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झूठे वादे और प्रचार के सहारे चल रही केजरीवाल सरकार

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सरकारी नौकरी छोड़ राजनीतिक कीचड़ की सफाई करने मैदान में उतरे अरविंद केजरीवाल आज खुद उसके दलदल में फंसे नजर आ रहे हैं। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर केजरीवाल सत्ता पर तो काबिज हो गए, लेकिन अब ईमानदार केजरीवाल भी झूठे बन गए हैं। केजरीवाल ने झूठे वादे कर सरकार तो बना ली, लेकिन इसे पूरा करने में वे असफल ही रहे। दरअसल राजधानी दिल्ली की सत्ता संभालने के पहले खुद को ईमानदारी और सचाई का पर्याय घोषित करने वाले केजरीवाल अब उलट-पलट कर बयान देने में माहिर हो गए हैं। हकीकत यह है कि आज उनके नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार सिर्फ और सिर्फ झूठे वादे और प्रचार के सहारे चल रही है। सरकार की कथनी और करनी में भारी अंतर रहता है। सरकार जो वादा करती है उसे कभी पूरा नहीं करती, बस सारा ध्यान प्रचार पर रहता है । अभी ताजा मामला रोजगार के लिए किए गए वादे को लेकर सामने आया है, जिससे उनकी हकीकत एकबार फिर उजागर हो गई है। एक आरटीआई से खुलासा हुआ है कि वर्ष 2019 और 2020 में आप सरकार ने महज 28 बेरोजगारों को ही नौकरी दी, जबकि इसके लिए कोरोना महामारी से प्रभावित लोगों को नौकरी देने के लिए एक जॉब पोर्टल भी लॉन्च किया गया था और नियुक्तियों को लेकर विभिन्न प्रचार माध्यमों से बड़े बड़े दाबे किए गए थे। इन्हीं सब कारणों से दिल्ली के लोग कहने लगे हैं कि यह सरकार न तो काम की है और न ही काज की।

प्रचार पर पानी की तरह बहा रहे पैसा
दरअसल, केजरीवाल सरकार पर एक आरोप अपनी और पार्टी की छवि निखारने के लिए प्रचार तंत्र पर बेहिसाब पैसा खर्च करने का लगता रहा है। विज्ञापनों पर उनकी सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। 2019 की एक आरटीआई से विज्ञापनों पर खर्च के जो आंकड़े आए थे, वे चौंकाने वाले थे। आरटीआई के जवाब में बताया गया था कि 2015 से 2019 तक केजरीवाल सरकार ने 311.78 करोड़ रुपये खर्च किए, जो पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार से चार गुना अधिक थी। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी केजरीवाल की विज्ञापन नीति बदस्तूर जारी है। दिल्ली की सड़कों पर हर जगह केजरीवाल सरकार की स्तुति वाले विज्ञापन मिल जाएंगे। न्यूज चैनलों और एफ.एम रेडियो पर उनके विज्ञापन छाए ही रहते हैं। समाचार पत्रों में पूर्ण पृष्ठ वाले विज्ञापन अक्सर दिखते हैं। प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों द्वारा लिया जाने वाला औसत विज्ञापन शुल्क कांग्रेस सरकार के समय की तुलना में 20-40 प्रतिशत तक बढ़ गया है। यही नहीं जब कोरोना संकट चरम पर था उस समय भी देश के सभी मुख्यमंत्रियों की तुलना में केजरीवाल टीवी पर अधिक छाए रहे ।

 खजाना खाली और प्रचार पर फूंक रहे करोड़ों
एकतरफ केजरीवाल सरकार अपने प्रचार के लिए करोड़ों रुपये फूंक रही है, तो दूसरी ओर केंद्र सरकार के सामने खजाना खाली होने का रोना भी रो रही है। खजाना भरने के लिए दिल्ली सरकार ने कोरोना के चरम काल में ही सोशल डिस्टेंसिंग की चिंता किए बिना, शराब दुकानें खोलने की इजाजत दे दी और उस पर 70 प्रतिशत कोरोना शुल्क लगा दिया। इस बीच दिल्ली की जनता पर दोहरी मार करते हुए केजरीवाल सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम भी बढ़ा दिए। पेट्रोल में 1.67 रुपये और डीजल में 7.10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। कहा ये गया था कि ‘लॉकडाउन’ के कारण दिल्ली सरकार को राजस्व में भारी नुकसान हुआ है। इसलिए सरकार पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाकर अपने राजस्व में वृद्धि करना चाहती है। इन्हीं सब कारणों से महंगाई की बोझ तले दबी जनता सवाल उठा रही है कि, जो सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिए तरह-तरह के कर लगा रही है, वही फिर अपने प्रचार के लिए पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ?

 कथनी-करनी में अंतर, वादे बड़े- बड़े जाे कभी नहीं हुए पूरे
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की कथनी और करनी में काफी अंतर रहता है। उनपर ये आरोप लगते रहें हैं कि वे वादे तो बड़ी-बड़ी करते हैं, लेकिन वे उसे कभी पूरा नहीं करते। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के विधायक अनिल बाजपेयी ने आप सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए कहा था कि, कैमरे के सामने लोगों की मदद करने के बड़े-बड़े वादे करने का ढोंग रचना और फिर दिल्लीवालों को उनकी हालत पर ही छोड़ देना, यह केजरीवाल अच्छी तरह से जानते हैं और पिछले 6 सालों से यही करते आ रहे हैं। जब कोरोना पीक पर था उस समय भी केजरीवाल बड़े-बड़े वादे करते रहे, लेकिन हकीकत यह थी कि दिल्ली के सरकारी तो क्या प्राइवेट हॉस्पिटल में भी बेड और आक्सीजन उपलब्ध नहीं थे। सरकार ने अपने हॉस्पिटल में आईएएस नोडल अफसर तो लगा रखा था लेकिन हालत ये थे कि कई बार फोन करने पर भी अधिकतर अधिकारियों के मोबाइल पर या तो घंटी बजती रहती थी या मोबाइल स्विच ऑफ आता था।

 इनकम टैक्स कमिश्नर होने का झूठा दावा करते रहे केजरीवाल
केजरीवाल हमेशा कहते रहते हैं कि वे इनकम टैक्स कमिश्नर थे, खूब पैसे कमा सकते थे जबकि राजनीति में वे सेवा करने आए हैं। लेकिन इस बयान को नकारते हुए रेवेन्यू अफसरों के संघ ने कहा है कि अरविंद केजरीवाल कभी कमिश्नर नहीं रहे। केजरीवाल ने दिल्ली की जनता से कहा था कि वे सुरक्षा नहीं लेंगे, लेकिन हकीकत यह है कि वे हमेशा सुरक्षा घेरे में रहते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने कहा था कि वे न तो बड़ा बंगला लेंगे और न हीं बड़ी गाड़ी का उपयोग करेंगे। लेकिन सत्ता संभालते ही वे अपने वादे से मुकर गए।

भ्रष्टाचार को लेकर किया आंदोलन, घोटालों को उजागर करने के वादे से मुकरे
मुख्यमंत्री बनने से पहले केजरीवाल दिल्ली सरकार के घोटालों को लेकर आंदोलन कर रहे थे। कॉमनवेल्थ घोटाले को लेकर उन्होंने योगगुरु बाबा रामदेव के नेतृत्व में 370 पेज का सबूत थाने में दिया था। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद घोटालों को उजागर करने के अपने वादे से वे मुकर गए। उन्होंने कहना शुरू किया कि अगर किसी के पास इन घोटालों को लेकर शीला दीक्षित के खिलाफ कोई सबूत हैं तो दें, वे कार्रवाई करेंगे। यहां सोचने और समझने वाली बात यह है कि खुद थाने में सबूत दर्ज करवाने वाले केजरीवाल अब दूसरों से सबूत मांग रहे।

मोहल्ला क्लीनिक बदहाल, नहीं मिलती गंभीर बीमारियों की दवा
दिल्ली सरकार ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट मोहल्ला क्लीनिक को तैयार करने में हजारों करोड़ रुपये खर्च कर दिए लेकिन फिलहाल इसका बहुत फायदा देखने को नहीं मिल रहा। कई इलाकों में इसकी स्थिति काफी बदहाल है। यहां पर खिड़कियों में लगे शीशे टूट चुके हैं। क्लीनिक के आसपास गंदगी का अंबार लग चुका है। यही नहीं, मोहल्ला क्लीनिक गंभीर बीमारियों के इलाज में भी कारगर नहीं है। यहां छोटी-मोटी बीमारियों के लिए दवा तो मिल जाती है, लेकिन यदि किसी को गंभीर बीमारी हो तो उसके लिए मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर दूसरे अस्पतालों मे रेफर कर देते हैं। हालांकि दिल्ली सरकार दावा करती है कि मोहल्ला क्लीनिक गरीब लोगों के लिए बनाए गए हैं। इसमें सभी बीमारियों के इलाज और जांच भी की जाती है।

मुफ्त बिजली के नाम पर दिल्लीवासियों से बोला झूठ!
हमेशा से झूठ की सियासत करने वाले केजरीवाल ने बिजली के बिल माफ करने को लेकर भी झूठबोला। केजरीवाल सरकार ने दिल्ली वालों को 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने का वादा किया था लेकिन सच्चाई ये है कि  चुनावों को देखते हुए 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त करने का फैसला किया। बाकायदा सरकार की तरफ से जारी शासनादेश में इसका जिक्र है कि ये फैसला सिर्फ 31 मार्च, 2020 तक ही लागू है।

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