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वामपंथी पूर्वाग्रह से ग्रसित है इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क, खास एजेंडे के तहत भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों को करता है बदनाम

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फेसबुक यूजर्स को गलत सूचना से बचाने के लिए फ़ेसबुक अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के साथ ही बाहरी फैक्ट चेकर्स पर निर्भर रहता है, जो कि पहले से ही राजनीतिक पूर्वग्रहों से ग्रसित हैं। सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय स्थायी समिति के सामने फेसबुक इंडिया के एमडी अजीत मोहन ने माना कि कंपनी साइट पर पोस्ट की गई सामग्री से संबंधित मुद्दों को संभालने के लिए अंतर्राष्ट्रीय फैक्ट-चेकर्स नेटवर्क (IFCN) की सेवाओं का उपयोग करती है।

समिति की बैठक में भाजपा सांसदों ने IFCN से जुड़ी कंचन कौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ-साथ ही सत्तारूढ़ दल के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था। तो चलिए आपको बताते हैं कौन है कंचन कौर और IFCN में उनकी क्या भूमिका है ?

दरअसल कंचन कौर IFCN के कार्यकर्ताओं में से एक हैं, जो यह तय करती है कि भारत में किस वेबसाइट को IFCN सर्टिफिकेशन मिलता है और किस पोर्टल को नहीं! IFCN वेबसाइट पर कंचन कौर की प्रोफाइल बताती है कि उनमें ‘हितों का टकराव’ नहीं है।

कंचन कौर ने IFCN सर्टिफिकेशन के तहत कुछ पोर्टल्स का आकलन कर उन्हें सर्टिफिकेट दिया, उनमें बूमलाइव, दी क्विंट, ऑल्टन्यूज़ आदि शामिल हैं। यह उनके IFCN प्रोफाइल पर भी दिखाई देता है। उसने Factchecker.in का भी आकलन किया और उसे भी सर्टिफिकेट जारी किया।

बता दें कि न केवल ऑल्टन्यूज़, दी क्विंट जैसों को कई बार फर्जी खबरें फैलाने के लिए पकड़ा गया है, बल्कि ये अत्यंत स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक पूर्वग्रह के लिए भी कुख्यात हैं। इसी तरह Factchecker.in इंडिया स्पेंड का ही एक हिस्सा था, जो कई बार अपने भयावह एजेंडे को चलाते हुए पकड़ा गया। इंडिया स्पेंड के दोषपूर्ण FactChecker.in के हिन्दूफ़ोबिया और पूर्वाग्रहों को भी कई बार उजागर किया गया है।

कंचन कौर इन पोर्टल्स के लिए IFCN सर्टिफिकेट का आकलन और निगरानी करती आई हैं, जो न केवल राजनीतिक दुर्भावना से भरे हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से भाजपा के खिलाफ हैं। यही नहीं, ये वो पोर्टल्स हैं, जो बड़े पैमाने पर हिंदुओं के खिलाफ होने के साथ ही इस्लाम समर्थकों के साथ जुड़े हैं।

प्रधानमंत्री मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद नवंबर, 2019 में लिखा हुआ कंचन कौर का एक लेख मिला। जिसको पढ़ने के बाद काफी हैरानी हुई। दिलचस्प बात यह है कि जब वह खुद को फर्जी ख़बरों को रोकने के लिए जिम्मेदार संस्था मानती हैं और तय करती हैं कि कौनसा पोर्टल ‘तटस्थ’ ‘विश्वसनीय’ माना जाना चाहिए, किसे ‘फैक्ट-चेकर’ माना जाना चाहिए, कंचन कौर का अपना ही यह दस्तावेज फर्जी तथ्यों और वैचारिक पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था। उन्होंने मॉब लिंचिंग पर बीबीसी के एक अध्ययन का हवाला देकर दावा किया कि दक्षिणपंथी ही ‘अधिकांश गलत सूचना’ फैलाते हैं।

कंचन कौर के इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ चुनिंदा मीडिया घरानों के साथ ही बातचीत की, जबकि यह तथ्य भी एकदम झूठ है। 2 नवंबर, 2019 तक, कंचन कौर के इस लेख के प्रकाशित होने से पहले ही, प्रधानमंत्री मोदी ने 25 से अधिक चैनलों और प्रकाशनों को साक्षात्कार दिया था। यह जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कंचन कौर की ‘मीडिया’ की परिभाषा में NDTV के अलावा और कितने मीडिया स्रोत आते हैं।

कंचन कौर ने अपनी इस रिपोर्ट में मान लिया है कि भारत में लोगों के सोचने की क्षमता 2014 के चुनावों के बाद कम हो गई और यह देश अब तार्किक होकर सोच पाने में सक्षम नहीं है। कंचन कौर को यह याद नहीं रहा होगा कि कैसे बीबीसी ने कश्मीर में हज़रतबल ऑपरेशन के दौरान चेचन्या का फुटेज दिखाया था ताकि यह साबित किया जा सके कि भारतीय सेना मंदिर में गोलीबारी कर रही थी। कश्मीर में बीबीसी के कारनामे हाल ही में शुरू नहीं हुए थे, बल्कि 1990 के दशक में भारतीय मीडिया ने पूरे देश में चुप्पी बनाए रखी।

कंचन कौर के बयान देखकर ही स्पष्ट होता है कि वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरी हुई हैं। वह केवल उन वेबसाइटों को प्रमाणित करती हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा कांग्रेस और वामपंथियों के साथ है। वह लेख में कह रही हैं कि जो वेबसाइट प्रधानमंंत्री मोदी, भाजपा, दक्षिणपंथ या हिंदुओं को निशाना बनाने वाले लेख लिखते हैं, उन्हें इतने बड़े स्तर पर शेयर नहीं किया जाता है। शायद कंचन कौर का इशारा दी क्विंट, आउट ऑल्टन्यूज़ की ओर था।

कंचन कौर को देखकर लगता है कि वह फर्जी खबरों की बढ़ती संख्या से व्यथित हैं। जबकि खुद वह तमाम फेक न्यूज़ अपने इस पूरे पेपर में फैला रही हैं। उसके कागज के अंतिम हिस्से में ‘लम्बे समय तक चलने वाली जंग’ का जिक्र था। कंचन कौर ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने इतिहास के पाठ्यक्रमों में बदलाव किया है। वास्तव में केंद्र सरकार ने इस बारे में अभी तक भी कोई रूचि नहीं दिखाई है। क्योंकि अगर ऐसा किया गया होता तो जिस झूठ को वामपंथी इतिहासकार अब तक लोगों को सच मानने के लिए मजबूर करते आए हैं, उस झूठे इतिहास से अब तक शिक्षा पद्धति मुक्त हो चुकी होती।

इस लेख में कंचन कौर IFCN को भाजपा द्वारा फैलाई जाने वाली फेक न्यूज़ को रोकने वाली संस्था के तौर पर जिक्र करती हैं। यहाँ पर यह देखना दिलचस्प है कि वह इस नतीजे पर पहुँची कि सभी फेक न्यूज़ के पीछे भाजपा का रोल रहा होगा। वह भी तब, जबकि IFCN निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होने का दावा करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि जिस तरह के फैक्ट चेकर्स को IFCN फैक्ट चेकर होने का सर्टिफिकेट देता है, ना ही वह फैक्ट चेकर हैं, ना ही IFCN की विश्वसनीयता है।

 

 

 

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