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भारतीय नौसेना को मिला देश का पहला स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर ‘विक्रांत’, अब तक के सबसे बड़े युद्धपोत से भारत की बढ़ेगी समुद्री ताकत

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मजबूत इच्छाशक्ति और उनकी सरकार की मेक इन इंडिया पहल से समुद्री सुरक्षा के मामले में भारत आत्मनिर्भर बनता जा रहा है। इस दिशा में भारत ने गुरुवार (28 जुलाई, 2022) को एक मजबूत कदम बढ़ाया। कोचीन शिपयार्ड ने देश का पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘विक्रांत’ को भारतीय नौसेना को सौंप दिया। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों के ग्रुप में शामिल हो गया, जिनके पास स्वदेशी तौर से एयरक्राफ्ट कैरियर डिजाइन और निर्माण करने की बेहतर क्षमता है। माना जा रहा है कि इसके आने से भारतीय नौसेना की ताकत में काफी इजाफा होगा।

स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘विक्रांत’ के नौसेना के बेड़े में शामिल होने की अंतिम उलटी गिनती अब शुरू हो गई है। इसे 15 अगस्त तक नौसेना के बेड़े में शामिल किए जाने की उम्मीद है। करीब 20,000 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित 45,000 टन के इस युद्धपोत को नौसेना के इन-हाउस डायरेक्टरेट ऑफ नेवल डिजाइन (डीएनडी) की ओर से डिजाइन किया गया है। इसका नाम भारत के पहले विमानवाहक पोत, भारतीय नौसेना जहाज (INS) विक्रांत के नाम पर रखा गया है, जिसने 1971 के जंग में अहम भूमिका निभाई थी।

भारतीय नौसेना ने कहा कि भारत इस समय आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है ऐसे में विक्रांत का नए रूप में आना समुद्री सुरक्षा को बढ़ाने को लेकर क्षमता निर्माण की दिशा में ये अहम और ठोस कदम है। एयरक्राफ्ट कैरियर विक्रांत को मशीनरी संचालन और नेविगेशन की क्षमता के साथ बनाया गया है। यह MIG-29 लड़ाकू जेट, कामोव-31, एमएच-60आर मल्टी पर्पस हेलीकाप्टरों की उड़ान के लिए सक्षम है। इसकी अधिकतम गति 28 समुद्री मील होगी।

स्वदेशी विमानवाहक पोत विक्रांत 262 मीटर लंबा और 62 मीटर चौड़ा है।इसमें 30 लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर ले जाने की क्षमता है। इसे 88 मेगावाट बिजली की कुल चार गैस टर्बाइन्स द्वारा संचालित किया जाएगा। इसमें 76 प्रतिशत सामग्री स्वदेशी है। ये आधुनिक क्षमताओं से लैस है। साल 2009 में इसका निर्माण शुरू हुआ था। साल 2013 में इसे पहली बार लॉन्च किया गया था। अभी तक केवल संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, रूस, फ्रांस और चीन के पास विमान वाहक पोत बनाने की क्षमता थी।

गौरतलब है कि स्वदेशी विमानवाहक पोत ‘विक्रांत’ 1971 के युद्ध में अहम भूमिका निभाने वाले ‘विक्रांत’ की तुलना में बहुत बड़ा और अधिक बेहतर है। साल 1961-1997 तक पहला विक्रांत (ब्रिटिश मूल), 1987-2016 से आईएनएस विराट (ब्रिटिश मूल) और आईएनएस विक्रमादित्य (रूसी मूल) 2013 के बाद विक्रांत भारतीय नौसेना द्वारा संचालित होने वाला चौथा विमानवाहक पोत होगा।  

आइए देखते हैं मेक इन इंडिया के तहत निर्मित रक्षा उपकरण किस तरह सेना की ताकत बढ़ा रहे हैं… 

डॉर्नियर सर्विलांस एयरक्राफ्ट से बढ़ी नौसेना की ताकत
भारतीय नौसेना में नया डॉर्नियर -228 स्क्वाड्रन INAS 313 शामिल किया गया। नौसेना प्रमुख एडमिरल करमबीर सिंह ने जुलाई 2019 में मीनाम्बक्कम में पांचवें डॉर्नियर एयरक्राफ्ट स्वैड्रॉन को भारतीय नौसेना को सौंपा। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड द्वारा स्वदेशी रूप से बनाए गए इन विमानों को आधुनिक उपकरणों से सुसज्जित किया गया है। मल्टीरोल सर्विलांस डॉर्नियर एयरक्राफ्ट में आधुनिक सेंसर्स और उपकरण लगाए गए हैं, जिससे दुश्मन पर कड़ी नजर रखी जा सकेगी। यह बचाव और खोजी अभियानों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इससे नौसेना की निगरानी क्षमता काफी बढ़ गई है। डॉर्नियर विमान का इस्तेमाल पूर्वी समुद्री सीमा पर निगरानी के लिए किया जाएगा।

‘मेक इन इंडिया’ के तहत तैयार आईएनएस ‘करंज’
मेक इन इंडिया के तहत निर्मित स्कॉर्पीन श्रेणी की तीसरी पनडुब्बी आईएनएस ‘करंज’ को 31 जनवरी, 2018 को नौसेना के बेड़े में शामिल किया गया था। ‘करंज’ एक स्वदेशी पनडुब्बी है। करंज पनडुब्बी कई आधुनिक फीचर्स से लैस है और दुश्मनों को चकमा देकर सटीक निशाना लगा सकती है। इसके साथ ही ‘करंज’ टॉरपीडो और एंटी शिप मिसाइलों से हमले भी कर सकती है। करंज पनडुब्बी में कई और खूबियां भी हैं। यह पनडुब्बी रडार की पकड़ में नहीं आ सकती। यह जमीन पर हमला करने में सक्षम है, इसमें ऑक्सीजन बनाने की भी क्षमता है, यही वजह है कि करंज पनडुब्बी लंबे समय तक पानी में रह सकती है। युद्ध की स्थिति में करंज पनडुब्बी हर तरह के हालात से सुरक्षित और बड़ी आसानी से दुश्मनों को चकमा देकर बाहर निकल सकती है।

पीएम मोदी ने लांच की आईएनएस ‘कलवरी’
प्रधानमंत्री मोदी ने भारत में बनी स्कॉर्पीन श्रेणी की पहली पनडुब्बी आईएनएस कलवरी को 14 दिसंबर, 2017 को लांच किया था। वेस्टर्न नेवी कमांड में आयोजित एक कार्यक्रम में पीएम मोदी की मौजूदगी में इस पनडुब्बी को नौसेना में कमीशंड किया गया था। इस पनडुब्बी ने केवल नौसेना की ताकत को अलग तरीके से परिभाषित किया, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के लिए भी इसे एक मील का पत्थर माना गया। कलवरी पनडुब्बी को फ्रांस की एक कंपनी ने डिजाइन किया था, तो वहीं मेक इन इंडिया के तहत इसे मुंबई के मझगांव डॉकयॉर्ड में तैयार किया गया। आईएनएस कलवरी के बाद 12 जनवरी, 2019 को स्कॉर्पीन श्रेणी की दूसरी पनडुब्बी आईएनएस खांदेरी को लांच किया गया था। कलवरी और खंडेरी पनडुब्बियां भी आधुनिक फीचर्स से लैस हैं। यह दुश्मन की नजरों से बचकर सटीक निशाना लगाने में सक्षम हैं, साथ ही टॉरपीडो और एंटी शिप मिसाइलों से हमले भी कर सकती हैं।

पूरी तरह देश में निर्मित धनुष तोप सेना में शामिल 
अक्टूबर 2019 में भारतीय सेना ने संभावित खतरों को देखते हुए बोफोर्स से भी खतरनाक तोप धनुष को अपने आर्टिलरी विंग में शामिल कर लिया। स्वदेश में निर्मित इस तोप की मारक क्षमता इतनी खतरनाक है कि 50 किलोमीटर की दूरी पर बैठा दुश्मन पलक झपकते ही खत्म हो जाएगा। यह 155 एमएम और 45 कैलिबर की आर्टिलरी गन है। धनुष में इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम को जोड़ा गया है। इसमें आटो लेइंग सुविधा है। ऑनबोर्ड बैलिस्टिक गणना और दिन और रात में सीधी फायरिंग की आधुनिकतम क्षमता से लैस है। इसमें लगी सेल्फ प्रोपल्शन यूनिट पहाड़ी क्षेत्रों में धनुष को आसानी से पहुंचाने में सक्षम है। धनुष के ऊपर मौसम का कोई असर नहीं होता। यह -50 डिग्री सेल्सियस से लेकर 52 डिग्री की भीषण गर्मी में भी 24 घंटे काम कर सकती है। सेल्फ प्रोपेल्ड मोड में भी ये गन रेगिस्तान और हजारों मीटर ऊंचे खड़े पहाड़ों पर चढ़ सकती है।

K9 वज्र और M777 होवित्जर तोपें सेना में शामिल
K9 वज्र और M777 होवित्जर तोपों को 9 नवंबर 2018 को सेना में शामिल किया गया। इससे सेना की ताकत और बढ़ गई है। के9 वज्र तोप की रेंज 28-38 किमी है और तीन मिनट में 15 गोले दाग सकती है। यह पहली ऐसी तोप है जिसे भारतीय प्राइवेट सेक्टर ने बनाया है। इसके साथ एम 777 होवित्जर तोप 30 किमी तक वार कर सकती है। इसे हेलिकॉप्टर या प्लेन से आवश्यकतानुसार एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है। 9 नवंबर को देवलाली में आयोजित समारोह में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और तत्कालीन आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत समेत कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हुए।

वायु सेना में देसी ‘तेजस’ का पहला स्क्वैड्रन शामिल
प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा लॉन्च किये गए मेक इन इंडिया अभियान के तहत देश में बने हल्के लडाकू विमान, तेजस के पहले स्क्वैड्रन को जुलाई 2016 में वायुसेना में शामिल कर लिया गया। पहली खेप में दो विमान वायुसेना में शामिल किए गए। एचएएल ने यहां एयरक्राफ्ट सिस्टम टेस्टिंग इस्टैबलिशमेंट में एक कार्यक्रम के दौरान वायुसेना के दो तेजस विमान सौंपे। पहली स्क्वाड्रन फ्लाइंग डैगर्स नाम दिया गया। तेजस ने गणतंत्र दिवस, एयरो इंडिया और वायु सेना दिवस में भाग लिया। एसयू-30 एमकेआई विमानों का निर्माण एचएएल में किया जा रहा है।

आइए देखते हैं मोदी सरकार किस तरह रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया को बढ़ावा दे रही है…

प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को हथियारों और युद्ध तकनीक के बारे में आत्मनिर्भर होने की जरूरत पर बल दिया है। ताकि भारत भविष्य में आने वाली जंग जैसी चुनौतियों का सामना करने में सक्षम हो सके। इसके लिए कई अहम निर्णय लिए गए हैं। रक्षा मंत्रालय ने अब तक 200 से अधिक रक्षा उपकरणों की सूची जारी की, जिन्हें अब विदेश से नहीं खरीदा जाएगा। इसके लिए देश में ही सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में रक्षा अनुसंधान, डिजाइन और विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।

हथियार बनाने के लिए 494 करोड़ रुपये का विदेशी निवेश
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत हर क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर आगे बढ़ रहा है। वहीं भारत को लेकर दुनिया का दृष्टिकोण भी काफी आशावादी है। इसी का परिणाम है कि रक्षा क्षेत्र में तेजी से विदेशी निवेश हो रहा है। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने सोमवार (25 जुलाई, 2022) को लोकसभा में बताया कि 2020 में संशोधित एफडीआई नीति पर अधिसूचना जारी होने के बाद से रक्षा क्षेत्र में लगभग 494 करोड़ रुपये का निवेश प्राप्त हुआ है।

निवेश को आकर्षित करने के लिए कई नीतिगत सुधार

संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए रक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में मोदी सरकार ने घरेलू रक्षा विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय किए हैं। 2020 में सरकार ने रक्षा क्षेत्र में स्वचालित मार्ग से एफडीआई की सीमा को 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत और सरकारी मार्ग से 100 प्रतिशत तक बढ़ाने की घोषणा की थी। रक्षा उत्पादन विभाग (डीडीपी) ने निवेश को आकर्षित करने के लिए कई नीतिगत सुधार किए हैं। इससे आधुनिक प्रौद्योगिकी की पहुंच बनने की संभावना बढ़ी है।

358 निजी कंपनियों को 584 रक्षा लाइसेंस जारी

भट्ट ने एक अन्य सवाल के जवाब में कहा कि सरकार ने विनिर्माण इकाइयों की स्थापना के लिए निजी कंपनियों को लाइसेंस जारी कर रही है। रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए मोदी सरकार ने 358 निजी कंपनियों को विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने की खातिर 584 रक्षा लाइसेंस जारी किए हैं। इनमें हथियार निर्माण के लिए 107 लाइसेंस शामिल हैं।

भारतीय कंपनियों से रक्षा उपकरण खरीदने पर जोर

रक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि सरकार आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है और उसने घरेलू रक्षा निर्माण को बढ़ावा देने का फैसला किया है। अगले पांच वर्षो में भारत करीब 130 अरब डालर (दस लाख करोड़ रुपये से ज्यादा) के हथियार और रक्षा उपकरण खरीद सकता है। सरकार की कोशिश है कि भारतीय कंपनियां उच्च गुणवत्ता वाले हथियार बनाने की क्षमता प्राप्त करें और सरकार उनसे ही हथियार खरीदे। 

2014 के बाद रक्षा क्षेत्र में 3,343 करोड़ रुपये का FDI

इससे पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 28 मार्च, 2022 को राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में बताया था कि वर्ष 2014 से रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में कुल 3,343 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। उन्होंने कहा था कि वर्ष 2001-2014 की अवधि के दौरान, लगभग 1,382 करोड़ रुपये का कुल एफडीआई प्रवाह दर्ज किया गया था और वर्ष 2014 से अब तक लगभग 3,343 करोड़ रुपये का कुल एफडीआई हासिल किया गया है। 

दो डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का निर्माण जारी

गौरतलब है कि बजट 2018-19 में सरकार ने रक्षा क्षेत्र की मजबूती के लिए दो डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर का ऐलान किया था। पहला डिफेंस कॉरिडोर उत्तर प्रदेश में और दूसरा कॉरिडोर तमिलनाडु में बनाया जा रहा है। इस कॉरिडोर की मदद से सरकार डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना चाहती है। सरकार की योजना इस कॉरिडोर की मदद से वित्त वर्ष 2024-25 तक दोनों राज्यों में 10-10 हजार करोड़ के निवेश को आकर्षित करने को है।

मोदी सरकार द्वारा स्वदेशी कंपनियों को बढ़ावा

मोदी सरकार के नीतिगत फैसले और प्रोत्साहन की वजह से 14 रक्षा तकनीकों को स्वदेशी स्टार्टअप कंपनियों द्वारा बनाया जा रहा है, उसमें एमसीडी ग्लैंड्स शामिल है। इसे स्वीडन की रोक्सटैक से आयात किया जा रहा था, जिसे फरीदाबाद की मैसर्स वालमैक्स ने बनाना शुरू कर दिया है। इसी प्रकार ब्रिज विंडो ग्लास पहले स्पेन की सेंट गोबैन कंपनी से आयात किया जाता था, लेकिन जयपुर के एक स्टार्टअप मैसर्स जीत एंड जीत इसका विकास और निर्माण कर रहा है। इसके अलावा जर्मनी की एक कंपनी से सीकेड्स को लासर्न एंड टूब्रो बेंगलुरु और आयुध कारखाने डीआरडीई ग्वालियर ने तैयार किया है। मुंबई की कंपनी मैसर्स जेम्स वाल्कर ने फ्रांस से आयातित दो तकनीकों को तैयार किया है।

आयात होने वाले रक्षा उपकरणों का भारत में निर्माण

समुद्री पनडुब्बियों में इस्तेमाल होने वाली बैटरी लोडिंग ट्राली एक बहुतायत से इस्तेमाल होने वाला उपकरण है। इसके मैसर्स नेवल ग्रुप फ्रांस से आयात किया जाता था, जिसे अब हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी एसईसी इंडस्ट्रीज द्वारा तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा पनडुब्बियों में इस्तेमाल होने वाले वातानुकूलन संयंत्र का आयात मैसर्स सनोरी फ्रांस से हो रहा था, जिसे कारद स्थित श्री रेफ्रीजरेशन ने तैयार कर लिया है। इसी प्रकार वेंटीलेसन वालव्स का आयात भी ब्रिटेन से किया जा रहा था, जिसका निर्माण अहमदाबाद की कंपनी मैसर्स चामुंडा वालव्स द्वारा किया जा रहा है। रिमोट कंट्रोल वालव्स का आयात ब्रिटेन की कंपनी थामपसान से किया जा रहा था, जिसका निर्माण पुणे की कंपनी मैसर्स डेलवाल ने शुरू कर दिया है।

आत्मनिर्भरता में सहायक बनीं स्टार्टअप कंपनियां

आज भारत की स्टार्टअप कंपनियां रक्षा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता में अहम भूमिका निभा रही है। विदेशों से आयात की जाने वाली रक्षा तकनीकों को स्वदेशी स्टार्टअप कंपनियां अब तेजी से तैयार करने लगी हैं। रक्षा मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक साल के दौरान 14 ऐसी महत्वपूर्ण रक्षा तकनीकों को भारत में तैयार करने में सफलता मिली है, जिन्हें अभी तक विदेशों से आयात किया जा रहा था। इनके देश में ही निर्माण का रास्ता साफ होने से इन्हें आयात करने की बाध्यता खत्म हो गई है।

आयात में कमी से विदेशी मुद्रा की बचत, रोजगार सृजन

रक्षा मंत्रालय के मुताबिक रक्षा तकनीकों के देश में निर्माण होने से इनके आयात में 40-60 प्रतिशत तक की कमी आने का अनुमान है। दूसरे, इससे हर साल भारी मात्रा में विदेश मुद्रा की बचत होगी। साथ ही रोजगार सृजित होंगे। रक्षा तकनीकों के देश में निर्माण होने से रक्षा क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर बनेगा। भारत अपने रक्षा उपकरणों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की तरफ अग्रसर होने के साथ ही बड़े निर्यातक के रूप में उभर रहा है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत अब रक्षा उत्पादों के निर्यात करने वाले शीर्ष 25 देशों की सूची में शामिल हो गया है। भारत ने मिसाइल और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्यात के लिए कई देशों से समझौता किया है।

सैन्य हथियार बनाने वाली 3 भारतीय कंपनियां दुनिया की टॉप 100 में शामिल
सैन्य हथियार बनाने में भारत तेजी से आत्मनिर्भर बन रहा है। आज दुनिया भर में मेक इन इंडिया का दबदबा बढ़ा है। सैन्य उपकरण बनाने वाली दुनिया की टॉप 100 कंपनियों में 3 भारतीय कंपनियां शामिल हैं। स्वीडिश थिंक-टैंक स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 के दौरान जहां हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (42वें स्थान पर) और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड (66वें स्थान पर) की हथियारों की बिक्री में क्रमश: 1.5 प्रतिशत और 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं इंडियन ऑर्डिनेंस फैक्ट्रीज (60वें स्थान पर) की हथियारों की बिक्री में 0.2 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय कंपनियों की कुल हथियारों की बिक्री 6.5 बिलियन डॉलर (लगभग 48,750 करोड़ रुपये) रही, जो 2019 की तुलना में 2020 में 1.7 प्रतिशत अधिक थी।

भारत के पहले स्वदेश निर्मित एयरक्रॉफ्ट ‘विक्रांत’ का समुद्र में परीक्षण
भारत के पहले स्वदेश निर्मित विमानवाहक जहाज ‘विक्रांत’ का 4 अगस्त, 2021 को समुद्र में परीक्षण शरू किया गया। यह देश में निर्मित सबसे बड़ा और जटिल युद्धपोत है। भारतीय नौसेना ने इसे देश के लिए ‘‘गौरवान्वित करने वाला और ऐतिहासिक’’ दिन बताया और कहा कि भारत उन चुनिंदा देशों में शुमार हो गया है जिनके पास विशिष्ट क्षमता वाला स्वदेशी रूप से डिजाइन किया, निर्मित और एकीकृत अत्याधुनिक विमानवाहक पोत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विक्रांत को ‘मेक इन इंडिया’ का अद्भुत उदाहरण बताया। उन्होंने भारतीय नौसेना और कोचिन शिपयार्ड लिमिटेड को बधाई दी। विक्रांत को परीक्षण पूरे करने के बाद इस साल की दूसरी छमाही में भारतीय नौसेना में शामिल किए जाने की उम्मीद है। इसे करीब 23,000 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित किया गया है।

स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार का अर्मेनिया को निर्यात 
प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों का असर है कि अब तक हथियारों का आयात करने वाला भारत अब हथियारों का निर्यात कर रहा है। भारत ने रूस और पौलेंड की पछाड़ते हुए अर्मेनिया के साथ रक्षा सौदा किया। इस करार में भारत रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) द्वारा विकसित और भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड (BEL) द्वारा निर्मित 40 मिलियन डॉलर (करीब 280 करोड़ रुपये) का हथियार अर्मेनिया को बेच रहा है। इसमें ‘स्वाती वेपन लोकेटिंग रडार’ सिस्टम शामिल है। इन हथियारों का निर्माण ‘मेक इन इंडिया’ के तहत किया गया है। स्वाति वेपन लोकेटिंग रडार 50 किमी के रेंज में दुश्मन के हथ‍ियारों जैसे मोर्टार, शेल और रॉकेट तेज, स्वचालित और सटीक तरीके से पता लगा लेता है।

भारत में बनी बुलेटप्रूफ जैकेट 100 से ज्यादा देशों को निर्यात
रक्षा क्षेत्र में ‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने का ही नतीजा है कि आज दुनिया भर में भारत में बनी बुलेटप्रूफ जैकेट की मांग है। भारत ने 100 से ज्यादा देशों को राष्ट्रीय मानक की बुलेटप्रूफ जैकेट का निर्यात शुरू कर रहा है। भारत की मानक संस्था ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड (बीआईएस) के मुताबिक, बुलेटप्रूफ जैकेट खरीददारों में कई यूरोपीय देश भी शामिल हैं। अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी के बाद भारत चौथा देश है, जो राष्ट्रीय मानकों पर ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की बुलेटप्रूफ जैकेट बनाता है। भारत में बनी बुलेटप्रूफ जैकेट की खूबी है कि ये 360 डिग्री सुरक्षा के लिए जानी जाती है। 

लाइटवेट एंटी-सबमरीन टॉरपीडो म्यांमार को किया गया निर्यात
भारत ने स्वदेश निर्मित लाइटवेट एंटी-सबमरीन शायना टॉरपीडो को म्यांमार को निर्यात किया। एडवांस्ड लाइट टॉरपीडो (TAL) शायना भारत की पहली घरेलू रूप से निर्मित लाइटवेट एंटी-सबमरीन टॉरपीडो है। इसे DRDO के नौसेना विज्ञान और तकनीकी प्रयोगशाला द्वारा विकसित किया गया है और इस टॉरपीडो का निर्माण भारत डायनेमिक्स लिमिटेड ने किया है। भारतीय हथियार उद्योग के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है। टीएएल शायना टॉरपीडो के पहले बैच को 37.9 मिलियन डॉलर के निर्यात सौदे के हिस्से के रूप में म्यांमार भेजा गया, जिस पर 2017 में हस्ताक्षर किए गए थे। 

रक्षा क्षेत्र में स्टार्टअप शुरू करने पर जोर
अगस्त 2018 में बेंगलुरु में डिफेंस इंडिया स्टार्टअप चैलेंज का आयोजन किया गया था, जिसमें मोदी सरकार ने लेजर हथियारों और 4G लैन (लोकल एरिया नेटवर्क) जैसी 11 तकनीकी चुनौतियों को स्टार्टअप शुरू करनेवाले उद्यमियों के सामने रखा। इन चुनौतियों में ज्यादातर ऐसी हैं, जो सुरक्षा बलों से जुड़ी हैं। सरकार ने देश में स्टार्टअप को शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने में सहयोग देने वाली केंद्र सरकार की नीति की घोषणा करते हुए उद्यमियों को रक्षा क्षेत्र में निवेश करने और इसमें हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित किया।

नीतिगत पहल और निवेश
रक्षा मंत्रालय स्वदेशी को बढ़ावा देकर करोड़ों रुपये की बचत कर रहा है। रक्षा उत्पादों का स्वदेश में निर्माण के लिए मोदी सरकार ने 100 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दी हुई है। इसमें से 49 प्रतिशत तक की FDI को सीधे मंजूरी का प्रावधान है, जबकि 49 प्रतिशत से अधिक के FDI के लिए सरकार से अलग से मंजूरी लेनी पड़ती है।

इसके अलावा भी कई ऐसी रक्षा परियोजनाएं हैं जिनमें पीएम मोदी की पहल पर मेक इन इंडिया को बढ़ावा दिया जा रहा है। डालते हैं एक नजर-

अपाचे जैसा हेलिकॉप्टर बनाने के प्रोजेक्ट पर काम जारी
मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ योजना के तहत भारत में अपाचे जैसा हेलिकॉप्टर के विनिर्माण का रास्ता खुला है। हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने भारतीय सेना के लिए युद्धक हेलिकॉप्टर बनाने के मेगा प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया है। एचएएल के मुताबिक 10 से 12 टन के ये हेलिकॉप्टर दुनिया के बेहतरीन हेलिकॉप्टर्स की तरह आधुनिक और शक्तिशाली होंगे। एचएएल के प्रमुख आर माधवन ने कहा कि जमीनी स्तर पर काम शुरू किया जा चुका है और 2027 तक इन्हें तैयार किया जाएगा। इस मेगा प्रोजेक्ट का लक्ष्य आने वाले समय में सेना के तीनों अंगों के लिए 4 लाख करोड़ रुपये के सैन्य हेलिकॉप्टर्स के आयात को रोकना है।

पनडुब्बी बढ़ाएगी नौसेना की ताकत
मेक इन इंडिया के तहत नौसेना के लिए भारत में ही करीब 40 हजार करोड़ रुपये की लागत से छह पी-75 (आई) पनडुब्बियां बनाई जा रही है। पनडुब्बियों के निर्माण की दिशा में स्वदेशी डिजाइन और निर्माण की क्षमता विकसित करने के लिए नौसेना ने 20 जुलाई, 2021 को संभावित रणनीतिक भागीदारों को छांटने के लिए कॉन्ट्रैक्ट जारी कर दिया। रणनीतिक भागीदारों को मूल उपकरण विनिर्माताओं के साथ मिलकर देश में इन पनडुब्बियों के निर्माण का संयंत्र लगाने को कहा गया है। इस कदम का मकसद देश को पनडुब्बियों के डिजाइन और उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाना है।

मेक इन इंडिया के तहत क्लाश्निकोव राइफल
मेक इन इंडिया के तहत अब दुनिया के सबसे घातक हथियारों में से एक क्लाश्निकोव राइफल एके 103 भारत में बनाए जाएंगे। असास्ट राइफॉल्स एके 47 दुनिया की सबसे कामयाब राइफल है। भारत और रूसी हथियार निर्माता कंपनी क्लाश्निकोव मिलकर एके 47 का उन्नत संस्करण एके 103 राइफल बनाएंगे। सेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसे भारत में बनाया जाएगा। इसे भारत से निर्यात भी किया जा सकता है।

भारत में फाइटर जेट एफ-16 के उपकरण का निर्माण
पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी योजना ‘मेक इन इंडिया’ परवान चढ़ रहा है। इसी योजना के तहत भारत में फाइटर जेट एफ-16 के विनिर्माण का रास्ता खुला। सुरक्षा और एयरो स्पेस काम करने वाली अमेरिकी कंपनी लॉकहिड मार्टिन ने इसके लिए भारतीय कंपनी टाटा एडवांस सिस्टम लिमिटेड (TASL) के साथ समझौता किया। इसके तहत भारत में फाइटर जेट F-16 के विंग का निर्माण का समझौता किया गया। पीएम मोदी का सपना भारत को आने वाले कुछ सालों में दुनिया के बड़े सैन्य उपकरण बनाने वाले देशों में शामिल करना है। पीएम मोदी के मेक इन इंडिया की पहल से देश इस दिशा में कदम मजबूती से बढ़ा रहा है।

रोबोटिक ड्रोन ‘आईरोवटुना’ का उत्पादन
केरल के कोच्चि स्थित फर्म ने रिमोट कंट्रोल की मदद से नियंत्रित किया जाने वाला एक ड्रोन विकसित किया, जिसे ‘आईरोवटुना’ नाम दिया गया। इसका व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए उत्पादन किया जा रहा है। कंपनी ने अपना पहला रोबोट डीआरडीओ के नेवल फिजिकल ओसियनोग्राफी लेबोरेटरी (एनपीओएल) को सौंपा। पानी के भीतर काम करने में सक्षम यह रोबोटिक ड्रोन पानी के भीतर जहाजों और अन्य संरचनाओं का समय पर वीडियो भेजने सक्षम है।

 

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