिया था कि वो अपने नेतृत्व में वैसा कुछ करके दिखाते रहेंगे जो आउट ऑफ बॉक्स हो यानी लीक से हटकर हो। अपने इस कदम के साथ ही उन्होंने दुनिया को अपनी विदेश नीति की झलक दिखा दी कि उनके नेतृत्व में पाकिस्तान की ओर भी भारत पहले दोस्ती का हाथ बढ़ाएगा। दो महीने बाद पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने जब कश्मीर के अलगाववादी नेताओं को खास तौर पर मिलने के लिए आमंत्रित किया तो भारत ने विदेश सचिव स्तर की द्विपक्षीय वार्ता को स्थगित कर ये भी जता दिया कि मोदी के नेतृत्व के दौरान दोहरी चाल की ना’पाक’ नीति कभी कामयाब नहीं होने वाली। हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सहृदयता एक बार फिर तब दिखाई थी जब वो अफगानिस्तान से लौटते हुए किसी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के बिना नवाज शरीफ से मिलने उनके घर पहुंचे थे, लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद पठानकोट में आतंकी हमला हुआ, जिससे ये साफ हो गया कि पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आने वाला। तब से लेकर अब तक पाकिस्तान की किसी भी शातिर चाल को भारत ने अंतर्राष्ट्रीय मंच पर कभी सफल नहीं होने दिया है। आज भारत के कड़े रुख के आतंक को पनाह देने वाला पाकिस्तान मारा-मारा फिर रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत की कूटनीति से विश्व मंच पर पाकिस्तान अलग-थलग पड़ चुका है। एक चीन के अलावा उसे पूछने वाला कोई नजर नहीं आ रहा।

नहीं चल पा रहे चीन के तेवर!
केंद्र में बीजेपी की अगुआई में एनडीए सरकार बनने के तीन महीने बाद भारत दौरे पर आए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद ले जाकर ये भी संदेश दिया कि भारत चीन के साथ भी रिश्तों को नया आयाम देना चाहता है। ये और बात है कि ड्रैगन अपने को बदलना नहीं चाहता .. वो पाकिस्तान को अपनी सरपरस्ती देने में लगातार लगा हुआ है इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी समय-समय पर चीन को सख्त संदेश देने की कोशिश की है। मोदी के नेतृत्व में भारत ने चीन को भी ये बताने से कभी गुरेज नहीं किया कि दोस्ती का पैगाम देने के साथ भारत जैसे को तैसा वाला रुख अपनाना भी जानता है। सितंबर 2014 में जिनपिंग के भारतीय दौरे के समय जम्मू कश्मीर के चुनार में जब करीब 1000 चीनी सैनिक घुस आये थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के सामने इस मुद्दे पर सीधा ऐतराज जताया था। लेकिन मोदी सरकार को चीन के साथ अपनी कूटनीति को इस एंगल से भी देखना है जिससे देश का कारोबारी हित सुरक्षित रहे, साथ ही अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत की ताकत भी कमजोर ना पड़ने पाए। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की राह में चीन ही रोड़ा बना हुआ है…इसलिए भारत का ये भी प्रयास है कि ऐसा अवसर भी बनाया जाए..जब चीन भारत के समर्थन को मजबूर हो जाए..और सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के लिए वर्षों से जारी इंतजार खत्म हो सके।

विदेशों में भी भारतीयों को अभूतपूर्व सुरक्षा का एहसास
विदेशों में संकट में फंसे भारतीयों की सुरक्षित वतन वापसी को मोदी सरकार ने पिछले तीन सालों में हमेशा ही सुनिश्चित किया है। इसका सबसे ताजा उदाहरण उज्मा जान है जिसे पाकिस्तान जाने पर बंदूक के दम पर निकाह को मजबूर किया गया। उज्मा वहां जिस ताहिर नाम के शख्स से मिलने गई थी उस ताहिर ने उसे बंधक बनाकर रखा। उज्मा ने वहां भारतीय उच्चायोग में शरण ली थी..जिसके बाद भारत सरकार ने उसकी स्वदेश वापसी के लिए जरूरी कदम उठाये। उज्मा ने अपने वतन लौटकर जो दर्द बयां किया उसने एक बार फिर पाकिस्तान के जमीनी हालात की पोल खोली है। उज्मा ने पाकिस्तान को मौत का कुआं बताते हुए कहा कि पाकिस्तान जाना आसान है, लेकिन वहां से लौटना मुश्किल। यूक्रेन, लीबिया, इराक, यमन और दक्षिण सूडान में संकट में फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित अपने देश लाकर भी मोदी सरकार ने ये जाहिर कर दिया कि उसकी विदेश नीति में अपनों की सुरक्षा का भाव प्राथमिकता में सबसे ऊपर है। पिछले तीन साल में दुनिया भर में फैले भारतीयों में सरकार ने अभूतपूर्व सुरक्षा का एहसास कराया है।


कुलभूषण को बचाने के लिए ठोस पहल
दुनिया ने मोदी के नेतृत्व में भारत की बढ़ती साख का एहसास एक बार तब फिर किया जब हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय-ICJ ने भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा पर रोक लगा दी। ICJ के जस्टिस रॉनी अब्राहम ने अपने फैसले में साफ-साफ कहा कि कुलभूषण को जासूस बताने के पाकिस्तान के दावे को सही नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि वियना संधि के तहत कुलभूषण जाधव को कानूनी सहायता उपलब्ध कराई जाए।

सर्जिकल स्ट्राइक जैसे फैसले का भी साहस दिखाया
अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मोदी सरकार ने अपना सबसे बड़ा लोहा पिछले साल 28 सितंबर को पाकिस्तान को सबक सिखाकर मनवाया। भारतीय सीमा में घुसपैठ और आतंक को बढ़ावा देने के साथ गोलाबारी से बाज ना आने वाले पाकिस्तान में घुसकर भारतीय सेना ने अपना पराक्रम दिखाया। ये पराक्रम था सर्जिकल स्ट्राइक का जिसमें पीओके में घुसकर भारतीय सेना के विशेष दस्ते ने आतंकी शिविरों को तबाह करने के साथ बड़ी तादाद में आतंकियों को मार गिराया। बहादुरी का ये वो कारनामा था जिसने हर तरफ देशवासियों को गर्व की अनुभूति दी। 18 सितंबर को उरी में सेना के कैंप पर हुए आतंक हमले के 6 दिन बाद सेना के पराक्रम का संकेत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी दिया था। सर्जिकल स्ट्राइक ने मोदी सरकार के इस चेहरे को देशवासियों के सामने लाया कि ये सरकार कथनी से ज्यादा करनी में विश्वास रखती है।

परिवर्तनकारी और क्रांतिकारी योजनाएं
मोदी सरकार ने अपनी योजनाओं में परिवर्तनकारी और क्रांतिकारी रंग भरने की कोशिश की। सिर्फ बातों से नहीं ऐक्शन पर जोर देकर इस सरकार ने खुद को अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से काफी अलग साबित किया है। चाहे वो जन धन योजना के तहत उन लोगों के खाते खुलवाने का मामला हो जिनके पास आजादी के छह दशक बाद भी अपना बैंक खाता नहीं था, चाहे वो उज्ज्वला योजना के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस देने की योजना, इस सरकार ने दिखाया कि देश की जनता की बेहतरी के लिए वो भरपूर इच्छाशक्ति दिखाने में सक्षम है। युवाओं के प्रशिक्षण और रोजगार के नए-नए द्वार खोलने के लिए पहली बार देश में स्किल डेवलपमेंट का अलग से एक मंत्रालय बनाया गया..ये कदम युवा शक्ति को एक ठोस दिशा देने के लिए मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को उजागर करता है। किसानों के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना हो या फिर छोटे उद्यमियों के लिए बिना गारंटी के ऋण देने वाली मुद्रा योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में केंद्र सरकार समाज के आखिरी पायदान तक बैठे लोगों को ये महसूस कराने में सफल रही है कि सबका साथ सबका विकास महज एक नारा नहीं, इस सरकार का एक संकल्प है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण-DBT के साथ ये सरकार इसे भी सुनिश्चित कर चुकी है कि सरकारी स्कीमों के तहत मिलने वाली सौ फीसदी रकम लाभार्थियों के खाते में जाए। पहले जहां सौ में से 15 रुपये लाभार्थियों के खाते में जाते थे, अब सौ में से सौ पहुंच रहे हैं।

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