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प्रधानमंत्री मोदी की चीन के राष्ट्रपति के साथ ऐतिहासिक अनौपचारिक शिखर वार्ता

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प्रधानमंत्री मोदी, 27 व 28 अप्रैल को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात करेंगे। यह मुलाकात चीन के ऐतिहासिक शहर वुहान में हो रही है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग, माओत्से तुंग के प्रसिद्ध वुहान विला में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करेंगे और इसी भवन के एकांत में कई मुद्दों पर विचार साझा करेंगे।

विश्व कूटनीति में ऐसे विरले ही मौके आये हैं जब दो देशों के प्रमुख लगातार दो दिनों तक एक दूसरे के साथ रहे हों और अधिकारियों की अनुपस्थिति में, प्रोटोकाल के तामझाम से दूर रहकर बातचीत की हो। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली यह अनौपचारिक शिखर वार्ता कई मायनों में ऐतिहासिक है।

भारत के प्रधानमंत्री की पहली अनौपचारिक शिखर वार्ता– भारत के इतिहास का यह पहला अवसर है जब देश के प्रधानमंत्री की किसी भी देश के प्रमुख के साथ अनौपचारिक शिखर वार्ता हो रही है। अनौपचारिक शिखर वार्ता में तमाम तरह के प्रोटोकाल के तामझाम को दरकिनार कर दिया जाता है। इस वार्ता में दोनों देशों के प्रमुख क्या बात करेंगे, इसका भी कोई एजेंडा पहले से निर्धारित नहीं होता है। 

प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ होने वाली इस पहली अनौपचारिक वार्ता  पर विश्व की नजरें हैं। दूसरी ओर इस मुलाकात के कारण पाकिस्तान के पैरों के नीचे से जमीन ही खिसक गई है। दोनों राष्ट्र प्रमुख, किसी विषय पर किसी समय भी बातचीत कर सकते हैं, क्योंकि दोनों एक दूसरे के साथ दो दिनों तक एक साथ रहेंगे। 

प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत ऐतिहासिक ‘वुहान विला’ में- राष्ट्रपति शी चिनपिंग, प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत ऐतिहासिक ‘वुहान विला’ में करेगें। वुहान विला, चीन के संस्थापक माओ-से तुंग का व्यक्तिगत भवन रहा है। 1972 में इसी भवन में अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन से आधुनिक चीन के निर्माता माओ से तुंग ने मुलाकात की थी। यह, किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन की पहली यात्रा थी। इस यात्रा से पूर्व, चीन और अमेरिका के बीच कूटनीतिक संबंध बहुत ही बुरे दौर से गुजर रहे थे, हालात ऐसे थे कि दोनों देश के बीच किसी भी कूटनीतिक स्तर पर बातचीत नहीं थी। इस मुलाकात के बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार आना शुरू हुआ। वुहान विला में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत, कूटनीतिक तौर पर कई संकेत देता है।

जून में होने वाले शंघाई शिखर सम्मेलन से पहले अनौपचारिक शिखर वार्ता-  साम्यवादी राष्ट्र चीन के लिए प्रोटोकाल के तामझाम के साथ व्यवस्थित वार्ता करना अधिक सुविधाजनक है, लेकिन अगले कुछ दिनों में ही शंघाई शिखर सम्मेलन से पहले,  भारत के प्रधानमंत्री मोदी का अनौपचारिक वार्ता के लिए स्वागत करना, इस तथ्य को रेखांकित करता है कि चीन भी भारत के साथ उलझे हुए तमाम विषयों पर खुलकर  बातचीत करना चाहता है। चीन जानता है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाला भारत आर्थिक और समारिक दृष्टि से पहले से अधिक मजबूत स्थिति में है और भारत पर किसी तरह का दबाव काम नहीं कर सकता है। पिछले साल जून से अगस्त तक चले डोकलाम विवाद में भारत की जवाबी कार्रवाई से यह बात स्पष्ट हो चुकी है। दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ये है कि चीन के राष्ट्रपति, शंघाई शिखर वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति को सुनिश्चिचत भी करना चाहते हैं, क्योंकि डोकलाम विवाद के दौरान शंघाई शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का जाना अनिश्चित  लग रहा था, जो चीन के लिए एक बड़ी कूटनीतिक विफलता साबित होने वाली थी।

‘वुहान’ अनौपचारिक शिखर वार्ता से भारत को लाभ- प्रधानमंत्री मोदी ने पिछले चार सालों में अपनी विश्व कूटनीति से चीन को इस बात का इल्म करा दिया है कि भारत, चीन से हर मामले में लोहा लेने की क्षमता रखता है। भारत की इस क्षमता के अहसास ने चीन को स्थिति में ला दिया है कि वह व्यापार, आतंकवाद और सीमा विवादों को बातचीत से ही सुलझाना चाहता है। पारंपरिक कूटनीतिक में बातचीत वाला रास्ता आने वाली  रुकावटों को दूर करने के उपयोगी साबित नहीं हो रहा है, इसलिए ‘आउट आफ द बॉक्स’ रास्ते तलाशने के लिए भी चीन ने अपने मन को तैयार कर लिया है। चीन का ऐसा रवैया भारत के लिए ‘सोने पर सुहागा’ है। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ मित्रता और सह-अस्तित्व पर आधारित रिश्ता बनाना चाहते हैं, जिसकी झलक उन्होंने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित करके दे दिया था। हालांकि उन्हें रिश्तों के लिए राष्ट्रहित से समझौता भी स्वीकार नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक शक्ति- प्रधानमंत्री मोदी के चार सालों की कूटनीतिक रणनीति का  परिणाम है कि आज चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, वुहान विला में स्वागत करने की तैयारी कर रहे हैं। यह अनौपचारिक शिखर वार्ता भारत की कूटनीतिक रणनीति का सबसे अहम पड़ाव है। आइये, चार सालों की रणनीति के महत्वपूर्ण कदमों पर एक नजर डालते हैं-
• राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वाकांक्षी परियोजना ओबीओआर पर समर्थन नहीं देने से, यह परियोजना अधर में लटक चुकी है।
• चीन के जिगरी दोस्त पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर विश्व समुदाय में अलग थलग करने की रणनीति से चीन परेशान।
• समुद्र में चीनी नवसेना को का मुंहतोड़ जवाब देने की आस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका के साथ तैयारी।
• पैंगांग झील से चीनी सेना को खदेड़ना।
• डोकलाम में चीनी सेना को पीछे की ओर जाने के लिए मजबूर कर देना।
• अरुणाचल प्रदेश में सेना की गश्त को बढ़ना और सैनिक साजो सामान से सीमा को लैस करना। दलाई लामा को लगातार समर्थन देना।
• श्रीलंका में चीन के अधिकार वाले हंबनटोटा बंदरगाह के पास ही मथाला हवाईपट्टी का अधिग्रहण कर लेना।
• मालदीव में चीन के दखल को चुनौती देना।

प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत विश्व कूटनीति में संपू्र्ण शक्ति के साथ खड़ा है जिसका लोहा चीन भी मानता है, ऐसे में चीन के पास वार्ता का ही मार्ग शेष बचता है।

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