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सीमा पर सड़क निर्माण से भारत की मजबूत होती स्थिति से टेंशन में चीन, दिखा रहा है आक्रामक तेवर

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देश की बागडोर संभालने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाकिस्तान और चीन की सीमा पर देश को मजबूत करने का फैसला किया। उन्होंने सीमा तक पहुंचने में सेना को आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए सड़कें, पुल और सुरंग निर्माण की परियोजनाओं की तेजी से मंजूरी दी। इसका नतीजा है कि आज सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) का सड़क बनाने का काम रणनीतिक दृष्टि से बेहद अहम जगहों पर आ पहुंचा है। इससे सीमा पर अपनी बढ़त खत्म होते देख चीन बौखला उठा है और आक्रामक तेवर दिखा रहा है।

सिक्किम और लद्दाख के पास कई इलाकों में तनाव बढ़ता जा रहा है और दोनों पक्ष वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास अतिरिक्त बलों की तैनाती कर रहे हैं। भारत अपनी सीमा के अंदर ही चीन से टक्कर लेने के लिए कुछ रणनीतियां तैयार कर रहा हैं। जिसे देख चीन को दिक्कत होनी शुरू हो गई है। दरअसल दोनों पक्षों के बीच इन इलाकों में कुछ दिनों पहले ही दो बार हिंसक झड़प हो चुकी है।

कुछ दिनों पहले ही पता चला था कि चीन ने गलवान घाटी इलाके में काफी संख्या में तंबू गाड़े थे जिसके बाद से ही भारत वहां कड़ी नजर बनाए हुए है।चीन के आक्रामक तेवर ने न केवल भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को सक्रिय कर दिया है, बल्कि वे पहले से ज्यादा तैयारी के साथ सीमा पर डटे हुए हैं। भारत ने लद्दाख से लगी सीमा पर अपने सैनिकों की तैनाती बढ़ा दी है। हाल में ही सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे ने लद्दाख बॉर्डर का दौरा कर ऑपरेशनल तैयारियों का जायजा भी लिया था।

दरअसल BRO ने 2018 में सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया था। इस प्रोजेक्ट के तहत 5 साल में करीब 3323 किमी लंबी 272 सड़कों का निर्माण करना था। ढाई साल में ही BRO ने 2304 किमी सड़क का निर्माण कार्य पूरा कर लिया। अगर देखा जाए तो इनमें से 61 सड़क ऐसी हैं जो रणनीतिक दृष्टि से बहुत ही अहम हैं। इन सड़कों की वजह से जहां भारत की स्थिति मजबूत हुई है, वहीं चीन को कड़ी चुनौती मिलने का डर सताने लगा है।

चीन का आरोप है कि भारतीय सेना लद्दाख के पास चीन की सीमा पर स्थित बाइजिंग और लुजिन दुआन सेक्शन में अवैध रूप से प्रवेश की है और वहां अवैध निर्माण कर रही है। भारतीय सेना अपनी सीमा में आने वाली गलवान नदी के इलाके में निर्माण कार्य कर रही है। जिसे लेकर चीन ने आपत्ति जताई है। चीन का कहना है कि भारत अपनी सीमा को और आगे बढ़ाना चाहता है।

हाल ही में धारचूला को लिपुलेख दर्रा से जोड़ कर भारत ने एक और बड़ी सामरिक कामयाबी हासिल की। अब सैनिकों के लिए भारतीय चौकियों तक पहुंचना बेहद आसान हो गया है। साथ ही 17000 फुट की ऊंचाई पर स्थित लिपुलेख दर्रा तक भारतीय थल सेना के लिए रसद और युद्ध सामग्री को पहुंचाया जा सकता है। 80 किलोमीटर लम्बी इस सड़क की ऊंचाई 6,000 से 17,060 फीट तक है। लद्दाख के पास अक्साई चीन से सटी सीमा पर अक्सर चीनी सैनिक घुसपैठ करते आए हैं। अगर तुलना की जाए तो लिंक रोड के बनने से लिपुलेख और कालापानी के इलाके में भारत सामरिक तौर पर भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि चीन से प्रेरित नेपाल ने लिपुलेख दर्रे को मानसरोवर रूट से जोड़ने पर ऐतराज जताया है और इस पर फिर अपना दावा किया है।

दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी सड़क को लेकर चीन को हमेशा से ही दिक्कत रही है। सूत्रों के मुताबिक दोनों पक्षों में गलवान नदी और पैगोंग सो झील के आसपास के चार इलाकों में निर्माण को लेकर विवाद हुआ। गलवान घाटी में चीन के सैनिक तैनात हैं। इन इलाकों में दोनों पक्षों की ओर से सीमा पर गश्त होती है।
भारत और चीन की 3488 किलोमीटर लंबी सीमा पर कई बिंदु ऐसे भी हैं जहां दोनों देशों के बीच विवाद है। 1962 में दोनों देश दो अलग-अलग मोर्चों पर युद्ध भी लड़ चुके हैं। चीन की महत्वकांक्षी कम्युनिस्ट सरकार अपने देश को सुपर पॉवर बनने की राह में भारत को रोड़ा मानती है।
जानिए उन इलाकों के बारे में जहां चीन और भारत के बीच है सीमा विवाद:
अक्साई चिन
1962 के युद्ध में चीन ने भारत के अक्साई चिन पर कब्जा कर लिया था। तबसे दोनों देशों के बीच यह क्षेत्र विवाद का कारण बना हुआ है। कहने को तो अक्साई चिन शीत मरुभूमि है लेकिन रणनीतिक रूप से इस क्षेत्र की बड़ी अहमियत है। 
अरुणाचल प्रदेश
चीन अरुणाचल प्रदेश के तवांग सहित कई इलाकों पर अपना दावा करता है। चीन इसे दक्षिणी तिब्बत का एक हिस्सा बताता है। वह दोनों देशों के बीच की मैकमोहन लाइन को भी मानने से इनकार करता रहा है। चीन अजीब तर्क देता है कि 1914 में तिब्बत के प्रतिनिधियों और ब्रिटिश भारत के बीच हुए समझौते में वह शामिल नहीं था और तिब्बत इस समय चीन का हिस्सा है इसलिए उसके किए गए किसी भी समझौते का महत्व नहीं है।
पैगोंग त्सो झील
भारत और चीन के बीच मौजूद 134 किलोमीटर लंबी यह झील विवाद में कई बार आ चुकी है। 14000 फुट से ज्यादा की ऊंचाई पर स्थित इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत में जबकि 90 किलोमीटर क्षेत्र चीन में पड़ता है। एलएसी लाइन इस झील से होकर गुजरती है। कई बार भारतीय और चीनी सैनिक इस झील में भी आमने-सामने आ चुके हैं। 1962 की लड़ाई में चीन ने इसी झील के जरिए सबसे भीषण हमला किया था।
गालवन घाटी
यह घाटी लद्दाख और अक्साई चिन के बीच एलएसी पर स्थित है। यह घाटी चीन के शिंजियांग प्रांत के दक्षिणी हिस्से से लेकर भारत के लद्दाख तक फैली हुई है। हाल के दिनों में चीन ने इसी इलाके में अपने सैनिकों के तादाद को बढ़ाया है। इस क्षेत्र में भारत सामरिक रूप से महत्वपूर्ण एक सड़क का निर्माण कर रहा है लेकिन चीन इसे रोकने के लिए हर संभव कोशिश में जुटा है। चीन पहले ही इस इलाके में महत्वपूर्ण निर्माण कर चुका है लेकिन अब भारत के निर्माण पर उसे आपत्ति है।
डोकलाम
2017 में डोकलाम को लेकर भारतीय और चीनी सेना के बीच 73 दिनों तक गतिरोध जारी रहा था। यह क्षेत्र भारत चीन और भूटान के बॉर्डर पर स्थित है। चीन ने 2017 में जब इस इलाके में सड़क बनाने की कोशिश की तब भारतीय सेना ने इसका कड़ा विरोध किया। जिसके कारण दोनों देशों की सेनाएं दो महीने से भी लंबें समय तक यहां आमने सामने डटी रहीं।
तवांग
अरुणाचल प्रदेश के तवांग को चीन अपना हिस्सा बताता है। उसका कहना है कि यह क्षेत्र दक्षिणी तिब्बत का भाग है। बता दें कि तवांग बौद्ध धर्म के पवित्र स्थलों में से एक है। 1962 के युद्ध में चीनी सेना तवांग तक पहुंच गई थी।

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