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राहुल गांधी की यात्रा के बीच सरकार पर संकट! कांग्रेस के 91 विधायकों के इस्तीफे का मामला हाईकोर्ट पहुंचा, छह दिसंबर को होगी सुनवाई, इस्तीफे स्वीकार हुए तो गिरेगी सरकार

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राजस्थान में कांग्रेस के 91 विधायकों के इस्तीफे के मामले में भारतीय जनता पार्टी ने राजनीति की बिसात पर बहुत चतुर चाल चली है। बीजेपी के इस तीर के निशाने पर एक से ज्यादा लक्ष्य हैं। दरअसल, 91 विधायकों के इस्तीफे पर विधानसभा अध्यक्ष सीपी जोशी द्वारा दो माह बाद भी कोई निर्णय नहीं करने का मामला बीजेपी अब उच्च न्यायालय में ले गई है। विधानसभा में उपनेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफों के बारे में सात दिन के अंदर निर्णय करने के निर्देश देने की गुहार लगाई गई है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि यदि कोर्ट इस्तीफे स्वीकारने के लिए कहता है तो कांग्रेस सरकार पर ही संकट आ जाएगा और यदि अस्वीकार करने के निर्देश देता है तो गहलोत की हाईकमान को अपनी अंटी में दबाकर रखने की चाल फेल हो जाएगी। दोनों ही सूरत में फायदा बीजेपी को ही होने वाला है।विधानसभा अध्यक्ष को इस्तीफा देने पर स्वीकार करना नियम 173 के तहत बाध्यकारी
विधानसभा में भाजपा के उप नेता राजेंद्र राठौड़ ने हाईकोर्ट के वकील हेमंत नाहटा के साथ उच्च न्यायालय में पहुंचकर इस संबंध में एक जनहित याचिका दायर की है। इस याचिका में इस बात को आधार बनाया गया है कि विधानसभा अध्यक्ष डा. सी.पी.जोशी ने कांग्रेस के 91 विधायकों के इस्तीफों पर 2 माह बाद तक कोई निर्णय नहीं लिया है। अब हाईकोर्ट को देखना होगा कि अनुच्छेद 212 का अतिक्रमण तो दायर की गई इस जनहित याचिका में तो नहीं हो रहा है। 91 विधायकों से जबरन हस्ताक्षर कराए जाने या उनके त्याग पत्र पर किसी अपराधी द्वारा हस्ताक्षर कूट रचित कर दिए जाने की कोई सूचना अध्यक्ष के पास नहीं थी। ऐसे में लिखित में अपने हस्ताक्षरों से व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हो कर अध्यक्ष को इस्तीफा पेश किए जाने पर उसे अविलम्ब स्वीकार करना अध्यक्ष के लिए विधानसभा प्रक्रिया नियम 173 के अंतर्गत बाध्यकारी है।इधर कांग्रेस हाईकमान के दो आब्जर्वर भेजे, उधर विधायकों ने दे दिए इस्तीफे
काबिले गौर है कि 25 सितंबर 2022 को हाईकमान द्वारा दो आब्जर्वर भेजे गए थे। इसी दिन प्रदेश में कांग्रेस सरकार समर्थित 91 विधायकों ने अपनी अपनी सीटों से स्वैच्छिक त्याग पत्र देने का निर्णय लेते हुए इस्तीफा विधानसभा अध्यक्ष को व्यक्तिगत रूप से सौंपे थे। तब ऐसा माना गया कि विधायकों ने इस्तीफे अशोक गहलोत और शांति धारीवाल के इशारे पर दिए थे, ताकि हाईकमान का पंजाब मॉडल राजस्थान में लागू न हो सके। इसे रोकने के लिए रणनीतिक तौर पर इस्तीफे दिए गए। दरअसल, किसी भी विधानसभा सीट से स्वेच्छा से इस्तीफ़ा दिया जाना विधायकों का अधिकार होता है। अब उच्च न्यायालय में इस बारे में याचिका दायर होने के बाद कोर्ट इसकी सुनवाई 6 दिसंबर को करेगा। हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य की गहलोत सरकार की दशा-दिशा तय होगी।राहुल की राजस्थान यात्रा पर कहीं भारी न पड़ जाए बीजेपी की हाईकोर्ट में याचिका
हाईकोर्ट में याचिका लगने और सुनवाई की टाइमिंग को लेकर भी कई तरह के कयास लग रहे हैं। दरअसल, राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा चार दिसंबर को राजस्थान में प्रवेश करेगी। सरकार इसकी तैयारियों में जुटी है। दूसरी ओर बीजेपी पूरी तरह से एक्टिव हो गई है। गुरुवार को पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जनाक्रोश यात्रा के लिए 51 रथ जयपुर से रवाना किए थे। यह यात्रा सभी दो सौ विधानसभा क्षेत्रों में जाएगी। इसी बीच बीजेपी ने इस्तीफों को लेकर याचिका लगा दी है। याचिका की जब सुनवाई तय हुई है, उस समय राहुल गांधी की यात्रा राजस्थान में ही होगी। ऐसे में यदि कोर्ट का आदेश कांग्रेस के खिलाफ आ गया तो उसे दोगुनी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।

विधानसभा अध्यक्ष पद व प्रक्रिया का राजनीतिक उद्देश्यों हेतु हो रहा दुरुपयोग-राठौड़
उपनेता प्रतिपक्ष राजेन्द्र राठौड़ ने आरोप लगाया कि इस्तीफों पर तत्काल प्रभाव से निर्णय लेने के संबंध में भाजपा विधायक दल और उसके पश्चात विधानसभा अध्यक्ष को कई बार पत्र लिखे गए, लेकिन इसके बाद भी इस्तीफ़े स्वीकार नही किए गए हैं। उन्होंने कहा कि इस्तीफ़ों को स्वीकार कर लेने की धमकी की आड़ में कांग्रेस सरकार में अशोक गहलोत जबरन मुख्यमंत्री बने हुए हैं। इस कूटनीतिक योजना को अंजाम देने में विधानसभा अध्यक्ष के पद व प्रक्रिया का राजनीतिक उद्देश्यों हेतु दुरुपयोग किया जा रहा है। एक ओर तो 6 बसपा सदस्यों की खिलाफ दलबदल याचिका 3 माह में निस्तारित करने के हाईकोर्ट के 24 अगस्त 2020 को दिए गए आदेशों का सम्मान नही किया जा रहा है तो दूसरी ओर स्वैच्छिक इस्तीफे भी 65 दिनों से स्वीकार नहीं किये गए हैं।बीजेपी चुनाव में गहलोत-पायलट विवाद और तुष्टिकरण को मुद्दा बनाएगी 
बीजेपी राजस्थान की कांग्रेस सरकार में खींचतान और सीएम गहलोत- पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के विवाद और बयानों को बड़ा मुद्दा बनाएगी। प्रदेश में हिन्दुओं पर हमलों, मंदिरों में तोड़फोड़ की घटनाओं, धर्म परिवर्तन, तुष्टिकरण पर बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा गहलोत सरकार को घेरेंगे। राजस्थान में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा भी आने वाली है। नड्डा अपने भाषण में राहुल गांधी के 1 से 10 तक की गिनती गिनने पर किसानों की सम्पूर्ण कर्जमाफी और बेरोजगारों को नौकरी के वादे को लेकर निशाना साधेंगे। प्रदेश में अपराध, महिलाओं से बलात्कार, दलित अत्याचार के मुद्दे पर भी प्रदेश सरकार को बीजेपी नेता आड़े हाथों लेंगे।सोनिया-राहुल के दूत बनकर माकन-मल्लिकार्जुन को मुंह की खानी पड़ी थी
दरअसल, 25 सितंबर को सोनिया-राहुल के दूत बनकर जयपुर आए कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अजय माकन और केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे को मुंह की खानी पड़ी थी। केंद्रीय नेतृत्व ने सीएम अशोक गहलोत से बातचीत के बाद सीएलपी की बैठक के लिए समय और जगह तय की, लेकिन गहलोत गुट के विधायकों ने इसमें भाग ही नहीं लिया, बल्कि उसी समय समानांतर अपनी बैठक बुला ली। गहलोत की जगह राजस्थान के नए मुख्यमंत्री के चयन को लेकर नेता द्वय को हाईकमान ने भेजा था। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और लग्जरी यात्रा कर रहे राहुल गांधी के निर्देश थे कि हर एक विधायक से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत कर रायशुमारी ली जाए। इस बातचीत के आधार पर सीएम के नाम को तय करें। लेकिन गहलोत समर्थक विधायकों ने पर्यवेक्षकों से मुलाकात ही करने की जरूरत नहीं समझी। कांग्रेस के वफादार के लिए ही कुर्सी छोड़ेंगे, किसी गद्दार के लिए नहीं-गहलोत
राजस्थान के कांग्रेस विधायकों ने ही नहीं, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी केंद्रीय पर्यवेक्षकों (अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे) को दो टूक जवाब दे दिया। सीएम गहलोत ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया कि वह कांग्रेस के वफादार के लिए कुर्सी छोड़ेंगे, गद्दार के लिए नहीं।  दरअसल, गहलोत अपना समर्थन दिखाने और शक्ति प्रदर्शन करने के बाद मामले को ठंडा रखना चाहते थे। इससे मुख्यमंत्री गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनने की संभावनाओं के बीच पायलट को सीएम बनाए जाने की आस जगी थी, उस पर गहलोत की रणनीति ने पानी फेर दिया। लेकिन गहलोत गुट ने विधायक दल की बैठक का बहिष्कार कर और स्पीकर सीपी जोशी को 91 विधायकों ने इस्तीफे देकर सारे समीकरण उलट दिए।

आलाकमान को रिपोर्ट सोंपी, कार्रवाई नहीं हुई तो माकन ने दिया इस्तीफा
कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अजय माकन ने कहा था कि विधायक दल की बैठक में कांग्रेस विधायकों का नहीं आना अनुशासनहीनता है। इस बैठक के दौरान उन्होंने खुद बैठक बुला ली। ये और बड़ी अनुशासनहीनता कि 91 विधायकों ने अपने इस्तीफे ही विधानसभा अध्यक्ष को दे दिए। इसकी रिपोर्ट उन्होंने आलाकमान को दी। इस बीच सीएम गहलोत ने नई दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से माफी मांगकर सारे मामले के अपने पक्ष में मोड़ लिया। विधायकों के इस्तीफा प्रकरण और  यूडीएच मिनिस्टर शांति धारीवाल, सीपी जोशी और धर्मेंद्र राठौड़ के खिलाफ कोई कार्रवाई हाईकमान ने नहीं की। इससे नाराज होकर प्रदेश प्रभारी अजय माकन ने ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 

 

 

 

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