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झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए, PM Modi के समक्ष झुके Trump टैरिफ घटाया, India-EU की डील से घबराया अमेरिका

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कहते हैं कि दुनिया भी झुकती है, पर उसे झुकाने वाला दम होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सिर्फ यह कहावत कही ही नहीं, बल्कि उसे कूटनीतिक रणनीति से चरितार्थ करके भी दिखाया है। भारत-यूरोपीय संघ के बीच मदर ऑफ ऑल डील्स जैसी महत्तवाकांक्षी गठजोड़ के बाद न केवल यूरोपीय व्यापार मंडल ने भारत के साथ समझौते की नई दिशा अपनाई, बल्कि दूर महाशक्ति अमेरिका को भी अपनी पुरानी टैरिफ नीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया। दरअसल, पश्चिम की राजनीति में ट्रेड-डील केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं होती, वे सामरिक संबंधों का द्विपक्षीय समीकरण भी है। जब भारत ने बीते दो दशकों के बाद यूरोपीय संघ के साथ मजबूत साझेदारी का संकेत दिया, तो उसने वैश्विक व्यापार के मानचित्र को ही चुनौती दी। ऐसे समय जब कई विकसित देश अपने बाजारों को संरक्षणवाद की जाल में उलझा रहे हैं। भारत ने ना सिर्फ यूरोपीय बाजारों में प्रवेश के द्वार खोल दिए, बल्कि अपने उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाया। यूरोपीय संघ के साथ ही इसका बड़ा असर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के अड़ियल रवैये पर भी पड़ा। भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से जिस ट्रेड डील का इंतजार था, आखिरकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को उसकी घोषणा करनी पड़ी। यह विकसित राष्ट्र के लक्ष्य की ओर बढ़ रहे भारत की बहुत बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक जीत है। शेयर बाजार ने भी इन दोनों अहम डील की महत्ता को समझा और वह गुलजार हो गया।पीएम मोदी ने मौन रहकर बड़बोले शख्स को दिया करारा जवाब
भारत के लिए ये पल खुशी और गर्व के हैं। लेकिन सावधानी भी जरूरी है। वह अमेरिका जैसे ‘छणे रुष्टे, छणे तुष्टे’ जैसे मुल्क के लिए रूस और इजराइल जैसे भरोसेमंद दोस्तों को कभी नहीं खोना चाहेगा। बहरहाल इस टैरिफ वार से दुनिया को यह संदेश तो चला ही गया है कि जब 140 करोड़ के इस मुल्क की मुट्ठियां तनेंगी तो इसे झुकाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है। पीएम मोदी ने पूरे मामले में मौन रहकर यह साबित कर दिया है कि बड़बोले शख्स का जवाब देने के लिए बोलना जरूरी नहीं है। किसी लकीर को बिना मिटाये छोटा करने का उपाय यह है कि उससे बड़ी लकीर खींच दी जाए, भारत ने यही किया। ट्रम्प ने साबित किया है कि आप अमेरिका पर भरोसा नहीं कर सकते। उसकी दोस्ती सिर्फ व्यापारिक हितों पर निर्भर है। यूरोपीय यूनियन से भारत का व्यापारिक समझौता नहीं हुआ होता तो ट्रम्प इतनी जल्द नहीं झुकता। वैसे अमेरिकी फेडरल कोर्ट का फैसला भी आने वाला है। जानकारों का कहना है कि इसमें ट्रम्प के मनमाने टैरिफ को अवैध घोषित करने की पूरी संभावना है।आखिरकार डोनाल्ड ट्रंप को झुकना पड़ा क्यों और कैसे?
ऐसे समय में, जब विश्व आर्थिक मंदी और सप्लाई-चेन बाधाओं के दौर में व्यापार नीतियां फिर से विश्वसनीयता की कसौटी पर हैं। अमेरिका का भारत के प्रति टैरिफ को 50% से घटाकर 18% करना कोई मामूली खबर नहीं है। यह सिर्फ प्रतिशत की गिरावट नहीं, बल्कि एक राजनीतिक स्वीकारोक्ति है। दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने भारत की बढ़ती बाजार क्षमता, विनिर्माण ताकत और वैश्विक मांग को मान्यता दी है। अमेरिकी की लाख बंदिशों और धमकियों के बावजूद भारत अपने रुख पर ना सिर्फ अडिग रहा, बल्कि उसके दो दशक से लंबित भारत-ईयू डील को भी अंजाम दे दिया। अगर यह समझा जाए कि यह निर्णय अचानक नहीं आया, बल्कि भारत की निरंतर कूटनीतिक पहल, द्विपक्षीय वार्ता और रणनीतिक साझेदारी के मजबूत आधारों पर आधारित है, तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है। अमेरिका ने यह बदलाव इसलिए किया क्योंकि भारत की अर्थव्यवस्था अब केवल कम लागत वाला उत्पादन केंद्र ही नहीं रहा; वह उत्पादन, नवाचार और निर्यात का भरोसेमंद विकल्प बन चुका है।50 से 18 प्रतिशत तक: भारत को कौनसे सेक्टर होंगे बड़े फायदे?
1) टेक्सटाइल और वस्त्र उद्योग : भारतीय वस्त्र निर्यात विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा में हैं, परंतु उच्च टैरिफ दरों के कारण उनके उत्पादों की पहुँच पर रोक थी। 18% टैरिफ दर से भारत की टेक्सटाइल कंपनियों को यूरोपीय और अमेरिकी बाजारों में प्रतिस्पर्धा में भारी लाभ मिलेगा। रूड्र नवीन कंपनियों के लिए यह वही अवसर है जिस पर “मेकर इन इंडिया” आधारित नई रणनीति फलित होगी।
2) फार्मास्यूटिकल्स और जैव प्रौद्योगिकी : भारत का फार्मास्यूटिकल सेक्टर दुनिया के कई हिस्सों में वह आधार बन चुका है जहाँ स्वास्थ्य सेवा की लागत कम होती है। टैरिफ में कमी से अमेरिकी बाज़ार में भारतीय मेडिसिन की उपलब्धता और विस्तार होगा, जिससे घरेलू कंपनियों की निर्यात वृद्धि दर और R&D निवेश दोनों को मजबूती मिलेगी।
3) ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स : कंपोनेंट्स और सेमीकंडक्टर पर 18% की दर अमेरिका में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाएगी। यह न केवल उत्पादन की लागत घटाएगी, बल्कि उत्पादन केंद्र भारत को ग्लोबल सप्लाई चेन का एक महत्वपूर्ण हिस्सेदार बना देगी।
4) कृषि और खाद्य प्रसंस्करण : भारतीय कृषि उत्पाद और मूल्य-वर्धित खाद्य पदार्थों की विदेशी माँग वर्षों से निरंतर बढ़ रही है। अमेरिका जैसे वितरित बाजार में 18% टैरिफ दर से भारतीय उत्पादों की आपूर्ति लाभदायक होगी और आयात-निर्यात संतुलन में भी संतुलन आएगा।     इसके अलावा और भी सेक्टर हैं, जिनमें भारत को फायदा होगा।

आज का भारत: विकसित भारत की दिशा में एक और कदम
कॉर्पोरेट नफा-नुकसान की भाषा से ऊपर उठकर यह समझना आवश्यक है कि टैरिफ में कमी का अर्थ केवल आर्थिक लाभ ही नहीं है। यह भारत की वैश्विक हिस्सेदारी को पहचान देना भी है। यह निर्णय बताता है कि बड़े अर्थव्यवस्थाएं अब भारत को मात्र विकल्प नहीं, बल्कि मुख्य साझेदार के रूप में स्वीकार कर रही हैं। यह वही भारत है जिसने पिछले दशक की तुलना में दोहरी गति से विकास की दिशा अपनाई है। जहां डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण आधार, नवाचार वित्त और वैश्विक साझेदारी सब की गति बढ़ी है। इस व्यापार निर्णय से भारत की GDP वृद्धि संभावित रूप से और तेज होगी, क्योंकि निर्यात में इजाफा घरेलू उत्पादन को और प्रोत्साहित करेगा। पीएम मोदी का लक्ष्य भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने का है। यह लक्ष्य सिर्फ आकांक्षा नहीं, डेटा-समर्थित वास्तविकता है। इसमें निर्यात की बढ़ती रफ्तार, विदेशी निवेश की नई धारा, विनिर्माण और तकनीक में आत्मनिर्भरता और अब मुक्त तथा प्रतिस्पर्धात्मक व्यापार नीति जैसे संकेतक शामिल हैं। इन संकेतों ने भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति का वह स्तर दिया है जहां एक बड़ा निर्णय—जैसे अमेरिका-भारत टैरिफ समझौता सीधे अर्थव्यवस्था की काया ही बदल सकता है।

जब रणनीति कूटनीति बन जाती है, तब इतिहास लिखता है
दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से जिस ट्रेड डील का इंतजार था, सोमवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उसकी घोषणा कर दी। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका ने भारत पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया है। ट्रम्प ने अप्रैल में 25% रेसिप्रोकल टैरिफ (जैसे को तैसा) लगाया था और रूस से तेल खरीदने के कारण अगस्त में 25% पेनल्टी का ऐलान किया था। इससे भारत पर कुल टैरिफ 50% हो गया था। अब व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने न्यूज एजेंसी ANI को बताया कि भारत पर सिर्फ टैरिफ 18% ही लगेगा। अमेरिका रूसी तेल खरीदने के कारण लगा 25% टैरिफ हटा देगा। ट्रम्प ने सोमवार सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत की। इसके बाद रात करीब 10:30 बजे ट्रम्प ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ट्रेड डील की घोषणा की। ट्रम्प के मुताबिक, जरूरत पड़ी तो भारत वेनेजुएला से तेल लेगा। भारत ‘बाय अमेरिकन’ नीति के तहत अमेरिका से 46 लाख करोड़ रुपए (500 अरब डॉलर) से अधिक का सामान खरीदेगा। 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सोशल मीडिया पोस्ट में यह लिखा…
आज सुबह भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात करना मेरे लिए सम्मान की बात थी। हमने रूस-यूक्रेन युद्ध सहित कई मुद्दों पर चर्चा की। भारत अब अमेरिका से ज्यादा तेल खरीदेगा। इसके अलावा वेनेजुएला से तेल खरीदने की संभावना पर भी बात हुई। इससे यूक्रेन में चल रहा युद्ध खत्म करने में मदद मिलेगी, जहां हर हफ्ते हजारों लोगों की जान जा रही है।प्रधानमंत्री मोदी की दोस्ती, सम्मान और उनके अनुरोध पर, हमने अमेरिका और भारत के बीच तुरंत एक ट्रेड डील पर सहमति बनाई है। इसके तहत अमेरिका भारत पर लगाया जाने वाला रेसिप्रोकल टैरिफ 25% से घटाकर 18% करेगा। वहीं भारत भी अमेरिका के खिलाफ अपने टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं को घटाकर शून्य करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। PM मोदी ने ‘बाय अमेरिकन’ को लेकर भी बड़ी प्रतिबद्धता जताई है। इसके तहत भारत अमेरिका से 500 अरब डॉलर से ज्यादा के ऊर्जा, तकनीक, कृषि, कोयला और अन्य उत्पाद खरीदेगा। मुझे पूरा भरोसा है कि भारत और अमेरिका के रिश्ते आगे और भी मजबूत होंगे।

मोदी बोले- हमारी पार्टनरशिप को ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए उत्सुक हूं
PM मोदी ने लिखा कि मुझे राष्ट्रपति ट्रम्प से बात करके बहुत खुशी हुई। यह जानकर बेहद संतोष है कि अब मेड इन इंडिया उत्पादों पर टैरिफ घटाकर 18% कर दिया गया है। इस शानदार फैसले के लिए भारत के 1.4 अरब लोगों की ओर से राष्ट्रपति ट्रम्प का दिल से धन्यवाद। प्रधानमंत्री ने आगे लिखा कि जब दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र एकसाथ मिलकर काम करते हैं, तो इससे हमारे लोगों को लाभ होता है और आपसी सहयोग के नए और बड़े मौके खुलते हैं। मैं उनके साथ मिलकर काम करने और हमारी पार्टनरशिप को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए उत्सुक हूं।

ट्रम्प-मोदी की दोस्ती डील की सबसे बड़ी वजह बनी-गोर
भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने मीडिया से बातचीत में भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील होने की पुष्टि की। उन्होंने कहा- कुछ तकनीकी कागजों पर अगले कुछ दिनों में दस्तखत होंगे, लेकिन डील लगभग तय है। गोर ने कहा- यह टैरिफ समझौता प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के बीच कई सालों से चली आ रही मजबूत दोस्ती का नतीजा है। यह टैरिफ दूसरे देशों की तुलना में बहुत कम है। पहले भारत पर काफी ज्यादा टैरिफ लगता था, लेकिन अब भारत उन देशों में आ गया है जिन पर कम टैरिफ है। राजदूत गोर के मुताबिक, ट्रम्प और मोदी की दोस्ती इस डील को पूरा करने में सबसे बड़ी वजह बनी। गोर ने कहा कि अमेरिका और भारत के रिश्तों में बहुत बड़ी संभावनाएं हैं। इस व्यापार समझौते के बाद दोनों देशों के रिश्तों का अगला दौर शुरू होगा। इस बीच व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने भी न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया है कि अमेरिका, भारत से आने वाले सामान पर लगाया गया वह एक्स्ट्रा टैरिफ हटा देगा, जो रूस से तेल खरीदने के बदले सजा के तौर पर लगाया गया था।

ट्रम्प ने इंडिया गेट और मोदी के साथ फोटो शेयर की
ट्रम्प ने मोदी से फोन पर बातचीत से पहले अपने सोशल मीडिया ‘ट्रुथ सोशल’ पर भारत से जुड़ी दो तस्वीरें पोस्ट की थीं। एक में उन्होंने इंडिया गेट की फोटो शेयर की थी, जबकि दूसरे में एक भारतीय मैगजीन का कवर शेयर किया था, जिस पर पीएम मोदी के साथ उनकी तस्वीर छपी थी। ट्रम्प ने इंडिया गेट की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- भारत का ट्रायम्फल आर्च (इंडिया गेट) बहुत खूबसूरत है। हमारा वाला इन सब में सबसे शानदार होगा! दरअसल ट्रम्प राजधानी वाशिंगटन डीसी में अपने नाम से एक विशाल दरवाजा बनवाने का प्लान कर रहे हैं। इस स्मारक को ‘आर्क डी ट्रम्प’ नाम दिया गया है। इसका इस्तेमाल वर्जीनिया राज्य से राजधानी में प्रवेश के लिए किया जाएगा। इसका डिजाइन पेरिस के आर्क डी ट्रायम्फ से मिलता-जुलता है। व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कुछ महीने पहले CNN को बताया था कि इस आर्क का आइडिया खुद ट्रम्प का था। ट्रम्प इस आर्क के डिजाइन बनाने की प्रक्रिया में भी शामिल रहे।

ट्रम्प ने 13 महीने में 7 बार पीएम मोदी से फोन पर बात की
ट्रम्प ने पीएम मोदी से आज से पहले दिसंबर में फोन पर बातचीत की थी। तब पीएम मोदी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर इसकी जानकारी शेयर की थी। मोदी ने कहा था कि उनकी बातचीत गर्मजोशी भरी और सकारात्मक रही। उन्होंने बताया था कि दोनों नेताओं ने दोनों देशों के संबंधों में हुई प्रगति की समीक्षा की। साथ ही क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भी चर्चा की। मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका वैश्विक शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए मिलकर काम करते रहेंगे। बातचीत में दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया। साथ ही अहम तकनीक, ऊर्जा, रक्षा और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने पर भी सहमति बनी। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद से उनकी और पीएम मोदी की अब तक 7 बार फोन पर बातचीत हो चुकी है। सबसे पहले 27 जनवरी 2025 को पीएम मोदी ने ट्रम्प को राष्ट्रपति बनने की बधाई देने के लिए फोन किया था। 22 अप्रैल को ट्रम्प ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद मोदी को फोन कर दुख जताया था। इसके बाद ट्रम्प ने 17 जून को मोदी को फोन कर नोबेल के लिए नॉमीनेट करने को कहा, 17 सितंबर को जन्मदिन की बधाई देने और 21 अक्टूबर को दिवाली की शुभकामनाएं देने के लिए फोन किया था। फिर 11 दिसंबर को दोनों नेताओं ने बात की थी।

भारत ने 2024 में दोबारा वेनेजुएला से तेल खरीदना शुरू किया
अमेरिका ने 2019 में वेनेजुएला पर बहुत कड़े आर्थिक प्रतिबंध (सेंक्शंस) लगा दिए थे, अमेरिका ने सेकेंडरी सेंक्शंस भी लगा दिए, यानी जो भी देश या कंपनी वेनेजुएला से तेल खरीदती है, उसे अमेरिकी बाजार में व्यापार करने या बैंकिंग सुविधाओं से रोक दिया जा सकता था। इस वजह से कई देशों ने वेनेजुएला का तेल खरीदना बंद कर दिया। भारत भी वेनेजुएला से बहुत ज्यादा तेल खरीदता था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया है कि तब भारत अपने कुल तेल आयात का लगभग 6% वेनेजुएला से लेता था। वेनेजुएला पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) का सदस्य है। उसके पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, लेकिन वह वैश्विक सप्लाई का करीब 1% ही देता है। अमेरिका ने कुछ समय के लिए (2023-2024 में) वेनेजुएला पर आंशिक रूप से सेंक्शंस ढीले किए, जिससे भारत ने फिर से वेनेजुएला से तेल खरीदा। 2024 में भारत का आयात औसतन 63,000 से 1 लाख बैरल प्रतिदिन तक पहुंच गया। इसके बाद 2025 में वेनेजुएला से भारत का तेल आयात बढ़कर करीब 1.41 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन मई 2025 में अमेरिका ने एक बार फिर से वेनेजुएला के तेल पर सख्ती बढ़ा दी। इसके बाद 2026 की शुरुआत में वेनेजुएला से भारत का क्रूड आयात सिर्फ 0.3% रह गया।

आइए, अब कुछ दिन पहले हुई India-EU Deal पर एक नजर डाल लें। वैश्विक मंच पर उभार की यह आहट विकसित भारत की ओर बढ़ते कदमों का निर्णायक मोड़ बनने वाली है…

2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक मजबूत आर्थिक आधार
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौते (FTA) को लेकर दो दशकों से चल रही बातचीत आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। 27 देशों वाले ईयू ब्लॉक के साथ यह डील न केवल भारत की बाहरी व्यापार रणनीति का एक बड़ा अध्याय साबित होगी, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक मजबूत आर्थिक आधार भी तैयार करेगी। लंबे समय तक अटके रहने के बाद अब पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते यह समझौता आगे बढ़ा है। यह संकेत देता है कि भारत और यूरोप के जिन हितों पर वैश्विक भू-राजनीति का गहरा प्रभाव रहा है, आज एक निर्णायक बिंदु पर आकर मिल रहे हैं। मदर ऑफ ऑल डील्स कही जाने वाली यह डील केवल व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन, आर्थिक सुरक्षा, सप्लाई चेन स्थिरता और हरित अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक नई साझेदारी है। इसके साथ ही यह अमेरिकी राष्ट्रपति की उस दबंगई को भी सीधा और करारा जवाब है, जो मनमाने टैरिफ से बहाने दुनिया का दरोगा बनने पर उतारू है।

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच व्यापक व्यापार एवं निवेश समझौते (FTA) को लेकर दो दशकों से चल रही बातचीत आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंची है। 27 देशों वाले ईयू ब्लॉक के साथ यह डील न केवल भारत की बाहरी व्यापार रणनीति का एक बड़ा अध्याय साबित होगी, बल्कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में एक मजबूत आर्थिक आधार भी तैयार करेगी। लंबे समय तक अटके रहने के बाद अब पीएम नरेन्द्र मोदी के चलते यह समझौता आगे बढ़ा है। यह संकेत देता है कि भारत और यूरोप के जिन हितों पर वैश्विक भू-राजनीति का गहरा प्रभाव रहा है, आज एक निर्णायक बिंदु पर आकर मिल रहे हैं। मदर ऑफ ऑल डील्स कही जाने वाली यह डील केवल व्यापार का विस्तार नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन, आर्थिक सुरक्षा, सप्लाई चेन स्थिरता और हरित अर्थव्यवस्था के संदर्भ में एक नई साझेदारी है। इसके साथ ही यह अमेरिकी राष्ट्रपति की उस दबंगई को भी सीधा और करारा जवाब है, जो मनमाने टैरिफ से बहाने दुनिया का दरोगा बनने पर उतारू है।पीएम मोदी की पहल से दो दशक से फाइलों में दबा समझौता बाहर निकला
दो दशक से अधिक समय तक फाइलों में दबा पड़ा भारत–यूरोपीय संघ (EU) व्यापार समझौता पीएम मोदी की कुशल रणनीति के बाद अब अंततः एक नई ऊर्जा के साथ सामने आया है। यह केवल एक कूटनीतिक दस्तावेज नहीं, बल्कि उस बदलते भारत की पहचान है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के केंद्र में अपनी जगह सुनिश्चित करने के लिए आत्मविश्वास, क्षमता और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ रहा है। दुनिया की राजनीति और व्यापार के समीकरण इस कदर बदल चुके हैं कि भारत और यूरोप, जो लंबे समय से एक-दूसरे के बड़े साझेदार तो थे, लेकिन साथ-साथ कदमताल नहीं मिला पा रहे थे। अब इस साझा डील से नए रास्ता खोजने के लिए प्रेरित हुए हैं। यह डील इसलिए भी ऐतिहासिक है, क्योंकि इसके पीछे बीस वर्षों की कूटनीति, अनेक दौर की बातचीत, हिचकिचाहट, असहमति और अंततः समझदारी की दिशा में उठाया गए कदम शामिल हैं। जब 2007 में यह वार्ता शुरू हुई थी, तब भारत आज की तरह वैश्विक अर्थव्यवस्था का ध्रुवीय केंद्र नहीं था। ना ही तब वैश्विक मंच पर भारत को ताकत बनाने की सोच रखने वाली सरकार थी। लेकिन समय के साथ परिस्थितियां और सरकार बदली। यह बदलाव इतने व्यापक रहे कि भारत और ईयू दोनों को महसूस हुआ कि अब एक साझेदारी जरूरी है।भारत का वस्तु और सेवा निर्यात लगभग 750 बिलियन डॉलर
दरअसल, अमेरिकी दबाब के बीच यूरोप, चीन पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहता है और भारत उस जगह को भरने के लिए तैयार खड़ा है। यूरोप को भरोसेमंद, राजनीतिक रूप से स्थिर, योग्य मानव संसाधन वाला और तेजी से विकसित होता बाजार चाहिए। दूसरी ओर भारत को तकनीक, निवेश और एक ऐसा उपभोक्ता बाजार चाहिए, जो उसके उत्पादों को उचित पहचान दे सके। इन परस्पर जरूरतों ने दोनों को करीब आने के लिए प्रेरित किया है। आज भारत का वस्तु और सेवा निर्यात मिलकर लगभग 750 बिलियन डॉलर तक पहुंच चुका है। सरकार का लक्ष्य अगले दशक में इसे दोगुना करने का है। यह लक्ष्य तभी संभव है जब भारत ऐसे बड़े बाजारों से जुड़े, जिनके उपभोक्ता उच्च गुणवत्ता और विविधता को समझते हैं। यूरोपीय संघ इसी श्रेणी में आता है। यह दुनिया का सबसे बड़ा एकीकृत बाजार है। वर्तमान में भारत–ईयू व्यापार 170 बिलियन डॉलर के आसपास है, लेकिन यह उस संभावनाओं का केवल एक छोटा हिस्सा है, जो दोनों के बीच मौजूद हैं।

 

 

अब भारतीय उत्पाद यूरोपीय शेल्फों पर अधिक नजर आएंगे
यूरोप भारत के अधिकांश औद्योगिक उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ लगाता है। टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग, कैमिकल्स, फूड प्रोसेसिंग से लेकर लेदर तक। यदि ये शुल्क कम होते हैं, तो भारतीय उत्पाद यूरोपीय शेल्फों पर पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। निर्यात में तेजी और भारत के श्रम-प्रधान क्षेत्रों में रोजगार की वृद्धि—दोनों एक साथ संभव होंगे। करीब 50 से 70 बिलियन डॉलर का अतिरिक्त वार्षिक निर्यात भारत के विनिर्माण क्षेत्र को वह रफ्तार दे सकता है, जिसकी उसे वैश्विक उत्पादन केंद्र बनने के लिए आवश्यकता है। भारत को इस साझेदारी से दूसरा बड़ा लाभ मिलेगा- ज्यादा और बेहतर विदेशी निवेश का। यूरोप लंबे समय से भारत में निवेश करता रहा है, लेकिन यह निवेश जितना बड़ा हो सकता था, उतना अब तक नहीं हुआ। निवेश संरक्षण समझौते (IPA) पर सहमति बनने से यूरोपीय कंपनियों को भारत में एक स्थिर, सुरक्षित और भरोसेमंद माहौल मिलेगा। बदले में भारत को अत्याधुनिक तकनीक, हरित ऊर्जा में सहयोग और उच्च-स्तरीय उत्पादन की क्षमता प्राप्त होगी।

मदर ऑफ ऑल डील्स 2047 तक विकसित राष्ट्र की जमीन बनाएगी
इस मदर ऑफ ऑल डील्स से अगले पांच वर्षों में यूरोप से आने वाले निवेश में 20–30 प्रतिशत तक वृद्धि की संभावना व्यक्त की जा रही है। हरित उत्पादन की दिशा में बढ़ते कदम भारत को विश्व बाजार में “ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग” का केंद्र बना सकते हैं। विकसित भारत बनने की दिशा में यह परिवर्तन अनिवार्य है। यह शीशे की तरह साफ है कि यह बड़ा समझौता केवल व्यापार का विस्तार नहीं करेगा, बल्कि भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेगा। यह उस भारत की कहानी का हिस्सा है जो 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की राह पर है। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस भारत का सपना साकार करने की बात कही है। एक ऐसा भारत जो ना केवल आर्थिक रूप से समृद्ध हो, बल्कि तकनीकी रूप से अग्रणी और हरित ऊर्जा में आत्मनिर्भर हो, यह डील उस दिशा में एक बड़ा कदम है।

कुछ दिन पहले ही भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ पर सहमति बनी है। इससे यूरोप के 27 देशों के साथ हमारा व्यापार खूब फलेगा-फूलेगा। पंजाब के हमारे भाई-बहनों को भी इसका बहुत फायदा मिलने वाला है। pic.twitter.com/cIFUWDzJWC

भारत की दर्शक की नहीं, निर्माता और निर्णायक दोनों की भूमिका
इस अत्यंत महत्वपूर्ण समझौते के माध्यम से भारत को न सिर्फ़ बाजार मिलेगा, बल्कि पहचान, भरोसा और वैश्विक नेतृत्व का वह अवसर मिलेगा जो किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए दुर्लभ होता है। यूरोप जैसे विकसित और परिपक्व आर्थिक ब्लॉक से जुड़ना भारत को विश्व व्यापार के केंद्र में स्थापित करेगा। यह उस नए वैश्विक क्रम का संकेत है जिसमें भारत सिर्फ़ दर्शक नहीं, बल्कि निर्माता और निर्णायक दोनों की भूमिका निभा रहा है। दुनिया आज नए भू-राजनीतिक तनावों और आर्थिक अस्थिरताओं से घिरी हुई है। ऐसे समय में भारत–ईयू समझौता स्थिरता, सहयोग और साझेदारी का एक नया अध्याय खोलता है। यह समझौता भारत की उस चुपचाप बढ़ती ताक़त का प्रमाण है जिसे अब दुनिया अनदेखा नहीं कर सकती। यह बताता है कि भारत केवल वैश्विक बाजार का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी दिशा तय करने वाला देश बन रहा है। यह एक ऐसा अवसर है, जो भारत की विशाल क्षमता को वैश्विक मंच पर नए आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करेगा और विकसित भारत 2047 के संकल्प को हकीकत में बदलने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा।

ऐसे मिली भारत–ईयू व्यापार समझौता को मिली रफ्तार
1. विकसित भारत बनने की भारतीय महत्त्वाकांक्षा – प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत ने 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए निर्यात बढ़ाना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, उच्च-प्रौद्योगिकी निर्माण को बढ़ावा देना अनिवार्य है। ईयू समझौता भारत को इन तीनों क्षेत्रों में तेजी से आगे ले जा सकता है।
2. यूरोप का चीन से मोहभंग – यूरोप लंबे समय से चीन पर औद्योगिक आपूर्ति के लिए निर्भर रहा है, लेकिन महामारी के दौरान सप्लाई चेन टूटने, मानवाधिकार चिंताओं, चीनी निवेश की आक्रामक नीतियों के चलते उसका मोहभंग हो गया है। ऐसे में यूरोप को वैकल्पिक बाजारों की तलाश भारत स्वाभाविक पसंद बन गया। पीएम मोदी की नीतियों से जिसकी आर्थिक वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर है।
3. ट्रंप और अमेरिका फ़र्स्ट का उभार – दुनिया में संरक्षणवादी रुख बढ़ा है। अमेरिका, चीन संबंधों में तनातनी और वैश्विक सप्लाई चेन के विघटन ने भारत और यूरोप दोनों को विश्वसनीय साझेदार ढूंढ़ने पर मजबूर किया। WTO का स्तब्ध होना भी क्षेत्रीय समझौतों की जरूरत बढ़ा रहा है।

व्यापार विस्तार और ‘मेड इन इंडिया’ को यूरोप में बढ़ावा
भारत का लगभग 90% निर्यात—जैसे टेक्सटाइल, केमिकल्स, इंजीनियरिंग गुड्स—पर यूरोप भारी टैरिफ लगाता है। एक अनुमान के अनुसार, इस समझौते के बाद भारत के औद्योगिक निर्यात में 50–70 बिलियन डॉलर की वार्षिक वृद्धि संभव है। भारत की बड़ी अपेक्षा है कि टेक्सटाइल्स पर 8–12% शुल्क, लेदर और इंजीनियरिंग उत्पादों पर 6–10% शुल्क, एग्रो-प्रोसेस्ड फूड पर 15–30% शुल्क कम होंगे। इससे भारतीय उत्पाद यूरोपीय बाज़ार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएंगे। भारत को सबसे बड़ा तुरंत फायदा यह होने वाला है कि यूरोप दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता आयातक क्षेत्र है (GDP लगभग 17 ट्रिलियन डॉलर)। ऐसे में भारत के उद्योगों और MSME से लेकर बड़े निर्यातकों तक को एक विशाल बाजार मिलेगा। यूरोप आज भारत को सिर्फ एक निवेश गंतव्य नहीं, बल्कि वैश्विक स्थिरता में साझेदार के रूप में देख रहा है। यह भारत की नई शक्ति का संकेत है, जिसमें आर्थिक क्षमता, राजनीतिक स्थिरता और वैश्विक जिम्मेदारी तीनों समाहित हैं।

सुरक्षित और स्थिर निवेश माहौल ने भारत में बढ़ाया भरोसा
ईयू भारत में सबसे बड़ा निवेशक है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में FDI का लगभग 18% हिस्सा अकेले यूरोप से आता है। निवेश संरक्षण समझौते (IPA) से भारत को कई फायदे होने वाले हैं।
1. सुरक्षित और स्थिर निवेश माहौल – इससे टेक्नोलॉजी और हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग (EV, ग्रीन टेक, फार्मा) को लाभ मिलेगा।
2. यूरोपीय कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा – अनुमान है कि अगले 5 वर्षों में FDI में 20–30% वृद्धि हो सकती है।
3. हरित उत्पादन के लिए संयुक्त निवेश – बैटरी टेक्नोलॉजी, सोलर पैनल, हाइड्रोजन ऊर्जा में सहयोग बढ़ेगा। यह भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करेगा।

यूरोपीय मानकों के अनुरूप उत्पादन क्षमता बढ़ेगी
ईयू दुनिया के सबसे कड़े पर्यावरण मानक लागू करता है। CBAM (Carbon Border Adjustment Mechanism) भारत के लिए चुनौती भी है और अवसर भी। चुनौती इसलिए कि स्टील, सीमेंट, एल्यूमीनियम जैसे उद्योगों को कार्बन उत्सर्जन घटाने होंगे। उत्पादन लागत कुछ समय के लिए बढ़ सकती है। लेकिन बड़ा अवसर इसलिए कि है कि भारत के उद्योग जब वैश्विक मानकों के अनुरूप ढलेंगे, तो वे पूरी दुनिया में सबसे प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे। लंबी अवधि में यह मेड इन इंडिया को एक “ग्रीन ब्रांड” में बदल देगा। भारत की सबसे बड़ी ताकत आईटी इंजीनियर, डॉक्टर, प्रोफेशनल सेवा प्रदाता की यूरोप में सबसे बड़ी कमी है। इस डील में भारत ने वीजा प्रोसेसिंग, स्किल्ड वर्कर्स की गतिशीलता, पारस्परिक योग्यता मान्यता पर ईयू से ढील मांगी है। यह शामिल होता है, तो भारत को प्रतिवर्ष अरबों डॉलर की सेवा-निर्यात आय होगी।

‘विकसित भारत’ के लक्ष्य में इस डील का अहम योगदान होगा
मोदी सरकार के ‘विकसित भारत 2047’ लक्ष्य में इस डील का अहम योगदान रहेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प रखा है। इस संकल्प के तीन आधार स्तंभ हैं—समृद्ध अर्थव्यवस्था, आधुनिक अवसंरचना और उद्योग और वैश्विक नेतृत्व। EU–India डील इन तीनों को अत्यंत गतिशील बना सकती है। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता निर्यात बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से भारत की GDP में 1 से 1.5% अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है। विकसित राष्ट्र बनने के लिए भारत को अगले 20 वर्षों तक 6–7% की स्थिर वृद्धि चाहिए। EU समझौता इस लक्ष्य को अधिक यथार्थवादी बनाता है। इसके अलावा इससे भारत में रोजगार सृजन में बड़ा उछाल आएगा। निर्यात बढ़ने और यूरोपीय निवेश आने से टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ग्रीन एनर्जी, आईटी जैसे क्षेत्रों में लाखों नए रोजगार बनेंगे। यही वह क्षेत्र हैं जो भारत के मध्यम वर्ग और युवाओं के लिए बड़ी संभावनाएं पैदा करते हैं।

भारत सप्लाई चेन का नया केंद्र, हमारे टैलेंट की डिमांड बढ़ेगी
यूरोप चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है। भारत राजनीतिक रूप से स्थिर, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और युवा कार्यबल वाला देश एक विश्वसनीय विकल्प बन रहा है। EU–India डील से यूरोप अपने उत्पादन तंत्र को भारत में स्थानांतरित कर सकता है। यह “Make in India for the World” की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इससे भारत ना सिर्फ सप्लाई चेन का नया हब बनेगा, बल्कि भारतीय टैलेंट की भी मांग बढ़ेगी। भारत की भू-राजनीतिक स्थिति और मजबूत होगी। इस समझौते से भारत को तीन वैश्विक लाभ भी हैं। पहला, चीन के विकल्प के रूप में भारत की भूमिका मजबूत होगी। अमेरिका-यूरोप के बीच भारत का पुल जैसा महत्व बढ़ेगा। एशिया में रणनीतिक संतुलन बनाने में भारत की भूमिका निर्णायक बन जाएगी। वास्तविकता में देखें तो यह समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का विस्तार है। यह विकसित भारत की दिशा में बुनियादी परिवर्तन होगा।

 

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