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आलेख: पंजाब पुलिस का लचर रवैया- प्रकाश सिंह

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक को लेकर इन दिनों राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। प्रधानमंत्री की पंजाब के फिरोजपुर में एक रैली थी, लेकिन रास्ते में सुरक्षा चूक के चलते उन्हें लौट जाना पड़ा और वह रैली को संबोधित नहीं कर सके। जब भी प्रधानमंत्री किसी राज्य के दौरे पर जाते हैं, तो उनकी सुरक्षा का दायित्व राज्य पुलिस पर ही होता है। चूंकि प्रधानमंत्री देश के सबसे विशिष्ट व्यक्ति होते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए एक स्पेशल प्रोटक्शन ग्रुप (एसपीजी) है, जो उनके आसपास की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है। हवाई अड्डे से लेकर सभा स्थल तक प्रधानमंत्री की सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी राज्य पुलिस की होती है।

प्रधानमंत्री जब कहीं जाते हैं, तो उनके जाने से पहले एडवांस सिक्योरिटी लाइजन की बैठक होती है। एसपीजी के अधिकारी प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले सुरक्षा से संबंधित सभी विषयों की समीक्षा करते हैं। वे देखते हैं कि प्रधानमंत्री जिन रास्तों से गुजरेंगे, वे रास्ते कितने सुरक्षित हैं, जहां सभा करेंगे, वह सभा स्थल कितना सुरक्षित है, जहां ठहरेंगे, वह स्थान कितना सुरक्षित है, वहां पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात हैं या नहीं। इसमें एसपीजी, खुफिया एजेंसी और राज्य पुलिस के आला अधिकारी शामिल होते हैं। प्रधानमंत्री की यात्रा के समय के राजनीतिक माहौल, सरकार के प्रति किसी समूह की नाराजगी, उस क्षेत्र में सक्रिय चरमपंथी गुटों आदि के बारे में भी चर्चा की जाती है। तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा के बंदोबस्त किए जाते हैं और उसी अनुसार सुरक्षा बलों की तैनाती होती है।

जिस रास्ते से प्रधानमंत्री का काफिला गुजरता है, उस रास्ते के व्यवधानों को हटाया जाता है, ताकि कोई गड़बड़ी न हो पाए। अगर प्रधानमंत्री का काफिला किसी शहरी इलाके या भीड़-भाड़ वाले इलाके से गुजरता है, तो प्रधानमंत्री के काफिले के गुजरने से कुछ समय पहले ही मार्ग को पूरी तरह खाली करा दिया जाता है। जो भी पुलिसकर्मी मार्ग में तैनात होते हैं, उन्हें पूरी तरह से चौकस रहने को कहा जाता है, ताकि कोई भी व्यक्ति गलत इरादे से काफिले में घुस न सके और कोई गड़बड़ी न फैला सके।

प्रधानमंत्री विमान से बठिंडा हवाई अड्डे पहुंचे थे और फिर उन्हें हेलिकॉप्टर से हुसैनीवाला जाना था। लेकिन उस समय बारिश हो रही थी। जब मौसम की खराबी के चलते हेलिकॉप्टर से जाना संभव नहीं हुआ, तो फिर सड़क मार्ग से जाने का फैसला किया गया। इसके बारे में स्थानीय पुलिस को सूचित किया गया और उसने इस रास्ते से जाने की स्वीकृति दी, तभी प्रधानमंत्री का काफिला आगे बढ़ा। लेकिन एक फ्लाइओवर पर जाने के बाद उनके काफिले को रुकना पड़ा और कहा गया कि वहां पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री के हवाई अड्डे पहुंचने के बाद मौसम ठीक होने का इंतजार करने और फिर सड़क मार्ग से यात्रा शुरू करने के बीच बेशक थोड़ा समय लगा होगा, लेकिन इतनी जल्दी इतने प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री के यात्रा मार्ग में इकट्ठा कैसे हो गए? आरोप है कि स्थानीय पुलिस ने यह सूचना लीक कर दी, हालांकि यह जांच का विषय है। पुलिस सूचना लीक करे अथवा न करे, लेकिन जब प्रधानमंत्री की यात्रा होती है, तो पुलिस की हरकत से लोगों को कुछ अंदाजा तो लग ही जाता है। लोगों को जानकारी होना एक बात है, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों का एक जगह इकट्ठा होना अनहोनी-सी बात है। क्योंकि धरना-प्रदर्शन जैसी चीजें पहले से तय होती हैं।

इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि अगर प्रदर्शनकारी वहां इकट्ठा हो भी गए, तो राज्य पुलिस उसे वहां से हटा क्यों नहीं पाई? व्यवधान डालने वाले को हटाने के लिए पुलिस बल प्रयोग भी कर सकती थी। लेकिन ऐसा उसने किया नहीं। हमारा जो अनुभव है, उसके मुताबिक अगर इस तरह का कोई व्यवधान होता है, तो पुलिस बल प्रयोग करके प्रदर्शनकारियों को रास्ते से भगा देती है। अपने देश में प्रधानमंत्री अगर एक जगह से दूसरी जगह न जा सके, तो यह बड़ी शर्म की बात है। देश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व की सुरक्षा राज्य पुलिस की सांविधानिक जिम्मेदारी है। वे कुछ प्रदर्शनकारी ही तो थे, ऐसा तो नहीं था कि वे हथियारबंद लोग थे, जिस पर बल प्रयोग करने से वहां खून-खराबा हो जाता। कहा गया है कि पुलिसकर्मी प्रदर्शनकारियों के साथ चाय पीते और हंसी-मजाक करते देखे गए। ठीक है कि पुलिस को जनता के साथ अच्छे संबंध बनाकर रखने चाहिए, लेकिन जब कोई आपकी सांविधानिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में व्यवधान डाले, तो सख्ती जरूरी हो जाती है।

लेकिन इसका सारा दोष मैं पंजाब पुलिस को नहीं दूंगा। मैंने चार साल पंजाब में काम किया है और वहां की पुलिस बड़ी दिलेर व बहादुर होती होती है, जो किसी भी तरह के खतरे का सामना करने के लिए तैयार रहती है। सवाल यह है कि उसे अपने आकाओं से किस तरह का दिशा-निर्देश मिलता है। जब सही दिशा-निर्देश मिलता था, तो इसी पंजाब पुलिस ने राज्य से आतंकवाद को उखाड़ फेंका था। इसका दोष मैं पुलिस नेतृत्व को दूंगा। प्रसंगवश यह भी बताता चलूं कि आज की तारीख में वहां कोई नियमित डीजीपी नहीं है। पुलिस नेतृत्व के साथ वहां का राजनीतिक नेतृत्व खिलवाड़ कर रहा है। जो डीजीपी थे, उन्हें हटा दिया गया। एक नेतृत्वविहीन पुलिस ने ऐसा लचर प्रदर्शन किया है, जो अक्षम है और जिसकी वजह से पंजाब की भी बदनामी हुई है। राष्ट्र के लिए भी यह शर्म की बात है।

अब सवाल यह भी है कि क्या पुलिस नेतृत्व को राजनीतिक नेतृत्व की तरफ ऐसा कोई निर्देश दिया गया था कि तुम शिथिल हो जाओ। यह जांच का विषय है। अगर जांच में ऐसी कोई बात आती है, तो फिर बात वहीं पहुंच जाती है, जिसकी मैं वर्षों से मांग कर रहा हूं कि पुलिस सुधार के तहत पुलिस को एक ऐसा वातावरण मिले कि वह किसी भी बाह्य दबाव के बिना स्वतंत्र भाव से कानून की रक्षा करते हुए अपने सांविधानिक दायित्वों का निर्वहन करे। लेकिन चाहे केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें हों, कोई भी इस पर ध्यान नहीं देती है। यह पुलिस सुधार पर ध्यान न देने का ही नतीजा है। जो कुछ भी हुआ है, उसमें स्थानीय पुलिस और राजनीतिक नेतृत्व की जिम्मेदारी कितनी है, यह जांच का विषय है, लेकिन राष्ट्र के लिए शर्मनाक है।

– प्रकाश सिंह, पूर्व डीजीपी

(सौजन्य- अमर उजाला)

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