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कांग्रेस की देन है असम-मिजोरम सीमा विवाद, जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर किया गया सीमा निर्धारण

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उत्तर पूर्वी राज्य असम और मिजोरम के बीच सीमा विवाद में रविवार यानि 25 जुलाई, 2021 को हिंसक झड़प हो गई, जिसमें असम पुलिस के 6 जवान मारे गए, वहीं दोनों राज्यों के कई पुलिसकर्मी घायल हो गए। असम और मिजोरम के बीच ये सीमा विवाद 146 वर्ष पुराना है। मिजोरम कभी असम का एक जिला हुआ करता था। 1972 में तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम लागू किया और मिज़ोरम को असम से अलग कर केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। इसके बाद 20 फरवरी, 1987 को इसे भारत के 23वें राज्य का दर्जा दिया। हालांकि असम और मिजोरम राज्यों के बीच चल रहा सीमा विवाद औपनिवेशिक काल से चला आ रहा है, लेकिन 1972 में असम से मिजोरम को अलग करते समय ब्रिटिश शासन के तहत 1875 और 1933 में पारित दो अधिसूचनाओं से उपजे सीमा विवाद का समाधान नहीं किया गया।

दरअसल प्रशासनिक सुविधा के हिसाब से राज्यों की सीमा का निर्धारण किया गया। जमीनी स्तर पर ये सीमाएं अभी भी जनजातीय क्षेत्रों और उनकी सास्कृतिक पहचानों के साथ मेल नहीं खाती हैं, जिसके कारण इस क्षेत्र में बार-बार क्षेत्रीय विवाद पैदा होता है और यहां की शांति भंग होती है। दुर्भाग्य से, केंद्र की कांग्रेस सरकार ने ऐसा कोई तंत्र नहीं बनाया जो पूर्वोत्तर राज्यों के सीमा विवादों का संयुक्त रूप से समाधान कर सके। कांग्रेस सरकार ने इन विवादों के समाधान के लिए राज्यों पर छोड़ दिया। उनकी उदासीनता के कारण यह सीमा विवाद जारी रहा, जिससे इस क्षेत्र की शांति, विकास और आपसी सहयोग प्रभावित होता है। 

 पूर्वोत्तर राज्यों में सीमा विवाद की जड़ में कांग्रेस

  • 1950 के दशक में हुए पूर्वोत्तर राज्यों के परिसीमन की प्रक्रिया के दौरान जातीय और सांस्कृतिक विशिष्टताओं को नजरअंदाज किया गया।
  • सीमा का निर्धारण प्रशासनिक सुविधा के हिसाब से किया गया, जो जमीनी स्तर पर जनजातीय पहचानों के साथ मेल नहीं खाती हैं।
  • कांग्रेस शासन में इस सीमा विवाद को सुलझाने के लिए किसी स्तर पर ज्वाइंट सर्वे कराने की कोशिश नहीं हुई।
  • वर्ष 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार को एक सीमा आयोग बनाने के लिए कहा था। लेकिन आयोग का गठन नहीं हुआ।
  • केंद्र की कांग्रेस सरकारों ने ऐसा कोई तंत्र नहीं बनाया जो पूर्वोत्तर राज्यों के सीमा विवादों का संयुक्त रूप से समाधान कर सके।
  • संवैधानिक और ऐतिहासिक सीमा को लेकर दोनों राज्यों में अलग-अलग समझ है, जिसपर आम सहमति बनाने का ठोस प्रयास नहीं हुआ।

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