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EU के बाद अमेरिका से ‘Father of All Deals’: वैश्विक मंच पर भारत की निर्णायक छलांग से इकोनॉमी को मिले नए पंख

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यूरोपीय यूनियन के साथ “मदर ऑफ ऑल डील्स” के बाद अमेरिका से यह “Father of All Deals” से साफ हो गया है कि नया भारत अब शर्तें मानने वाला नहीं, बल्कि अपनी शर्तें तय करने वाला देश बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत वैश्विक सप्लाई चेन का मजबूत स्तंभ बनकर उभरा है। अमेरिका से डील के साथ ही कपड़ा, फुटवियर, ज्वेलरी और डायमंड सेक्टर को मिलने वाली यह जेट स्पीड केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि विकसित भारत की उड़ान का संकेत है। यह समझौता आने वाले वर्षों में भारत को निर्यात महाशक्ति बनाने की नींव रखेगा और यह मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक है। वैश्विक मंच पर भारत ने जो निर्णायक छलांग लगाई है वह अब अमेरिका के साथ “फादर ऑफ ऑल डील्स” से हमारी इकोनॉमी की रफ्तार में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाली है। यह सिर्फ एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत की बदली हुई वैश्विक छवि का प्रमाण है। कभी आयात-निर्भर रहने वाला देश अब निर्यात आधारित महाशक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

ट्रेड डील से खुले निर्यात के नए द्वार, उत्पाद होंगे प्रतिस्पर्धी
इस भारत-अमेरिका ट्रेड डील का सबसे बड़ा फायदा कपड़ा, फुटवियर, ज्वेलरी और डायमंड जैसे रोजगार-प्रधान सेक्टरों को मिलने जा रहा है। मीडिया की रिपोर्ट्स के अनुसार इन क्षेत्रों में कुल मिलाकर करीब 20 प्रतिशत तक निर्यात बढ़ने की संभावना है। अकेले जेम्स एंड ज्वेलरी सेक्टर में 10 प्रतिशत तक की सीधी बढ़ोतरी का अनुमान लगाया जा रहा है। अब तक अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों पर औसतन 29.7 प्रतिशत तक टैरिफ लगता था, जो इस डील के बाद घटकर करीब 10.7 प्रतिशत रह जाएगा। यानी झींगा, केमिकल्स, गारमेंट, फुटवियर और जेम्स-ज्वेलरी जैसे सेक्टरों में शुल्क लगभग आधा हो जाएगा। इससे भारतीय सामान अमेरिकी बाजार में सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनेगा। जयपुर के जौहरियों को ही एक हजार करोड़ के आर्डर की उम्मीद
अंतरराष्ट्रीय व्यापार केवल आंकड़ों का खेल नहीं होता, बल्कि यह भरोसे, स्थिर नीतियों और समय पर लिए गए फैसलों का परिणाम होता है। भारत–अमेरिका के बीच हाल ही में हुई ट्रेड डील ने यही साबित किया है। अमेरिका में आयोजित तुसान जेम एंड ज्वेलरी शो में अकेले जयपुर के जौहरियों की बढ़ती मौजूदगी इस बात का संकेत है कि सही नीतिगत निर्णय किस तरह जमीनी स्तर पर असर दिखाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में टैरिफ वॉर ने भारतीय रत्न-आभूषण उद्योग को नुकसान पहुंचाया। अमेरिकी बाजार में आयात शुल्क बढ़ने से जयपुर जैसे पारंपरिक ज्वेलरी हब की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर हुई। नतीजा यह हुआ कि जहां पहले ऑर्डर की बातचीत होती थी, वहां ज्वेलर्स को कीमतों को जायज ठहराने में ही ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही थी। लगभग 100 करोड़ का अतिरिक्त बोझ इस उद्योग पर पड़ा, जिसने छोटे और मझोले कारोबारियों को सबसे अधिक प्रभावित किया। तुसान शो इस बदले हुए माहौल का पहला ठोस प्रमाण बनकर सामने आया है। अमेरिकी खरीदारों की रुचि यह बताती है कि जयपुर की मीनाकारी, कुंदन और हस्तनिर्मित ज्वेलरी अब फिर से अपनी पहचान बना रही है। अनुमानित 1000 करोड़ के संभावित ऑर्डर मिलने की उम्मीद जगी है।देशभर के जौहरियों के लिए एक नई और उत्साहवर्धक शुरुआत

मोदी सरकार और उद्योग जगत के लिए यह समय अवसर को रणनीति में बदलने का है। 15 फरवरी तक चलने वाले तुसान शो से मिले संकेतों को नीति समर्थन, आसान निर्यात प्रक्रियाओं और वैश्विक मार्केटिंग के साथ जोड़ा जाए, तो जयपुर न केवल भारत का, बल्कि दुनिया का प्रमुख जेम एंड ज्वेलरी हब बन सकता है। दरअसल, रत्न-आभूषण उद्योग केवल निर्यात तक सीमित नहीं है; यह लाखों कारीगरों की रोज़ी-रोटी से जुड़ा हुआ है। जब अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर घटते हैं, तो उसका सीधा असर स्थानीय कारीगरों, शिल्पकारों और छोटे वर्कशॉप्स पर पड़ता है। इस दृष्टि से ट्रेड डील का प्रभाव केवल विदेशी मुद्रा अर्जन तक सीमित नहीं, बल्कि रोजगार सुरक्षा और पारंपरिक कला संरक्षण से भी जुड़ा हुआ है। अंततः यह स्पष्ट है कि ट्रेड डील ने दरवाजा खोला है। तुसान शो की चमक अगर सही दिशा में आगे बढ़ी तो जयपुर के साथ ही देशभर के जौहरियों के लिए यह एक नई और उत्साहवर्धक शुरुआत साबित हो सकती है। ज्वेलरी सेक्टर में टैरिफ 52 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत होने जा रहा है। साथ ही सोना-चांदी के बेस इंपोर्ट प्राइस में कटौती से कच्चा माल सस्ता होगा। इससे डायमंड कटिंग, गोल्ड बार और सिल्वर बुलियन उद्योग को जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा। भारत, जो पहले से ही दुनिया का बड़ा डायमंड प्रोसेसिंग हब है, अब ग्लोबल ज्वेलरी सप्लाई चेन का केंद्र बनने की ओर बढ़ रहा है।

कपड़ा उद्योग को सबसे बड़ा बूस्ट, फुटवियर को मिलेगी ‘जेट स्पीड’
गारमेंट और टेक्सटाइल सेक्टर लंबे समय से वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बांग्लादेश और वियतनाम से पिछड़ रहा था। लेकिन ट्रेड डील से अब तस्वीर बदलने वाली है। अमेरिका में बांग्लादेश पर 16.2 प्रतिशत, श्रीलंका पर 15.97 प्रतिशत और पाकिस्तान पर 12.23 प्रतिशत टैरिफ बने रहेंगे, जबकि भारत को बड़ी राहत मिलेगी। इससे भारतीय कपड़ा उद्योग को सीधा फायदा होगा और लाखों नई नौकरियों के अवसर बनेंगे। फुटवियर उद्योग भी इस डील का बड़ा लाभार्थी बनने जा रहा है। अभी इस सेक्टर पर करीब 58.5% तक शुल्क लगता है, जो घटकर 26% रह जाएगा। इससे भारत के चमड़ा और जूता निर्माता अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रतिस्पर्धा कर पाएंगे।पीएम मोदी के मेक इन इंडिया को मिलेगा वैश्विक प्लेटफॉर्म
यह डील सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि “मेक इन इंडिया” को वैश्विक पहचान दिलाने की रणनीति है। अमेरिकी कंपनियां अब भारत में मैन्युफैक्चरिंग करने के लिए ज्यादा इच्छुक होंगी क्योंकि यहां उत्पादन सस्ता है और बाजार विशाल। इससे एफडीआई बढ़ेगा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर होगा और स्किल्ड रोजगार पैदा होंगे। सरकार द्वारा सोना-चांदी के बेस इंपोर्ट प्राइस घटाने से आयात पर लगने वाला शुल्क कम होगा। इससे ज्वेलरी निर्माण की लागत घटेगी और निर्यातक ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा गोल्ड कंज्यूमर है और चांदी की 80% जरूरतें आयात से पूरी होती हैं, ऐसे में यह फैसला पूरे वैल्यू चेन को मजबूती देगा।

50 से 18 प्रतिशत तक: भारत को कौनसे सेक्टर होंगे बड़े फायदे
1) टेक्सटाइल और वस्त्र उद्योग
भारतीय वस्त्र निर्यात विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा में हैं, परंतु उच्च टैरिफ दरों के कारण उनके उत्पादों की पहुँच पर रोक थी। 18% टैरिफ दर से भारत की टेक्सटाइल कंपनियों को यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में प्रतिस्पर्धा में भारी लाभ मिलेगा। रूड्र नवीन कंपनियों के लिए यह वही अवसर है जिस पर “मेकर इन इंडिया” आधारित नई रणनीति फलित होगी।
2) फार्मास्यूटिकल्स और जैव प्रौद्योगिकी
भारत का फार्मास्यूटिकल सेक्टर दुनिया के कई हिस्सों में वह आधार बन चुका है जहाँ स्वास्थ्य सेवा की लागत कम होती है। टैरिफ में कमी से अमेरिकी बाज़ार में भारतीय मेडिसिन की उपलब्धता और विस्तार होगा, जिससे घरेलू कंपनियों की निर्यात वृद्धि दर और R&D निवेश दोनों को मजबूती मिलेगी।
3) ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स
कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर पर 18% की दर अमेरिका में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगी। यह न केवल उत्पादन की लागत घटाएगी, बल्कि उत्पादन केंद्र भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार बना देगी।
4) कृषि और खाद्य प्रसंस्करण
भारतीय कृषि उत्पाद और मूल्य-वर्धित खाद्य पदार्थों की विदेशी माँग वर्षों से निरंतर बढ़ रही है। अमेरिका जैसे वितरित बाजार में 18% टैरिफ दर से भारतीय उत्पादों की आपूर्ति लाभदायक होगी और आयात-निर्यात संतुलन में भी संतुलन आएगा। इसके अलावा और भी सेक्टर हैं, जिनमें भारत को फायदा होगा।

छोटे उद्योगों को मिलेगा बड़ा सहारा, घुसपैठ नहीं निवेश आएगा
एमएसएमई सेक्टर, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, इस डील से सीधा लाभ पाएगा। टेक्सटाइल क्लस्टर, लेदर हब और जेम्स पार्क में नई मांग पैदा होगी। इससे छोटे कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय ग्राहक मिलेंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। जहां पहले विदेशी कंपनियां केवल भारतीय बाजार में सामान बेचने आती थीं, अब वे भारत में फैक्ट्री लगाने की योजना बना रही हैं। यह बदलाव मोदी सरकार की स्थिर नीति, आसान व्यापार वातावरण और मजबूत बुनियादी ढांचे का नतीजा है। यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक जीत भी है। अमेरिका जैसे बड़े बाजार का भारत पर भरोसा दिखाता है कि दुनिया अब भारत को सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि उत्पादन साझेदार मान रही है।

आत्मनिर्भर भारत के मोदी मॉडल को अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति
यह डील आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को जमीन पर उतारने का बड़ा माध्यम है—जहां भारत सिर्फ उपभोग नहीं करेगा, बल्कि वैश्विक मांग को पूरा करेगा। आज भारत की नीतियां अनुमानित, स्थिर और विकासोन्मुख हैं। यही वजह है कि वैश्विक निवेशक भारत को “सेफ बेट” मान रहे हैं। जीएसटी सुधार, लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल इंडिया जैसे कदमों ने व्यापार को आसान बनाया है। निर्यात बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होगा, रुपये को सहारा मिलेगा और लाखों युवाओं को रोजगार मिलेगा। कपड़ा, फुटवियर और ज्वेलरी जैसे श्रम-प्रधान सेक्टर ग्रामीण और अर्ध-शहरी भारत को सीधा फायदा पहुंचाएंगे।

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