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लॉकडाउन के दौरान वायु प्रदूषण में कमी, दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर में 70 प्रतिशत से अधिक की गिरावट

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कोरोना संकट के दौरान देशभर में लागू लॉकडाउन की वजह से एक तरफ लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा है, वहीं प्रदूषण के मामले में राहत की खबर सामने आयी है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि लॉकडाउन के दौरान भारत की राजधानी दिल्ली में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के स्तर में गिरावट दर्ज की गई है।

दिल्ली में लॉकडाउन के दौरान नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर 70 प्रतिशत से अधिक गिर गया, जबकि चीन के शहरी क्षेत्रों में 40 प्रतिशत की कमी आई। बेल्जियम और जर्मनी में 20 प्रतिशत की कमी आने के साथ अमेरिका के विभिन्न शहरों में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड में 19 से 40 प्रतिशत की कमी आई है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई नए वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि खराब हवा का संबंध कोरोना से होने वाली उच्च मृत्युदर से है। इतना ही नहीं शहरों की आबादी और उनकी वैश्विक और स्थानीय निर्भरता उन्हें वायरस के प्रसार के लिए विशेष रूप से कमजोर बनाती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कई देशों द्वारा घोषित किए गए लॉकडाउन से प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेजी से गिरावट आई है।

रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि वायरस को फैलने से रोकने के लिए देशों द्वारा लागू किए गए लॉकडाउन के दौरान प्रदूषण एवं ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन भले ही काफी घट गया हो, लेकिन ये पर्यावरणीय लाभ अस्थायी हो सकते हैं। अगर अर्थव्यवस्थाओं को फिर से खोलते वक्त वायु प्रदूषण को रोकने और कार्बन कम करने के कार्य को बढ़ावा देने की नीति नहीं अपनाई जाती है।

महामारी ने शहरों में रहने वाले लोगों के बीच गहरी असमानताओं को भी उजागर किया है। पहले से ही संकट का सामना कर रहे लोगों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। दुनिया की 24 प्रतिशत शहरी आबादी झुग्गियों में रहती है और आधे से कम वैश्विक आबादी अपने घरों से 400 मीटर की दूरी पर खुले स्थानों पर शौच के लिए जाती है। संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंटोनियो गुतेरस ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, अपर्याप्त जल और गंदगी की चुनौतियों से जूझ रहे शहर महामारी का सबसे अधिक खामियाजा भुगत रहे हैं।

अपने संदेश में, संयुक्त राष्ट्र प्रमुख एंतोनियो गुतारेस ने कहा कि शहरी इलाके कोविड-19 वैश्विक महामारी के ग्राउंड जीरो थे जहां से 90 प्रतिशत मामले सामने आए। उन्होंने कहा, ‘‘शहर संकट का दंश झेल रहे हैं – जिनमें से कई की स्वास्थ्य व्यवस्थाएं बोझ तले दबी हैं, पानी एवं साफ-सफाई सेवा की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और अन्य चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। यह खासकर गरीब इलाकों के साथ है जहां वैश्विक महामारी ने जड़ में बसी असमानताओं को उजागर किया है।”

गुतारेस ने कहा, ‘‘हमें उसी तत्कालिकता के साथ काम करना होगा और शहरों को बदलने और जलवायु एवं प्रदूषण संकट से निपटने के लिए संकल्प लेना होगा। अब फिर से सोचने और शहरी जगत को नया आकार देने की जरूरत है।”

इससे पहले भी लॉकडाउन की वजह से देश में वायु और जल प्रदूषण कम होने की खबरें आई हैं। मार्च 2020 में सेंटर फॉर रिसर्च फॉर एनर्जी द्वारा जारी एक विश्लेषण के अनुसार राष्ट्रव्यापी जनता कर्फ्यू के दौरान जनवरी-मार्च की अवधि में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2) का औसत निम्नतम स्तर दर्ज किया गया, जो कि साल 2017 के बाद से पहली बार हुआ। दिल्ली का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक भी 77 के अंक पर यानि संतोषजनक श्रेणी में रहा। वायु प्रदूषण में कमी आने से लोग शुद्ध हवा में सांस ले रहे हैं। हवा साफ होने से शहारनपुर से वर्षों बाद बर्फीली पहाड़ियां नजर आने लगी हैं। 

उत्तराखंड स्थित नैनीताल की झील का हाल ही बदल गया है। लॉकडाउन के फैसले के बाद उस झील का पानी तीन गुना पारदर्शी बन गया है। लॉकडाउन से पहले झील की स्वच्छता बनाए रखने के लिए वहां सूर्यास्त के बाद किसी को रुकने नहीं दिया जाता था। आज नैनीताल स्थित नैनी झील न केवल काफी स्वच्छ हो गई है बल्कि उसका पानी इतना साफ हो गया है कि काफी गहराई तक वहां मछली की हलचल देखी जा सकती है।

कानपुर और वाराणसी के गंगाजल में 35 से 40 प्रतिशत तक सुधार देखने को मिला है। कारखानों के बंद होने के चलते गंगा में मिलने वाला दूषित जल नदारद है, जिससे पानी स्वच्छ दिख रहा है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर रहने वालों ने बताया कि लॉकडाउन लागू होने के बाद से गंगा काफी साफ हो गई हैं। यहां सैकड़ों लोग पवित्र डुबकी लगाते थे, यहां कोई भी कचरा डंप नहीं किया जा रहा है। नमामि गंगे मिशन के तहत गंगा में मिलने वाले प्रमुख नालों को भी साफ किया जा रहा है।

 

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