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पद्मनाभस्वामी मंदिर की 12000 एकड़ जमीन का किराया नहीं दे रही केरल की वामपंथी सरकार, आर्थिक संकट से जूझ रहा है मंदिर

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केरल की वामपंथी सरकार में जहां हिन्दुओं की सरेआम हत्याएं हो रही हैं, वहीं साधन-संपन्न होते हुए भी हिन्दू मंदिरों को अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। कोरोना महामारी के कारण देश के सबसे अमीर मंदिरों में से एक श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर एक साल से भी अधिक समय तक बंद रहा। बंदी और श्रद्धालुओं की संख्या में गिरवाट की वजह से मंदिर की आय काफी कम हो गई है। वर्तमान में जहां चढ़ाया जाने वाला दान मंदिर के खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है, वहीं केरल की वामपंथी सरकार मंदिर की 12000 एकड़ जमीन का किराया भी नहीं दे रही है। इससे मंदिर को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है।

जमीन के किराये के लिए केरल हाईकोर्ट में अपील

सबसे हैरानी की बात यह है कि केरल सरकार ने दशकों पहले मंदिर की 12000 एकड़ जमीन को इस शर्त पर ले लिया था कि वह इसका किराया देगी, लेकिन सरकार 1971 से किराया नहीं दे रही है। पीपल फॉर धार्मिक नामक एक एनजीओ 2017 से पद्मनाभस्वामी मंदिर के हक के लिए संघर्ष कर रहा है। एनजीओ की अध्यक्ष शिल्पा नायर ने फरवरी 2021 में मंदिर की जमीन के किराये को लेकर केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। शिल्पा नायर की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 2 नवंबर, 2021 को केरल सरकार को नोटिस भेज कर तीन हफ्ते के भीतर जवाब मांगा।

केरल सरकार ने 1971 से नहीं दिया जमीन का किराया

शिल्पा नायर की याचिका में दावा किया गया है कि कृषि कार्य के लिए the Sri Pandaravaka lands (enfranchisement and vesting) Act, 1971 के तहत राज्य सरकार ने मंदिर की जमीन किराये पर लिया था। 1971 में जमीन के मुआवजे के रूप में वार्षिक 58,500 रुपये किराया तय किया गया था। लेकिन आज तक न तो किराये में संशोधन किया गया और न ही दिया गया। जबकि मौजूदा बाजार मूल्य पर जमीन का किराया भी काफी बढ़ गया है। केरल सरकार के 2018 के बजट अनुदान की मांग से पता चलता है कि सिर्फ एक बार केरल भूमि सुधार अधिनियम, 1963 के तहत वार्षिक किराये के रूप में कुल 1 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया है। यह राशि सरकार के पास मौजूद मंदिर की जमीन की वास्तविक आय की तुलना में काफी कम है।  

वार्षिक किराये का भुगतान नहीं होने से आर्थिक तंगी

राज्य सरकार द्वारा वार्षिक किराये का भुगतान नहीं करने से मंदिर के पास धन की कमी हो गई है, जिसने मंदिर के प्रशासन को पूरी तरह से पंगू बना दिया है। इससे मंदिर की संपत्तियों की रक्षा और उनके देखभाल करने के लिए प्रशासन की क्षमता प्रभावित हुई है। इसके अलावा कोरोना महामारी की शुरुआत और उसके बाद के लॉकडाउन की वजह से मंदिर को गंभीर परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, क्योंकि दर्शन की अनुमति नहीं होने से श्रद्धालु नहीं आ सके, जिससे मंदिर को चढ़ावा मिलना बंद हो गया। 

मंदिर का मासिक खर्च पूरा करना मुश्किल

गौरतलब है कि मंदिर का मासिक खर्च 1.25 करोड़ रुपये है, जबकि मंदिर को मुश्किल से 60-70 लाख रुपये मिल पाते हैं। मंदिर की प्रशासनिक समिति ने पद्मनाभस्वामी मंदिर ट्रस्ट से मदद की अपील की। लेकिन उसे ट्रस्ट की ओर से मदद नहीं मिली। बाद में प्रशासनिक समिति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील कर ट्रस्ट के ऑडिट की मांग की। 22 सितंबर, 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने ऑडिट से छूट की मांग वाली पद्मनाभस्वामी मंदिर ट्रस्ट की याचिका खारिज की और उसे तीन महीने में ऑडिट करने का निर्देश दिया। ऑडिट की वजह से वित्तीय मदद का मामला अटका हुआ है। ऐसे में देश का सबसे धनी मंदिर होने के बावजूद पद्मनाभस्वामी मंदिर वित्तीय संकट से जूझ रहा है।

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