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महायुद्ध के मुहाने पर खड़ी दुनिया और ‘विश्वमित्र’ प्रधानमंत्री मोदी: क्या संवाद ही बनेगा समाधान?

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28 फरवरी 2026 की सुबह ने पश्चिम एशिया को एक ऐसे संकट में धकेल दिया, जिसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हवाई हमलों ने ईरान को युद्ध की आग में झोंक उसके सैन्य ढांचे को हिलाकर रख दिया है। तेहरान की सड़कों पर उठता धुआं, सुप्रीम लीडर अली खामेनी की मौत के बाद उपजी अस्थिरता और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में युद्धपोतों की तैनाती- ये सब इस बात का संकेत हैं कि दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की दहलीज पर खड़ी है। लेकिन इस बढ़ते अंधेरे के बीच, वैश्विक मंच पर एक नाम बार-बार उभर रहा है- नरेंद्र मोदी। उनकी ‘संवाद ही समाधान’ की नीति को कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इस संकट में संभावित रास्ते के रूप में देख रहे हैं।

जब संयुक्त राष्ट्र बेअसर लग रहा है, महाशक्तियां एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं और ज्यादातर देश पक्ष चुन चुके हैं, तब भारत की निष्पक्ष स्थिति और प्रधानमंत्री मोदी की ‘संवाद ही समाधान’ वाली अपील दुनिया के लिए अंतिम उम्मीद बन गई है। युद्ध के महज तीन हफ्तों में वैश्विक विशेषज्ञों ने खुलकर कहा है कि पीएम मोदी ही इस संघर्ष को रोक सकते हैं।

संकट की गंभीरता और मोदी की तत्काल सक्रियता
फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुआ यह संघर्ष पिछले तीन हफ्तों में भयावह रूप ले चुका है। ईरान ने जवाब में 700 से अधिक मिसाइलें और हजारों ड्रोन दागे हैं। वैश्विक तेल की कीमतें 115 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं, जिससे दुनिया भर में महंगाई का संकट पैदा हो गया है। इस संवेदनशील घड़ी में प्रधानमंत्री मोदी ने जो सक्रियता दिखाई, उसने दुनिया को अचंभित कर दिया। युद्ध शुरू होने के महज 48 घंटों के भीतर, 2 मार्च को उन्होंने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात की।

इसके बाद 12 मार्च को ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से सीधा संवाद किया। हर बातचीत में संदेश एक था- सैन्य संघर्ष हल नहीं, संवाद और कूटनीति ही रास्ता है। उन्होंने नागरिक सुरक्षा, ऊर्जा स्थिरता और क्षेत्रीय शांति पर जोर दिया।

इसके अलावा, इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद, जॉर्डन के किंग अब्दुल्ला, कतर के अमीर, कुवैत के क्राउन प्रिंस, ओमान के सुल्तान, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम से भी बात की। यह फोन डिप्लोमेसी भारत की सक्रिय शांति कूटनीति का प्रमाण है।

वैश्विक विशेषज्ञों की आवाज: सिर्फ मोदी ही रोक सकते हैं युद्ध
युद्ध शुरू होते ही दुनिया की नजरें प्रधानमंत्री मोदी पर आकर टिक गईं। इस दौरान तीन प्रमुख हस्तियों के बयान अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाए रहे। सबसे प्रभावशाली बयान आया रिटायर्ड अमेरिकी कर्नल डॉगलस मैकग्रेगर का। टकर कार्लसन के पॉडकास्ट और हालिया इंटरव्यूज में उन्होंने साफ कहा कि यूएस-इजरायल-ईरान युद्ध को रोकने के लिए एक मध्यस्थ चाहिए और वह आदर्श रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं। मैकग्रेगर ने जोर दिया कि भारत की निष्पक्षता, पीएम मोदी की दोनों पक्षों तक व्यक्तिगत पहुंच और भारत की उभरती वैश्विक शक्ति इसे संभव बनाती है। उन्होंने यहां तक सुझाव दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति को पीएम मोदी से सीधा संपर्क करना चाहिए।

दूसरा बड़ा बयान यूएई के पूर्व राजदूत हुसैन हसन मिर्जा का आया। हुसैन हसन मिर्जा ने भारतीय मीडिया को दिए इंटरव्यू में यहां तक कह दिया कि प्रधानमंत्री मोदी की सिर्फ एक फोन कॉल इजरायल और ईरान के नेतृत्व को युद्ध रोकने पर मजबूर कर सकती है। उनके पास वह ‘नैतिक पूंजी’ है जो आज किसी के पास नहीं है। उन्होंने कहा कि ‘भारत एक महान देश है। मिस्टर मोदी इजरायल और ईरान दोनों को रोकने के लिए एक फोन कॉल करें, तो यह रुक जाएगा। मिस्टर मोदी 10 दिन पहले इजरायल में थे। मिस्टर मोदी के ईरान के साथ बहुत, बहुत अच्छे रिश्ते हैं। वह ईरान के तेल के बड़े खरीदार हैं। बहुत आसान है… मिस्टर मोदी के एक फोन कॉल से प्रॉब्लम सॉल्व हो जाएगी।’

तीसरी महत्वपूर्ण आवाज फिनलैंड के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर स्टब की ओर से आई। फिनलैंड के राष्ट्रपति स्टब ने ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता उसे इस संघर्ष में सबसे विश्वसनीय वार्ताकार बनाती है। उन्होंने कहा कि ईरान-यूएस संघर्ष रोकने के लिए भारत को मध्यस्थता करनी चाहिए। स्टब ने भारत की आर्थिक शक्ति, नॉन-एलाइनमेंट नीति और स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का जिक्र किया। उन्होंने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया कि पीएम मोदी को कॉल करें और भारत तनाव कम करने में भूमिका निभा सकता है।

ये बयान भारत की कूटनीति का नतीजा हैं। भारत दुनिया का इकलौता प्रमुख देश है जो इजरायल, ईरान और अमेरिका तीनों से मजबूत संबंध रखता है-
• इजरायल के साथ: भारत और इजरायल के बीच रक्षा साझेदारी और कृषि-तकनीक के क्षेत्र में अटूट रिश्ता है। प्रधानमंत्री मोदी और पीएम नेतन्याहू की केमिस्ट्री कूटनीतिक हलकों में प्रसिद्ध है।
• ईरान के साथ: भारत के ईरान के साथ काफी पुराने संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह के माध्यम से भारत की कनेक्टिविटी और ऊर्जा सुरक्षा ईरान से जुड़ी है। भारत ने कभी भी ईरान को अलग-थलग करने की पश्चिमी कोशिशों का समर्थन नहीं किया।
• अमेरिका के साथ: भारत अमेरिका का ‘कॉम्प्रिहेंसिव ग्लोबल स्ट्रैटेजिक पार्टनर’ है। प्रधानमंत्री मोदी वाशिंगटन को यह समझाने की स्थिति में हैं कि ईरान के साथ पूर्ण युद्ध अमेरिका के अपने हितों के खिलाफ होगा।

मोदी मॉडल: यूक्रेन युद्ध से मिली सीख
आज जो भरोसा दुनिया प्रधानमंत्री मोदी पर जता रही है, उसकी नींव 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान रखी गई थी। जब दुनिया दो गुटों में बंटी थी, तब समरकंद में प्रधानमंत्री मोदी ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से कहा था ‘This is not an era of war’ यानी यह युद्ध का युग नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि ‘मैं जानता हूं कि आज का युग युद्ध का युग नहीं है और हमने आपसे फोन पर कई बार बात की है कि लोकतंत्र, कूटनीति और संवाद ऐसी चीजें हैं जो दुनिया को प्रभावित करती हैं।’

प्रधानमंत्री मोदी का यह वाक्य G20 दिल्ली घोषणापत्र का हिस्सा बना। अमेरिकी प्रशासन से लेकर यूरोपीय संघ तक ने इसे शांति का नया वैश्विक ‘डॉक्ट्रीन’ माना। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इसका स्वागत किया और कहा कि पीएम मोदी की आवाज मायने रखती है। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने प्रधानमंत्री मोदी को शांति वार्ता की मेजबानी का न्योता दिया और यूरोपीय नेता ने भी तारीफ की। भारत ने दोनों पक्षों से बात की, मानवीय सहायता दी, लेकिन पक्ष नहीं चुना। आज वही मॉडल ईरान संकट में काम कर रहा है– consistent, निष्पक्ष और संवाद-केंद्रित।

असल में भारत ‘तटस्थ’ नहीं, ‘शांति के पक्ष’ में है। मोदी सरकार की नीति situational नहीं, consistent है। भारत ने हमेशा संप्रभुता का सम्मान, नागरिक सुरक्षा और कूटनीति पर जोर दिया है। जब पश्चिम एक तरफा स्टैंड ले रहा है और चीन-रूस दूसरी ओर बना हुआ है, तब भारत निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में उभरा है। हालांकि मध्यस्थता आसान नहीं है। ईरान में सत्ता संघर्ष, इजरायल की सुरक्षा चिंताएं जटिल हैं। लेकिन मैकग्रेगर, मिर्जा और स्टब जैसे विशेषज्ञ मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के पास ट्रस्ट कैपिटल है। यदि BRICS 2026 या किसी विशेष शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी दोनों पक्षों को टेबल पर लाते हैं, तो यह इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत होगी।

संवाद ही अंतिम उम्मीद
युद्ध कभी अंतिम समाधान नहीं रहा। अंततः मेज पर बैठकर ही संधियां होती हैं। प्रधानमंत्री मोदी की ‘संवाद ही समाधान’ वाली अपील आज मानवता की पुकार है। दुनिया अब भारत को बाजार नहीं, विश्वमित्र के रूप में देख रही है- जो पुल बनाता है, दीवारें नहीं। जब तेहरान और तेल अवीव पर मिसाइलें बरस रही हैं, तब नई दिल्ली से उठने वाली शांति की गूंज ही दुनिया को विनाश से बचा सकती है। जैसा मोदी कहते हैं – “शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, न्याय और सहयोग की उपस्थिति है।” आज दुनिया को इसी न्यायपूर्ण शांति की जरूरत है।

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