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देश की अमर विरासत, बलिदानियों और इतिहास के भूले-बिसरे नायकों को राष्ट्रीय पहचान व सम्मान दिला रहे पीएम मोदी

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भारत के इतिहास में महान वीरों, बलिदानियों, सेनानियों, योद्धाओं की कमी नहीं रही है, लेकिन आजादी के बाद कांग्रेस ने 70 सालों तक इन्हें राष्ट्रीय पहचान नहीं दी। 70 साल तक देश गुलामी की मानसिकता में ही जीता रहा और अंग्रेजों एवं वामपंथी इतिहासकारों के लिखे इतिहास को ही पढ़ाया गया। जबकि सदियों से भारत में वीर सपूत जन्म लेते रहे हैं और अपने साहस का लोहा मनवाते रहे हैं। लेकिन देश में बहुत से ऐसे वीर हुए हैं, जो कहीं न कहीं गुमनामी के अंधेरे में खो गए और उनके बारे में बहुत बताया नहीं गया। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ऐसे कई नायकों को सामने लाकर उचित सम्मान दे रही है। पीएम मोदी का प्रयास रहा है कि गुमनाम नायकों को उचित सम्मान मिले। यही वजह है कि लासित बोरफुकन कोई पहले ऐसे नायक नहीं हैं, जिन्हें मोदी सरकार ने भारतीय जनमानस के बीच फिर से स्थापित किया है। पिछले कुछ समय में प्रधानमंत्री ने इतिहास के भूले-बिसरे ऐसे कई नायकों को राष्ट्रीय पहचान दी जिन्हें लगभग भुला दिया गया था। इनमें आदिवासी समुदाय के भी कई नायक शामिल हैं।

लासित बोरफुकनः ‘पूर्वोत्तर के शिवाजी’ लासित ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए थे

असमिया योद्धा लासित बोरफुकन की 400वीं जयंती आज (24 नवंबर 2022) मनाई गई। सोलहवीं सदी में मुग़ल विस्तारवाद को सफल चुनौती देने वाले लासित असम के समाज में एक नायक की तरह प्रतिष्ठित हैं और हर वर्ष उनकी जयंती 1930 से ही पूरे असम में ‘लासित दिवस’ के रूप में धूमधाम से मनाई जाती रही है। पूर्वोत्तर में मुगलों को धूल चटाने वाले लासित बोरफुकन अपने जज्बे के लिए जाने जाते थे, जिन्होंने कई बार मुगलों को युद्ध में हराया था। लासित बोरफुकन को पूर्वोत्तर का शिवाजी भी कहा जाता है। उन्होंने मुगलों को कई बार धूल चटाई और हमेशा युद्ध में हराया। लासित ने मुगलों के कब्जे से गुवाहाटी को छुड़ा कर उस पर फिर से अपना कब्जा कर लिया था और मुगलों को गुवाहाटी से बाहर धकेल दिया था। इसी गुवाहाटी को फिर से पाने के लिए मुगलों ने अहोम साम्राज्य के खिलाफ सरायघाट की लड़ाई लड़ी थी। इस युद्ध में मुगल सेना ने 1,000 से अधिक तोपों के अलावा बड़े स्तर पर नौकाओं का उपयोग किया था, लेकिन फिर भी लासित की रणनीति के आगे उनकी एक नहीं चली थी। साल 1671 में, गुवाहटी के पास सरायघाट में मुगलों और अहोम के बीच एक भयानक और निर्णायक युद्ध हुआ जिसे इतिहास में ‘सरायघाट के युद्ध’ के नाम से जाना जाता है। इस लड़ाई में अहोम सेनापति लासित ने बहादुरी का गजब मिसाल पेश किया और उनकी अगुवाई में छोटी सी अहोम आर्मी ने मुगलों के छक्के छुड़ा दिए। तभी से लासित का नाम असम के इतिहास में अमर हो गया। मुगलों को हराने वाले लासित बोरफुकन के पराक्रम और सरायघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय की याद में उनके नाम पर नेशनल डिफेंस एकेडमी में बेस्ट कैडेट गोल्ड मेडल भी दिया जाता है, जिसे लासित मेडल भी कहा जाता है।

नादप्रभु केम्पेगौड़ाः बेंगलुरू शहर के फाउंडर के साथ ही केम्पेगौड़ा ने कई सामाजिक कार्य भी किए

नादप्रभु केम्पेगौड़ा को विजयनगर साम्राज्य के मुखिया के रूप में जाना जाता है। कैम्पेगौड़ा को 16वीं शताब्दी में बेंगलुरू के फाउंडर के रूप में भी जाना जाता है। इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो हम पाएंगे कि उन्हें अपने समय के सबसे प्रसिद्ध और शिक्षित शासक के रूप में जाना जाता है। मोरासु गौड़ा वंश के वंशज कैम्पेगौड़ा ने बचपन से ही लीडरशिप क्वालिटी का प्रदर्शन किया जब वे ऐवरुकंदपुरा (ऐगोंडापुरा), हेसरघट्टा के पास एक गांव के एक गुरुकुल में पढ़ा करते थे। वे अपने पिता के बाद 1513 में मुखिया बने। कैम्पेगौड़ा ने अपने शासन में कई सामाजिक कार्य भी किए। उन्होंने मोरासु गौड़ा के लोगों के बंदी देवारू के दौरान अविवाहित महिलाओं की अंतिम दो अंगुलियों को काटने की प्रथा पर रोक लगाई। कन्नड़ समुदाय से ताल्लुक रखने के बाद भी उन्हें कई अन्य भाषाओं का भी ज्ञान था। लेकिन जीवन की कठिनाइओं ने कैम्पेगौड़ा का भी साथ नहीं छोड़ा। उनके पड़ोसी द्वारा किए गए शिकायत के कारण उन्हें अपने जीवन के 5 साल जेल में बिताने पड़े। लेकिन बावजूद इसके उनके शासन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। कहा जाता है कि केम्पेगौड़ा को शहर बनाने का विचार शिवनासमुद्र की ओर शिकार अभियान के दौरान आया था। केम्पेगौड़ा की प्रारंभिक योजनाओं के अनुसार, शहर में एक किला, एक छावनी, टैंक, मंदिर आदि मौजूद होना चाहिए। विजयनगर के शासक अच्युतराय से आज्ञा लेने के बाद उन्होंने बेंगलुरु के किले का निर्माण किया और अपनी राजधानी येलाहंका से बेंगलुरु पीट में स्थानांतरित कर दिया। 56 वर्षों तक शासन करने के बाद 1569 में उनकी मृत्यु हो गई। बेंगलुरू एयरपोर्ट परिसर में लगी केंपेगोड़ा की 108 फीट ऊंची प्रतिमा आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। प्रसिद्ध मूर्तिकार राम वनजी सुतार ने डिजाइन किया है। केम्‍पेगोड़ा की प्रतिमा का वजन 218 टन है। प्रतिमा में 98 टन कांस्य और 120 टन स्टील का प्रयोग किया गया है। प्रतिमा की तलवार का वजन ही 4 टन है। कहा जा रहा है कि किसी शहर के संस्थापक की ये सबसे ऊंची प्रतिमा है।

अल्लूरी सीताराम राजूः अंग्रेज़ों के विरुद्ध रम्पा विद्रोह शुरू किया

आंध्र प्रदेश में भीमावरम के समीप मोगल्लु नामक गांव में 04 जुलाई 1897 को जन्मे अल्लूरी सीताराम राजू एक संन्यासी थे जो न्याय में दृढ़ विश्वास रखते थे। उन्होंने कई बार गैरकानूनी ब्रिटिश नीतियों के विरुद्ध अपनी आवाज़ उठाई और उनके खिलाफ़ लड़ाई लड़ी। कहा जाता है कि सीताराम राजू ने अपनी स्कूली शिक्षा अपने पैतृक गांव में ही पूरी की थी और फिर अपनी उच्च शिक्षा के लिए वह विशाखापट्टणम चले गए। 18 वर्ष की आयु में, उन्होंने सभी सांसारिक सुखों को त्याग दिया और एक संन्यासी बन गए। वह एक बाल संन्यासी के रूप में क्षेत्र की पहाड़ियों और जंगलों में घूमते रहे और स्थानीय आदिवासी समुदाय के साथ घुलमिल गए। बदले में, आदिवासियों ने उन्हें एक ऐसा संत माना जो उन्हें ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों उनके अपमानजनक अस्तित्व से मुक्ति दिलाएगा। शुरुआत में, सीताराम राजू ने गांधीजी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में आकर, आदिवासियों को स्थानीय पंचायत अदालतों में न्याय मांगने और औपनिवेशिक अदालतों का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया। लेकिन, ऐसा करने से उनकी पीड़ा कम नहीं हुई और अंततः उन्होंने इस आंदोलन के माध्यम से परिवर्तन की आवश्यकता के बारे में जागरूकता फैलाई।

अल्लूरी सीताराम राजू ने आदिवासियों के अधिकारों के लिए जान कुर्बान कर दी

सन् 1922 के अगस्त में, उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध रम्पा विद्रोह का आरंभ किया। रम्पा प्रशासनिक क्षेत्र में लगभग 28,000 जनजातियां रहती थी। यह जनजातियां खेती में ‘पोड़ु’ प्रणाली का उपयोग करती थी जिसमें हर साल वन के क्षेत्र के एक छोटे हिस्से को खेती के लिए खाली किया जाता था, क्योंकि यह उनके भोजन का एकमात्र स्रोत था। जबकि जनजातियों के लिए जंगल उनके जीने के लिए बहुत आवश्यक थे, अंग्रेज़ उन्हें वहां से बेदखल करना चाहते थे ताकि वे लकड़ी के लिए इन क्षेत्रों को लूट सकें, जो अंततः उन्हें रेलवे और जहाजों के निर्माण में मदद करेगा। जंगलों को काटने के लिए, ‘मद्रास वन अधिनियम, 1882’ लागू किया गया जिससे जनजातीय समुदायों को जंगलों में अपनी मर्ज़ी से इधर-उधर जाने को प्रतिबंधित कर दिया गया और साथ ही साथ उन्हें अपनी पारंपरिक पोड़ु खेती करने से भी रोक दिया गया। इस अत्याचारपूर्ण आदेश ने आदिवासी विद्रोह की शुरुआत की, जिसे मान्यम विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। इन जनजातियों ने पहाड़ी क्षेत्र में सड़कों और रेलवे लाइनों के निर्माण में बंधुआ मजदूरों के रूप में काम करने से मना कर दिया। सीताराम राजू ने उनके लिए न्याय की मांग की थी। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने के लिए गुरिल्ला युद्ध का सहारा लिया। आदिवासी लोगों की अपनी सेना के साथ, उन्होंने कई पुलिस थानों पर आक्रमण किया और छापा मारा, कई ब्रिटिश अधिकारियों को मार डाला, और अपनी लड़ाई जारी रखने के लिए गोला-बारूद और हथियार भी चुराए। उन्हें स्थानीय लोगों का भरपूर समर्थन मिला और इसी कारण वे लंबे समय तक अंग्रेज़ों से बचे रहने में कामयाब रहे। अंग्रेज़ों के विरुद्ध उनके इस दो साल के सशस्त्र संघर्ष (1922-24) ने ब्रिटिश अधिकारियों को इस हद तक परेशान कर दिया कि जो कोई भी उन्हें ज़िंदा या मुर्दा पकड़कर ला पाता, उसके लिए 10,000 रुपयों के इनाम की घोषणा कर दी गई थी। इस बीच, अंग्रेज़ों ने आदिवासियों पर अत्याचार करना जारी रखा। उनकी पीड़ा को कम करने के लिए, और एक न्यायप्रिय व्यक्ति होने के नाते, सीताराम राजू ने इस उम्मीद के साथ आत्मसमर्पण किया कि बदले में उन्हें निष्पक्ष सुनवाई का मौका दिया जाएगा। लेकिन 07 मई 1924 को, उन्हें धोखे से फंसाया गया, एक पेड़ से बांधा, और गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। 08 मई को उनका अंतिम संस्कार किया गया। इस प्रकार ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध उनकी गौरवशाली लड़ाई का अंत हो गया। उन्होंने अपने पीछे साम्राज्यवाद-विरोधी विद्रोह की एक प्रेरक विरासत छोड़ी है। आज, इतिहास उन्हें एक निडर क्रांतिकारी के रूप में याद करता है, जो एक आदिवासी न होकर भी आदिवासी लोगों के अधिकारों और स्वतंत्रता के लिए लड़े। उन्हें उनकी वीरता और साहस के लिए “मान्यम वीरुडु” (जंगल का नायक) की उपाधि से सम्मानित किया गया था। प्रत्येक वर्ष, आंध्र प्रदेश सरकार उनकी जन्म तिथि, 4 जुलाई को राज्य उत्सव के रूप में मनाती है।

गोविंद गुरुः भीलों के बीच शिक्षा और आजादी की अलख जगाई

गोविंद गिरि को गोविंद गुरु के नाम से भी जाना जाता है। उनका जन्म 20 दिसंबर 1858 को डूंगरपुर जिले के बांसिया बेड़िया गांव में गौर जाति में एक बंजारा परिवार में हुआ था। बचपन से ही आध्यात्म में उनकी रूचि थी। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द सरस्वती से उन्हें प्रेरणा मिली, जिसके बाद उन्होंने अपने जीवन को देश, धर्म और समाज की सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने किसी स्कूल में पढ़ाई नहीं की। जब देश गुलाम था, तब उन्होंने भीलों के बीच शिक्षा और आजादी की अलख जगाई। जब भारत में विदेशी हुकूमत के खिलाफ आवाज़ें बुलंद हो रही थीं तब गोविन्द गुरु भील आदिवासियों के बीच शिक्षा की अलख जगा रहे थे और उनके अंदर देशभक्ति की ऊर्जा भर रहे थे।

मानगढ़ धाम गोविन्द गुरु और मातृभूमि के लिए प्राण न्योछावर करने वाले आदिवासियों के बलिदान का प्रतीक

गोविंद गुरु एक सामाजिक और धार्मिक सुधारक थे। उन्होंने राजस्थान और गुजरात के आदिवासी बहुत सीमावर्ती क्षेत्रों में 1890 के दशक में भगत आंदोलन चलाया। इस आंदोलन में अग्नि देवता को प्रतीक माना गया था। उन्होंने 1893 में सम्प सभा की स्थापना की। इसके द्वारा उन्होंने शराब, मांस, चोरी और व्यभिचार से दूर रहने का प्रचार किया। गोविंद गुरु ने लोगों से सादा जीवन जीने, हर दिन नहाने, यज्ञ और कीर्तन करने, बच्चों को पढ़ाने, अन्याय न सहने, जागीरदारों को लगान न देने और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार कर स्वदेशी अपनाने का आह्वान किया। बात 17 नवंबर 1913 की है। मानगढ़ की पहाड़ी पर वार्षिक मेला लगने वाला था। इससे पहले गोविंद गुरु ने ब्रिटिश सरकार से अकाल पीड़ित आदिवासियों से खेती पर लिया जा रहा कर घटाने का आग्रह किया, लेकिन सरकार ने उनकी बात नहीं मानी और पहाड़ी को घेरकर मशीनगन और तोपों से हमला कर दिया। इससे हजारों लोगों की मौत हो गई। ब्रिटिश हुकूमत ने गोविंद गुरु को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें पहले फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में आजीवन कारावास में बदल दिया गया। गोविंद गुरु 1923 तक जेल में रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने भील सेवा सदन के माध्यम से जनसेवा करते रहे। 30 अक्टूबर 1931 को गुजरात के कम्बोई गांव में उनका निधन हो गया। हर साल लोग वहां बने उनकी समाधि पर आते हैं और श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।

रानी चेन्नम्मा: कर्नाटक की ‘लक्ष्मीबाई’ ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया

रानी चेन्नम्मा की कहानी लगभग झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह है। इसलिए उनको ‘कर्नाटक की लक्ष्मीबाई’ भी कहा जाता है। वह पहली भारतीय शासक थीं जिन्होंने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह किया। भले ही अंग्रेजों की सेना के मुकाबले उनके सैनिकों की संख्या कम थी और उनको गिरफ्तार किया गया लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ बगावत का नेतृत्व करने के लिए उनको अब तक याद किया जाता है। चेन्नम्मा का जन्म 23 अक्टूबर, 1778 को ककाती में हुआ था। यह कर्नाटक के बेलगावी जिले में एक छोटा सा गांव है। उनकी शादी देसाई वंश के राजा मल्लासारजा से हुई जिसके बाद वह कित्तुरु की रानी बन गईं। कित्तुरु अभी कर्नाटक में है। उनको एक बेटा हुआ था जिनकी 1824 में मौत हो गई थी। अपने बेटे की मौत के बाद उन्होंने एक अन्य बच्चे शिवलिंगप्पा को गोद ले लिया और अपनी गद्दी का वारिस घोषित किया। लेकिन ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी ‘हड़प नीति’ के तहत उसको स्वीकार नहीं किया। हालांकि उस समय तक हड़प नीति लागू नहीं हुई थी फिर भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1824 में कित्तुरु पर कब्जा कर लिया। ब्रिटिश शासन ने शिवलिंगप्पा को निर्वासित करने का आदेश दिया। लेकिन चेन्नम्मा ने अंग्रेजों का आदेश नहीं माना। उन्होंने बॉम्बे प्रेसिडेंसी के लेफ्टिनेंट गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन को एक पत्र भेजा। उन्होंने कित्तुरु के मामले में हड़प नीति नहीं लागू करने का आग्रह किया। लेकिन उनके आग्रह को अंग्रेजों ने ठुकरा दिया। इस तरह से ब्रिटिश और कित्तुरु के बीच लड़ाई शुरू हो गई। अंग्रेजों ने कित्तुरु के खजाने और आभूषणों के जखीरे को जब्त करने की कोशिश की जिसका मूल्य करीब 15 लाख रुपये था। लेकिन वे सफल नहीं हुए।

रानी चेन्नम्मा ने पहली लड़ाई में ब्रिटिश सेना को पराजित किया, बाद में अंग्रेजों ने धोखा दिया

अंग्रेजों ने 20,000 सिहापियों और 400 बंदूकों के साथ कित्तुरु पर हमला कर दिया। अक्टूबर 1824 में उनके बीच पहली लड़ाई हुई। उस लड़ाई में ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ा। कलेक्टर और अंग्रेजों का एजेंट सेंट जॉन ठाकरे कित्तुरु की सेना के हाथों मारा गया। चेन्नम्मा के सहयोगी अमातूर बेलप्पा ने उसे मार गिराया था और ब्रिटिश सेना को भारी नुकसान पहुंचाया था। दो ब्रिटिश अधिकारियों सर वॉल्टर एलियट और स्टीवेंसन को बंधक बना लिया गया। अंग्रेजों ने वादा किया कि अब युद्ध नहीं करेंगे तो रानी चेन्नम्मा ने ब्रिटिश अधिकारियों को रिहा कर दिया। लेकिन अंग्रेजों ने धोखा दिया और फिर से युद्ध छेड़ दिया। इस बार ब्रिटिश अफसर चैपलिन ने पहले से भी ज्यादा सिपाहियों के साथ हमला किया। सर थॉमस मुनरो का भतीजा और सोलापुर का सब कलेक्टर मुनरो मारा गया। रानी चेन्नम्मा अपने सहयोगियों संगोल्ली रयन्ना और गुरुसिदप्पा के साथ जोरदार तरीके से लड़ीं। लेकिन अंग्रेजों के मुकाबले कम सैनिक होने के कारण वह हार गईं। उनको बेलहोंगल के किले में कैद कर दिया गया। वहीं 21 फरवरी 1829 को उनकी मौत हो गई। भले ही चेन्नम्मा आखिरी लड़ाई में हार गईं लेकिन उनकी वीरता को हमेशा याद किया जाएगा। उनकी पहली जीत और विरासत का जश्न अब भी मनाया जाता है। हर साल कित्तुरु में 22 से 24 अक्टूबर तक कित्तुरु उत्सव लगता है जिसमें उनकी जीत का जश्न मनाया जाता है। रानी चेन्नम्मा को बेलहोंगल तालुका में दफनाया गया है। उनकी समाधि एक छोटे से पार्क में है जिसकी देखरेख सरकार के जिम्मे है।

बिरसा मुंडाः आदिवासी अधिकारों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंका

बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। ये मुंडा जाति से सम्बन्धित थे। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को ‘बिरसा भगवान’ कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे। ब्रिटिश शासन काल में अंग्रेज आदिवासियों पर जुल्म बरपाया करते थे। न सिर्फ उनकी संस्कृति को नष्ट कर रहे थे, बल्कि उनके साथ बुरा बर्ताव भी किया करते थे। आदिवासियों पर मालगुजारी को बोझ लाद दिया था। आदिवासी महाजनों के चंगुल में फंसते जा रहे थे। उनके खेत-खलिहान पर अंग्रेजों का कब्जा होता जा रहा था। बिरसा मुंडा को यह देखकर बुरा लगा। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन का बिगुल फूंक दिया। बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गांव में हुआ था। मुंडा रीती रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था। यह कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएं घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे। लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं। जन-सामान्य का बिरसा में काफ़ी दृढ़ विश्वास हो चुका था, इससे बिरसा को अपने प्रभाव में वृद्धि करने में मदद मिली। लोग उनकी बातें सुनने के लिए बड़ी संख्या में एकत्र होने लगे। बिरसा ने पुराने अंधविश्वासों का खंडन किया। लोगों को हिंसा और मादक पदार्थों से दूर रहने की सलाह दी। उनकी बातों का प्रभाव यह पड़ा कि ईसाई धर्म स्वीकार करने वालों की संख्या तेजी से घटने लगी और जो मुंडा ईसाई बन गये थे, वे फिर से अपने पुराने धर्म में लौटने लगे।

बिरसा मुण्डा को इसीलिए कहा जाता है भगवान

1 अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिये आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गयी। लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया। उन्हें उस इलाके के लोग “धरती बाबा” के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी। 1897 से 1900 के बीच मुंडाओं और अंग्रेज सिपाहियों के बीच युद्ध होते रहे और बिरसा और उसके चाहने वाले लोगों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। अगस्त 1897 में बिरसा और उसके चार सौ सिपाहियों ने तीर कमानों से लैस होकर खूंटी थाने पर धावा बोला। 1898 में तांगा नदी के किनारे मुंडाओं की भिड़ंत अंग्रेज सेनाओं से हुई जिसमें पहले तो अंग्रेजी सेना हार गयी लेकिन बाद में इसके बदले उस इलाके के बहुत से आदिवासी नेताओं की गिरफ़्तारियां हुईं। जनवरी 1900 डोमबाड़ी पहाड़ी पर एक और संघर्ष हुआ था जिसमें बहुत से औरतें और बच्चे मारे गये थे। उस जगह बिरसा अपनी जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। बाद में बिरसा के कुछ शिष्यों की गिरफ़्तारियां भी हुईं। अन्त में स्वयं बिरसा भी 3 फरवरी 1900 को चक्रधरपुर में गिरफ़्तार कर लिये गये। बिरसा ने अपनी अन्तिम सांसें 9 जून 1900 को रांची कारागार में लीं। आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है।

आजादी की लड़ाई में आदिवासियों की अप्रतिम योगदानः पीएम मोदी

स्वतंत्रता की लड़ाई में आदिवासियों की भूमिका के बारे में चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि आज़ादी की लड़ाई में आदिवासी समाज के अप्रतिम योगदान को हर घर तक पहुंचाने के लिए अमृत महोत्सव में अनगिनत प्रयास किए जा रहे हैं। आज़ादी के बाद पहली बार, देश में आदिवासी गौरव और विरासत को प्रदर्शित करने के लिए आदिवासी संग्रहालय बनाए जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश के लंबसिंगी में “अल्लूरी सीताराम राजू मेमोरियल जन- जातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालय” भी बनाया जा रहा है। पिछले साल ही देश ने 15 नवंबर को भगवान बिरसा मुंडा जयंती को “राष्ट्रीय जनजाति गौरव दिवस” के रूप में मनाने की शुरुआत भी की है।

स्वतंत्रता संग्राम की महत्वपूर्ण घटना को इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिली

मानगढ़ में 17 नवंबर, 1913 के नरसंहार को याद करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि यह भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा अत्यधिक क्रूरता का एक उदाहरण था। मोदी ने कहा, “एक तरफ हमारे पास निर्दोष आदिवासी थे जो आजादी की मांग कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने मानगढ़ की पहाड़ियों को घेरकर दिन-दहाड़े एक हजार पांच सौ से अधिक निर्दोष युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों का नरसंहार किया।” प्रधानमंत्री ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के कारण स्वतंत्रता संग्राम की इतनी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली घटना को इतिहास की किताबों में जगह नहीं मिल पाई। प्रधानमंत्री ने कहा, “इस आजादी का अमृत महोत्सव में, भारत उस कमी को पूरा कर रहा है और दशकों पहले की गई गलतियों को सुधार रहा है।”

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