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कांग्रेस हाईकमान सीएम गहलोत के आगे कमजोर, अनुशासनहीनता करने वालों को मिला राहुल का साथ, हाईकमान अपने ही दूत का इस्तीफा अपमान होने के बावजूद मंजूर करने को मजबूर

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राजस्थान में सीएम की कुर्सी का पॉलिटिकल ड्रामा और पार्टी में मची आपसी खींचतान हाईकमान के लिए सिरदर्द बनी हुई है। सोनिया गांधी से लेकर अब मल्लिकार्जुन खड़गे तक गहलोत वर्सेज पायलट का कोई तोड़ नहीं निकाल पा रहे हैं। बीते करीब सवा दो साल में यहां के लिए नियुक्त दो प्रदेश प्रभारी इस्तीफा दे चुके है, लेकिन गहलोत-पायलट का विवाद अब तक अनसुलझा है। अब पार्टी के कठपुतली अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे उन्हीं सीएम गहलोत की मर्जी के समक्ष नतमस्तक हैं, जिनके समर्थक तीन नेताओं ने खुद उनके साथ ही अनुशासनहीनता की थी। तब खड़गे हाईकमान के ऑब्जर्वर के रूप में जयपुर आए थे। गहलोत समर्थकों ने खड़गे-माकन की इच्छा के विपरीत समानांतर बैठक करके और 91 विधायकों के इस्तीफे देकर अपने इरादे जता दिए थे। हालात अब यह बने हैं कि अनुशासनहीन नेताओं के खिलाफ तो खड़गे कार्रवाई कर नहीं पाए हैं। अलबत्ता उन्होंने अपने साथ आए प्रदेश प्रभारी अजय माकन का इस्तीफा जरूर स्वीकार कर लिया है।

गहलोत वर्सेज पायलट की लड़ाई पर हाईकमान ने दो प्रदेश प्रभारी किए कुर्बान
राजस्थान में कांग्रेस की 2018 में सरकार बनने के साथ ही गहलोत और पायलट में खींचतान शुरू हो गई थी, लेकिन कोरोना काल में पायलट के मानेसर में डेरा डालने के बाद यह खुलकर सामने आ गई। तब अजय माकन को अगस्त 2020 में अविनाश पांडे की जगह राजस्थान का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया गया था। अविनाश पांडे को सचिन पायलट खेमे की शिकायत के बाद हटाया गया था। पांडे पर गहलोत खेमे का पक्ष लेने के आरोप लगे थे। सचिन पायलट खेमे की बगावत के बाद हुई सुलह में यह मुद्दा उठा था। पायलट खेमे से सुलह के हफ्ते भर बाद ही अविनाश पांडे को प्रभारी पद से हटाकर अजय माकन को राजस्थान का प्रभारी बनाया गया था। अशोक गहलोत और सचिन पायलट की खींचतान में सवा दो साल में दूसरे प्रभारी माकन भी बदल चुके हैं।

पूर्व डिप्टी सीएम सुखजिंदर सिंह रंधावा को कमान, पर उनके सामने चुनौतियां तमाम
अब पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा पर पार्टी ने दांव लगाया है। केंद्रीय नेतृत्व को उम्मीद है कि राजस्थान के दोनों दिग्गज रंधावा के साथ तालमेल बिठा लेंगे और अगले साल होने वाले चुनाव से पहले पार्टी में सब ठीक होगा। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने राजस्थान के प्रभारी महासचिव अजय माकन का इस्तीफा मंजूर कर लिया। रंधावा को प्रभारी बनाने के साथ ही कांग्रेस स्टीयरिंग कमेटी का मेंबर भी बनाकर उनका पार्टी में कद बढ़ाकर राजस्थान भेजा गया है। अब देखना होगा कि राहुल की यात्रा के राजस्थान में रहते वे विवाद का हल निकालने का कोई फॉर्मूला लाते हैं या नहीं। हालांकि, उनके सामने चुनौतियां काफी अधिक हैं। क्योंकि गहलोत-पायलट की लड़ाई चरम पर पहुंच चुकी है।

माकन की तीन नेताओं को दोषी बताने की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं
राजस्थान कांग्रेस का प्रभारी बदलने की वजह 25 सितंबर के सियासी बवाल को मुख्य कारण माना जा रहा है। 25 सितंबर को विधायक दल की बैठक में सीएम अशोक गहलोत खेमे के विधायकों के विधायक दल की बैठक के बहिष्कार के बाद से अजय माकन और सीएम अशोक गहलोत के बीच तल्खी बढ़ गई थी। माकन ने ही तीन गहलोत समर्थक नेताओं को पैरेलल विधायक दल की बैठक बुलाए जाने के मामले में सोनिया गांधी को सौंपी रिपोर्ट में दोषी ठहराया था। माकन की रिपोर्ट के बाद शांति धारीवाल, महेश जोशी और धर्मेंद्र सिंह राठौड़ को नोटिस दिए गए थे, जिनके जवाब दिए गए थे। तीनों नेताओं के खिलाफ एक्शन नहीं होने का मुद्दा उठाते हुए अजय माकन ने 8 नवंबर को ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को चिट्ठी लिखकर इस्तीफा दे दिया था।गहलोत के दबाव में खड़गे, दोषियों पर कार्रवाई के बजाए माकन को दी विदाई 
अजय माकन का राजस्थान प्रभारी पद से इस्तीफा देने के पीछे सियासी खींचतान को कारण बताया जा रहा है। सियासी बवाल के वक्त गहलोत कैंप के कई मंत्रियों ने अजय माकन पर पक्षपात करने के आरोप लगाए गए थे। माकन 25-26 सितंबर के बाद से राजस्थान नहीं आए हैं। हालांकि इस विवाद के बाद सीएम को सोनिया गांधी से माफी मांगनी पड़ी। लेकिन इसके बाद गहलोत के दबाव में माकन की रिपोर्ट पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। उल्टे माकन को ही जाना पड़ा। राजस्थान कांग्रेस प्रभारी के पद से माकन का इस्तीफा मंजूर करने के बाद फिलहाल उन्हें कोई नया पद भी नहीं दिया गया है। माकन लंबे समय से कांग्रेस महासचिव थे। खड़गे के अध्यक्ष बनते ही सभी पदाधिकारियों के इस्तीफे हो गए थे, लेकिन माकन ने 8 नवंबर को लिखी इस्तीफे की चिट्ठी में गहलोत समर्थक तीनों नेताओं के खिलाफ एक्शन नहीं होने पर सवाल उठाए थे। दिलचस्प तथ्य यह है कि हाईकमान ने कोई कार्रवाई नहीं की और इन नेताओं को दोषी होने के बावजूद राहुल गांधी की यात्रा की जिम्मेदारी संभालने का ईनाम मिला। ये नेता अब राहुल गांधी की यात्रा के साथ हैं।

तब खड़गे-माकन को अपमानित होकर दिल्ली वापसी करनी पड़ी थी

काबिले गौर है कि सितंबर में अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी के फरमान के खिलाफ कांग्रेसी विधायकों ने खुलेआम बगावत कर दी है। कांग्रेस खासकर गहलोत गुट के विधायकों ने आलाकमान के आदेश मानने से साफ इनकार कर दिया। यही वजह है कि सोनिया-राहुल के दोनों ‘दूतों’ को खाली हाथ ही नहीं, बल्कि एक तरह से अपमानित होकर दिल्ली वापसी करनी पड़ी थी। कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अजय माकन ने इसे कांग्रेस विधायकों की अनुशासनहीनता करार दिया है और इसकी रिपोर्ट आलाकमान तो देने की बात कही है, ताकि विधायकों की नाफरमानी पर एक्शन लिया जा सके। इस बीच हालात यहां तक बिगड़े हैं कि आलाकमान को गहलोत-पायलट के बीच तेज हुई सियासी लड़ाई में सुलह के लिए मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम कमलनाथ की ड्यूटी लगानी पड़ी है।सोनिया-राहुल के दूतों के सामने ही समानांतर बैठक बुलाकर इरादे जताए 
कांग्रेस में अध्यक्ष और राजस्थान में मुख्यमंत्री को लेकर विधायकों से लेकर आलाकमान तक उलझ गया है। दरअसल, कांग्रेस थिंक टैंक गहलोत की जगह दूसरे सीएम की जिस नियुक्ति को मामूली बात समझ रहा था, वह अब लोहे के चने चबाने जैसी हो गई है। सोनिया-राहुल के दूत बनकर जयपुर आए कांग्रेस प्रदेश प्रभारी अजय माकन और केंद्रीय पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे को मुंह की खानी पड़ी थी। दरअसल, केंद्रीय नेतृत्व की सीएम अशोक गहलोत से बातचीत के बाद सीएलपी की बैठक के लिए समय और जगह निर्धारित होने के बावजूद गहलोत गुट के कई विधायकों ने इसमें भाग ही नहीं लिया, बल्कि उसी समय समानांतर अपनी बैठक बुला ली।

गहलोत समर्थक विधायकों ने प्रभारी और पर्यवेक्षक से मुलाकात तक नहीं की
गहलोत से समय और जगह तय करने के बाद ही दिल्ली से प्रदेश प्रभारी अजय माकन और पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खडगे जयपुर के लिए रवाना हुए थे। गहलोत की जगह राजस्थान के नए मुख्यमंत्री के चयन को लेकर नेता द्वय को हाईकमान ने भेजा था। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी और लग्जरी यात्रा कर रहे राहुल गांधी के निर्देश थे कि हर एक विधायक से व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत कर रायशुमारी ली जाए। इस बातचीत के आधार पर सीएम के नाम को तय करें। लेकिन गहलोत समर्थक विधायकों ने पर्यवेक्षकों से मुलाकात ही करने की जरूरत नहीं समझी।सरकार बचाने वाले 102 विधायकों यानी गहलोत गुट से ही कोई विधायक सीएम बने
विधायक दल की बैठक में आने से गहलोत गुट के विधायक साफ ही मुकर गए। इतना ही नहीं, आलाकमान के दूतों के सामने इन विधायकों ने तीन शर्तें भी रख दीं। उन्होंने कहा कि इन शर्तों का पालन अनिवार्य रूप से हो, अन्यथा उनके इस्तीफे तैयार हैं। शर्तें न मानने की स्थिति में गहलोत सरकार गिरने की नौबत आ सकती है। गहलोत गुट के विधायकों की शर्तें थीं….पहली तो यह की दो साल पहले संकट के दौरान सरकार बचाने वाले 102 विधायकों यानी गहलोत गुट से ही किसी विधायक को सीएम बनाएं। दूसरी, सीएम तब घोषित हो, जब अध्यक्ष का कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हो जाए। तीसरी और आखिरी शर्त के मुताबिक जो भी नया मुख्यमंत्री हो, वो गहलोत की पसंद का ही हो।

कांग्रेस के वफादार के लिए ही कुर्सी छोड़ेंगे, किसी गद्दार के लिए नहीं-गहलोत
राजस्थान के कांग्रेस विधायकों ने ही नहीं, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी केंद्रीय पर्यवेक्षकों (अजय माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे) को दो टूक जवाब दे दिया। सीएम गहलोत ने साफ-साफ शब्दों में कह दिया कि वह कांग्रेस के वफादार के लिए कुर्सी छोड़ेंगे, गद्दार के लिए नहीं। फिलहाल गहलोत अपना समर्थन दिखाने और शक्ति प्रदर्शन करने के बाद मामले को ठंडा रखना चाहते हैं। उनके समर्थक कह रहे हैं की कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव के बाद मुख्यमंत्री का फैसला होना चाहिए। मुख्यमंत्री गहलोत को पार्टी अध्यक्ष बनने की संभावनाओं के बीच पायलट को सीएम बनाए जाने की आस जगी थी। लेकिन गहलोत गुट ने विधायक दल की बैठक का बहिष्कार कर और स्पीकर सीपी जोशी को 70 विधायकों ने इस्तीफे देकर सारे समीकरण उलट दिए।

कांग्रेस से गद्दारी करने वालों को सीएम की कुर्सी देने की चाल नहीं चलने देंगे
इस बीच यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल ने सचिन पायलट का नाम लिए बगैर कहा कि जिस प्रकार से प्रस्ताव पास करवाया जा रहा था। जो तरीका अपनाया गया, उससे साफ लगा कि उन लोगों को कुर्सी पर बैठाया जाएगा, जिन लोगों ने कांग्रेस के साथ गद्दारी की। सवाल इस बात का है कि आप किसी को बना दीजिए, जो 102 विधायक जयपुर और जैसलमेर के होटल में मौजूद थे। धारीवाल ने यह भी कहा कि यह गलत बात है कि गहलोत ने सीएम के लिए सीपी जोशी का नाम लिया है। जोशी ने पहले दिन मना कर दिया था कि मेरा इस पद से कोई लेना देना नहीं है।

 

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