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फिर हुई सत्य की जीत, पीएम मोदी की क्लीन चिट मामले में याचिकाकर्ता की मंशा पर उठे सवाल, सुप्रीम कोर्ट ने मामले को जानबूझकर लंबा खींचने पर लगाई फटकार

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सत्य को परेशानी एवं कष्टों का सामना करना पड़ता है, लेकिन वह अपने मार्ग से कभी विचलित नहीं होता। साजिशें और झूठ कुछ समय के लिए परेशान कर सकते हैं लेकिन वो अधिक समय तक टिक नहीं सकते। आखिरकार उन्हें सत्य से पराजीत होना ही पड़ता है। यह बात फिर सच साबित हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 गुजरात दंगा मामले में ज़किया जाफरी की याचिका खारिज करते हुए जमकर फटकार लगाई। ज़किया ने SIT की उस क्लोज़र रिपोर्ट को चुनौती दी थी, जिसमें गुजरात दंगे की साज़िश के आरोप से तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुक्त कर दिया गया था।

मजिस्ट्रेट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर

शुक्रवार (24-06-2022) को जस्टिस ए एम खानविलकर, दिनेश माहेश्वरी और सी टी रविकुमार की बेंच ने मामले पर फैसला सुनाते हुए कहा है कि याचिका में तथ्य नहीं हैं। इसलिए यह अपील आदेश देने योग्य नहीं है। इस टिप्पणी के साथ ज़किया की अपील को कोर्ट ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने माना है कि मामले में मजिस्ट्रेट का आदेश सही था। उन्होंने सभी पहलुओं को देखने के बाद उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आदेश दिया था।

न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का प्रयास

सबसे हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने जहां SIT के कामकाज की तारीफ की, वहीं इस मामले को जानबूझकर लंबा खींचने की बात कहकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोगों ने न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने का प्रयास किया, ताकि मामला चर्चा में बना रहे। इस केस में हर उस व्यक्ति की ईमानदारी पर सवाल उठाए गए, जो मामले को उलझाए रखने वाले लोगों के आड़े आ रहा था। कोर्ट ने यहां तक कहा कि अपने निहित स्वार्थ के लिए न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।

पीएम मोदी का नाम जुड़ा होने से मामले को खींचा गया

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ज़किया की तरफ से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बहस की थी। उन्होंने SIT पर सबूतों की अनदेखी का आरोप लगाया था। वहीं SIT की तरफ से मुकुल रोहतगी ने पक्ष रखा था। रोहतगी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि याचिकाकर्ता मामले में प्रधानमंत्री मोदी का नाम जुड़ा होने के चलते इसे खींचते रहने की कोशिश कर रहे हैं। रोहतगी ने याचिकाकर्ता की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा था, “अगर इन्हें सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हुई जांच पर भी भरोसा नहीं है, तो क्या अब स्कॉटलैंड यार्ड (ब्रिटिश पुलिस मुख्यालय) की जांच टीम को बुलाने की मांग करना चाहते हैं?”

साजिश, संघर्ष और सत्य  

गौरतलब है कि इससे पहले 2012 में मजिस्ट्रेट और 2017 में हाई कोर्ट SIT की क्लोज़र रिपोर्ट को मंजूरी दे चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट ने 2008 में दंगों की जांच के लिए पूर्व सीबीआई निदेशक आर के राघवन के नेतृत्व में SIT का गठन किया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद SIT ने दंगों की व्यापक साज़िश के पहलू की जांच की। मुख्यमंत्री मोदी से भी अपने कार्यालय में बुला कर पूछताछ की। 2012 में SIT ने मजिस्ट्रेट के पास क्लोज़र रिपोर्ट दाखिल कर दी। SIT ने मोदी समेत 63 लोगों के साज़िश में हिस्सेदार होने के आरोप को गलत पाया। दंगों में मारे गए पूर्व कांग्रेस सांसद एहसान जाफरी की पत्नी ज़किया ने मजिस्ट्रेट कोर्ट में इस रिपोर्ट के खिलाफ प्रोटेस्ट पेटिशन दाखिल की थी। इसके बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया के तहत साजिशों का अंत हुआ और सत्य की जीत हुई।

 

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