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सैनिकों की शहादत को भी क्षेत्रवाद के चश्मे से देखती है शिवसेना, बिहार रेजीमेंट की तारीफ पर सवाल उठाकर सेना का किया अपमान

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शिवसेना ने फिर अपना संकुचित चेहरा दिखाया है। क्षेत्रवाद की राजनीति से जन्मी शिवसेना का चरित्र आज भी वैसा ही, जैसा उसकी स्थापना के समय था। आज भी यह पार्टी हर मुद्दे को क्षेत्रवाद के चश्मे से देखती और प्रतिक्रिया देती है। गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हुए संघर्ष में बिहार रेजीमेंट के जवानों ने जिस तरह पराक्रम दिखाते हुए शहादत दी, उस पर पूरे देश को गर्व है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 20 जवानों की शहादत को याद करते हुए उनकी वीरता की तारीफ की। लेकिन शिवसेना को यह तारीफ रास नहीं आया। शिवसेना नेता संजय राउत ने तारीफ पर सवाल उठाकर सेना का अपमान करने से बाज नहीं आए।

सैनिकों की शहादत पर शिवसेना की राजनीति

संजय राउत ने बिहार रेजीमेंट की तारीफ करने वाले प्रधानमंत्री मोदी के बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘बिहार रेजीमेंट’ ने लद्दाख की गलवान घाटी में बहादुरी दिखाई। तो महारों, मराठों, राजपूतों, सिखों, गोरखाओं, डोगरा रेजीमेंट सीमा पर तंबाकू मलते बैठे थे क्या? महाराष्ट्र के वीरपुत्र सुनील काले कल पुलवामा में शहीद हो गए। लेकिन बिहार में चुनाव होने के कारण ही सेना में ‘जाति’ और ‘प्रांत’ का महत्व बताया जा रहा है। इस तरह की राजनीति कोरोना से भी बदतर है! महाराष्ट्र में विपक्ष इस खुजली को खुजलाने का काम कर रहा है।

बिहार रेजीमेंट का नाम लेने पर शिवसेना को आपत्ति

शिवसेना के मुखपत्र सामना में संपादकीय लिखने के बाद मीडिया से सवाल करने पर संजय राउत ने कहा कि सेना की कोई भी रेजीमेंट बस रेजीमेंट होती है। हर रेजीमेंट की अपनी परंपरा और गाथा है। सभी रेजीमेंट देश की होती है। किसी प्राांत, राज्य या किसी धर्म की नहीं होती है।

शिवसेना ने शहादत को चुनाव से जोड़ा 

संजय राउत ने कहा कि राजपूताना रेजीमेंट, सिख रेजीमेंट है, महार, बिहार, गोरखा और डोगरा रेजीमेंट है.. यह परंपरा के नाते रेजीमेंट का नाम होता है। सिर्फ एक रेजीमेंट का नाम लेना। एक राज्य का नाम लेना, यह राष्ट्रीय अखंडता और एकात्म के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव के कारण बिहार रेजीमेंट का नाम लिया जा रहा है।

गलवान में बिहार रेजीमेंट का पराक्रम

गलवान में भारतीय सेना ने ‘पराक्रम’ की जो पटकथा लिखी है वो चीन को सदियों याद रहेगी। 16 बिहार रेजीमेंट के वीर सैनिकों ने चीन के कई सैनिकों की गर्दन और रीढ़ की हड्डी तोड़ दी थी और चीन के 40-50 सैनिकों को मार गिराया था। इसके अलावा चीनी सेना के कर्नल को भी बंधक बना लिया था। सैनिकों ने मौजूद चीन की पोस्ट को नष्ट कर दिया। चीन के कई सैनिक वहां से भाग खड़े हुए।

बिहार रेजीमेंट में शामिल दूसरे राज्यों के सैनिकों का अपमान

बता दें कि बिहार रेजीमेंट में सिर्फ बिहार के लोग ही नहीं चुने जाते, बस इस रेजीमेंट का नाम ही ‘बिहार रेजिमेंट’ है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से इसकी शुरूआत बिहार के ज़िलों से हुई थी। बिहार रेजीमेंट के शहीद होने वाले 20 सैनिकों में न सिर्फ बिहार के बल्कि दूसरे राज्यों के भी जवान शामिल थे। देश के कई हिस्सों में अलग-अलग तरह से जवानों को सलामी दी गई। 16 बिहार रेजीमेंट के कमांडिंग ऑफ‍िसर रहे कर्नल संतोष बाबू भी तेलंगाना के रहने वाले थे। तेलंगाना के सूर्यपेट में उनका अंतिम संस्कार किया गया। इसी तरह बिहार, पंजाब, ओडिशा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और झारखंड के रहने वाले सैनिकों का उनके गृह राज्य में अंतिम विदाई दी गई। लेकिन शिवसेना ने इन शहीद सैनिकों को क्षेत्रीय आधार पर बांटकर उनकी शहादत का अपमान किया है।

आइए आपको बताते हैं बिहार रेजीमेंट और उसके पराक्रम के इतिहास के बारे में 

अपने पराक्रम और शौर्य के लिए मशहूर रही बिहार रेजीमेंट भारत के तमाम महत्वपूर्ण सैन्य संघर्षों का हिस्सा रही है। देश के लिए प्राणों की आहुति देना बिहार रेजीमेंट की परंपरा रही है। 18वीं सदी में बिहार बटालियन से शुरू हुआ गठन 1941 में बिहार रेजीमेंट के तौर पर स्थापित हुआ। तबसे अब तक इस रेजीमेंट के जवान सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर सीमाओं पर संघर्ष के समय में इतिहास रचते रहे हैं। ‘वी​र बिहारियों’ की इस रेजीमेंट के नाम एक ‘World Record’ समेत कई कीर्ति गाथाएं दर्ज हैं। इस रेजीमेंट ने संयुक्त राष्ट्र (UN) के शांति ऑपरेशनों के तहत सोमालिया और कोंगो में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है।

उरी में दर्ज हुआ रेजीमेंट का बलिदान
18 सितंबर 2016 की तारीख इस रेजीमेंट के लिए ऐतिहासिक है क्योंकि जम्‍मू कश्‍मीर के उरी सेक्‍टर में पाकिस्‍तानी सीमा से आए घुसपैठियों से मुकाबले में इस रेजीमेंट के 15 जांबाजों ने जान न्यौछावर कर दी थी। उरी सेक्टर स्थित भारतीय सेना के कैंप पर हुए हमले में कुल 17 जवान शहीद हुए थे, जिनमें सबसे ज़्यादा 15 जवान बिहार रेजिमेंट के थे। इनमें से 6 बिहार मूल के थे।
मुंबई में शहीद हुए थे मेजर उन्नीकृष्णन
साल 2008 में जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ था, तब एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ऑपरेशन ब्लैक टॉरनैडो में शहीद हुए थे। असल में, मेजर उन्नीकृष्णन बिहार रेजीमेंट के थे, जिन्हें प्रतिनियुक्ति पर एनएसजी में भेजा गया था। मुंबई में आतंकी हमले से जूझने से पहले कारगिल युद्ध में बिहार रेजीमेंट ने इतिहास रचा था।
कारगिल में भी कुर्बान हुए जांबाज़
जुलाई 1999 में बटालिक सेक्टर के पॉइंट 4268 और जुबर रिज पर पाकिस्‍तानी घुसपैठियों के कब्जे की कोशिश को बिहार रेजीमेंट के जवानों ने ही नाकाम किया था। कारगिल युद्ध में शहीद हुए कैप्टन गुरजिंदर सिंह सूरी को महावीर चक्र और शहीद मेजर मरियप्पन सरावनन को वीर चक्र से नवाज़ा गया था। पटना के गांधी मैदान के पास कारगिल चौक पर कारगिल में शहीद हुए 18 जांबाजों की याद में स्‍मारक है।
आज़ादी से पहले और बाद में मिले कई पुरस्कार और मेडल 
यहां जानना चाहिए कि 1941 में स्थापित हुई बिहार रेजिमेंट के नाम भारत की आज़ादी से पहले ही 5 मिलिट्री क्रॉस और 9 मिलिट्री मेडल थे जबकि आज़ादी के बाद से अब तक इस रेजीमेंट के खाते में 7 अशोक चक्र, 9 महावीर चक्र और 21 कीर्ति चक्र, 70 शौर्य पदक सहित सेना के कई पुरस्कार और मेडल शामिल हैं।
बिहार रेजीमेंट के सामने दुनिया का सबसे बड़ा सरेंडर
साल 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना से संघर्ष के दौरान बिहार रेजीमेंट के किस्से मशहूर हैं। कहा जाता है कि गोलियां कम पड़ने पर इस रेजीमेंट के सैनिकों ने दुश्मन को संगीनों से ही मार दिया था। उस युद्ध में पाकिस्तान के 96 हजार सैनिकों ने बिहार रेजीमेंट के जांबाज़ों के आगे ही घुटने टेके थे। इस आत्‍मसमर्पण को दुनिया में लड़े गए अब तक के सभी युद्धों में रिकॉर्ड माना जाता है।
प्रसिद्ध है बिहार रेजीमेंट का मोटो और हुंकार
‘करम ही धरम’ इस रेजिमेंट का मोटो रहा है और इसके मुताबिक मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य को ही रेजीमेंट के जवान अपना कर्म और धर्म मानते हैं। वॉर क्राय यानि हुंकार के रूप में बिहार रेजीमेंट के वाक्य हैं ‘जय बजरंग बली’ और ‘बिरसा मुंडा की जय’। इस तरह की हुंकार भरकर बिहार रेजीमेंट के जवान दुश्मन पर टूट पड़ते हैं।
क्यों दुर्गम घाटियों में तैनात है रेजीमेंट?
खबरों की मानें तो बिहार रेजीमेंट के जवान चूंकि बहादुर होते हैं और वो किसी भी स्थिति को झेलने की क्षमता रखते हैं इसलिए इस रेजीमेंट के जवानों की तैनाती दुर्गम और जटिल परिस्थितियों वाले इलाकों में की जाती रही है। भारत चीन सीमा यानि एलएसी पर गलवन घाटी और इस तरह के कुछ अन्य दुर्गम स्थानों पर रेजीमेंट के जवान तैनात हैं।

 

 

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