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पंजाब कांग्रेस में बिखराव, जिन्हें देश की चिंता वे भाजपा में होना चाहते शामिल

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कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के इस्तीफे के बाद पंजाब से लेकर दिल्ली तक का सियासी पारा चढ़ा हुआ है। सिद्धू ने केवल अपना इस्तीफा ही नहीं दिया, बल्कि उनके समर्थकों और मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया है। यही नहीं, इस्तीफा मंजूर होने के पहले ही उन्होंने इसे ट्विटर पर शेयर कर आलाकमान के खिलाफ बगावत का बिगुल भी फूंक दिया। सिद्धू के चलते पार्टी की हुई फजीहत के चलते पंजाब कांग्रेस में बिखराव का दौर शुरू हो गया है। आलाकमान की नासमझी और सिद्धू की हरकतों से खफा होकर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता अब दूसरे दलों में जाने का मन बना रहे हैं । पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसे राष्ट्रवादी सोच वाले नेता भाजपा में शामिल होने की सोच रहे हैं। सूत्रों की मानें तो कई कांग्रेसी नेता भाजपा के संपर्क में भी हैं।

घर की लड़ाई में व्यस्त कांग्रेस की खिसक रही सियासी जमीन
घर की लड़ाई में व्यस्त कांग्रेस पार्टी की पंजाब में सियासी जमीन खिसकती नजर आ रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह व केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मुलाकात ने नई अटकलों को जन्म दे दिया है। कैप्टन अगर भाजपा में आते हैं तो वे अकेले नहीं आएंगे, अपने साथ पूरी टीम लाएंगे। फिर सांसद मनीष तिवारी व कैप्टन के बीच की दोस्ती किसी से छिपी नहीं है। कैप्टन मनीष तिवारी की हर कदम पर वकालत करते हैं। उनको पंजाब से सांसद बनाने में कैप्टन का अहम योगदान रहा है। मनीष तिवारी व कपिल सिब्बल के बीच का प्यार भी किसी से छिपा नहीं है। कैप्टन शाह की मुलाकात पर जहां मनीष तिवारी ने सियासी तीर छोड़कर कांग्रेस हाईकमान को घेरना शुरू कर दिया है, वहीं दिल्ली से कपिल सिब्बल की आवाज भी दमदार होने लगी है। 

सांसद मनीष तिवारी और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ भी नाराज
सिद्धू को प्रधान बनाए जाने पर जहां कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी नाराज हैं, वहीं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ को भी यह फैसला गले के नीचे नहीं उतर रहा था। पार्टी के एक पूर्व महासचिव भी कहते हैं कि एक अच्छे खासे राज्य में चुनाव से ठीक एक साल पहले इस तरह का राजनीतिक तूफान लाना ही गलत था। अब सिद्धू की नासमझी ने इसे और पुख्ता कर दिया। पूर्व महासचिव का कहना है कि सिद्धू के निर्णय को कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता। सिद्धू ने खुद अपना इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि उनके साथ उनके समर्थकों और मंत्रियों ने भी इस्तीफा दिया। यही नहीं इस्तीफा मंजूर होने के पहले ही उन्होंने इसे ट्विटर पर शेयर भी कर दिया। यह तो खुली बगावत की तरह है।  वरिष्ठ नेता सुखविंदर सिंह काका कम्बोज ने कहा कि सिद्धू ने जो किया वह विश्वासघात से कम नहीं है। उन्हें सुनील जाखड़ के ऊपर चुना गया, जिन्होंने कांग्रेस के लिए जीवन भर काम किया। अगर वह अब भी खुश नहीं हैं, तो वह कभी खुश नहीं रह सकते। 

पंजाब भाजपा प्रभारी बोले, जिस व्यक्ति ने राहुल गांधी को बोला था पप्पू, कांग्रेस ने उसे ही बना दिया प्रदेश अध्यक्ष

भाजपा के पंजाब प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम का कहना है कि सिद्धू का इस्तीफा कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी की अज्ञानता का परिणाम है। भाजपा अमरिंदर सिंह जैसे बड़े राष्ट्रभक्त का सम्मान करती हैं। कैप्टन सहित सभी राष्ट्रभक्तों का भाजपा में स्वागत है। गौतम ने कहा कि कांग्रेस पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है। न ही कांग्रेस पार्टी में कोई नैतिक मूल्य बचे हैं। कांग्रेस सत्ता के लालच के कारण जनता के वोटों के साथ खिलवाड़ कर रही है। हमें बड़ा दुःख है कि जिस व्यक्ति ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को पप्पू कहा, जिसके पाकिस्तान और उनके हुक्मरानों के साथ संबंध हैं और पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री ने जिसे देशद्रोही तक कहा है, उसे कांग्रेस पार्टी ने पंजाब का अध्यक्ष तक बना दिया। सिद्धू का इस्तीफा कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी की अज्ञानता का परिणाम है। वैसे तो ये कांग्रेस पार्टी का अंदरुनी मामला है लेकिन ये फिर भी ये साफ जाहिर होता कि ये अज्ञानता भी है और नासमझी है।

जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ने की बात करते हैं हरीश रावत, वही अपने पद से दे देता है इस्तीफा
कांग्रेस के एक सूत्र का कहना है कि यह भी एक अजब संयोग है। पंजाब में कांग्रेस के प्रभारी हरीश रावत हैं। हालांकि हरीश रावत अब पंजाब के प्रभारी पद से मुक्ति चाहते हैं और पूरा ध्यान उत्तराखंड पर देना चाहते हैं, लेकिन वह जिसके नेतृत्व में 2022 में पंजाब विधानसभा का चुनाव लड़ने की घोषणा करते हैं, वही पद से इस्तीफा दे देता है। हरीश रावत ने इससे पहले 2022 का पंजाब विधानसभा चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में लड़ने की घोषणा की थी। रावत का यह बयान कैप्टन और सिद्धू के बीच में तकरार के अंतिम मुकाम तक पहुंचने के दौरान आया था। इसके बाद पंजाब के प्रधान सिद्धू बनाए गए और कुछ सप्ताह बाद कैप्टन ने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद हरीश रावत ने नवजोत सिंह सिद्धू के नेतृत्व में लड़ने की घोषणा की। रावत ने यह घोषणा मुख्यमंत्री के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी का चेहरा तय होने के बाद की। बाद में कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी ने इसमें सुधार कर चन्नी और सिद्धू के नाम पर चुनाव लड़ने की घोषणा की। लेकिन मंगलवार को सिद्धू ने अपना पद छोड़ दिया।

क्रिकेट जगत से सियासत की दुनिया में कदम रखने वाले सिद्धू का ‘इस्तीफों’ से है पुराना नाता
क्रिकेट से राजनीति में कदम रखने वाले नवजोत सिंह सिद्धू के साथ ‘इस्तीफों’ की लंबी फेहरिस्त है। भारतीय क्रिकेट टीम जब 1996 में इंग्लैंड दौरे पर गई थी, तो नवजोत सिंह सिद्धू की कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन से नहीं बनी। नतीजा, वे नाराज होकर बीच में ही स्वदेश लौट आए थे। तब से लेकर अब तक सिद्धू कई बार इस्तीफा दे चुके हैं। बता दें कि सिद्धू ने 2004 में भाजपा के टिकट पर अमृतसर लोकसभा सीट से चुनाव जीते थे। सिद्धू के खिलाफ एक पुराना आपराधिक मामला चल रहा था। उसमें गुरनाम सिंह नाम के शख्स की मौत हो गई थी। साल 2006 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने सिद्धू को तीन साल कैद की सजा सुनाई। इसके तुरंत बाद सिद्धू ने इस्तीफा दे दिया था। अप्रैल, 2016 में सिद्धू को राज्यसभा में भेजा गया। उस वक्त भी सिद्धू को तीन महीने बाद ही इस्तीफा देना पड़ा था। सिद्धू ने तब कहा था कि वे पंजाब से जुड़े हैं। लोगों के बीच में रह कर काम करना चाहते हैं। हालांकि इसके पीछे कुछ राजनीतिक कारण बताए गए थे। उस समय सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर सिद्धू, जिन्हें पंजाब सरकार में मुख्य संसदीय सचिव के पद पर नियुक्त किया गया था, उन्होंने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। साल 2017 के विधानसभा चुनाव में सिद्धू, कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। विधानसभा चुनाव में जीत के बाद पंजाब में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गई। सिद्धू को कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री का रैंक दिया गया। लेकिन सिद्धू और अमरिंदर खेमे के बीच पटरी नहीं बैठी। सिद्धू की कार्यप्रणाली को लेकर कैप्टन खुश नहीं थे। कांग्रेस नेतृत्व से सलाह कर कैप्टन ने सिद्धू का विभाग बदल दिया। नवजोत सिंह सिद्धू ने इसका विरोध किया और तुरंत प्रभाव से इस्तीफा दे दिया। पिछले दिनों पंजाब में हुए घटनाक्रम के बाद सिद्धू को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। इसके बाद भी सिद्धू और अमरिंदर सिंह के बीच विवाद नहीं थम सका। यहां तक कि दोनों नेताओं के बीच सामान्य बातचीत भी बंद हो गई थी, और इसके बाद अब नतीजा सबके सामने है।

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