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180 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और जजों ने मोदी सरकार विरोधी ‘मसखरों की टोली’ को दिया करारा जवाब

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देश में वामपंथी और तथाकथित सेक्युलर गैंग से जुड़े पूर्व नौकरशाहों का एक ऐसा ग्रुप है, जो समय-समय पर मोदी सरकार के खिलाफ प्रोपेगैंडा में शामिल रहता है। यह ग्रुप कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप नाम से पत्र लिखकर मोदी सरकार पर हमला करता रहता है। हाल ही में इस ग्रुप के 75 सदस्यों ने किसान आंदोलन को लेकर खुला पत्र लिखा था और मोदी सरकार की आलोचना की थी। अब 180 सेवानिवृत्त नौकरशाहों और जजों के एक ग्रुप ने कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप को ‘मसखरों’ की टोली बताकर देश को भ्रमित करने का आरोप लगाया है।

‘फोरम ऑफ कंसर्न्ड सिटिजन (FCC)’ के बैनर तले 180 रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स और जजों ने दावा किया कि किसानों के आंदोलन को समाप्त कराने के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के बारे में कानूनी आश्वासन देने और कृषि कानूनों को 18 महीनों के लिए निलंबित करने का एक मध्य मार्ग सुझाया है। इसने आगे कहा कि बावजूद इसके पूर्व नौकरशाहों का ‘मसखरों’ का एक समूह अभी भी एक भ्रामक विमर्श गढ़ने की कोशिश कर रहा है।

सोमवार को बयान जारी करने वाले 180 लोगों में रॉ के पूर्व प्रमुख संजीव त्रिपाठी, पूर्व सीबीआई निदेशक नागेश्वर राव और एसएसबी के पूर्व महानिदेशक एवं त्रिपुरा के पूर्व पुलिस प्रमुख बी एल वोहरा शामिल है। एफसीसी के अनुसार, सरकार ने किसी भी स्तर पर यह घोषित नहीं किया है कि असली किसान देशविरोधी हैं। इसमें कहा गया है, ‘‘यहां तक कि गणतंत्र दिवस पर उन लोगों के साथ भी अत्यंत संयमित तरीके से व्यवहार किया गया जिन्होंने अपराधीकरण में लिप्त होने के लिए किसानों के आंदोलन को एक अवसर के रूप में इस्तेमाल किया।’’

एफसीसी के सदस्यों ने कहा कि जब सरकार ने एक मध्य मार्ग सुझाया है जिसमें उसने कानूनों के क्रियान्वयन को 18 महीने के लिए निलंबित करने… न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रखने के बारे में कानूनी आश्वासन और पर्यावरण संरक्षण के मामलों में किसानों के खिलाफ दंडात्मक प्रावधान वाले कुछ कानूनों को वापस लेना शामिल है, तो कानूनों को निरस्त करने की मांग पर अड़े रहने का कोई तर्क नहीं है।

पूर्व नौकरशाहों के खुले पत्र पर नाराजगी जाहिर करते हुए एफसीसी ने कहा कि पत्र राजनीतिक रूप से प्रेरित है। हम सेवानिवृत्त नौकरशाहों के मसखरों के एक समूह की पूरी तरह गलत बयानी से परेशान हैं, जिसका उद्देश्य एक भ्रामक विमर्श बनाना है। पूर्व नौकरशाहों को नसीहत देते हुए एफसीसी ने कहा कि सरकार के खिलाफ उकसाने के बजाय यह समझना चाहिए कि कुछ अंतर्निहित संरचनात्मक कमी है जो भारतीय किसानों को गरीब रख रही है। इस कमी को दूर करने के लिए सरकार प्रयास कर रही है।

फोरम ऑफ कंसर्न्ड सिटिजन (एफसीसी) ने किसान नेताओं से अपील की है कि राष्ट्र-विरोधी ताकतों और अवसरवादी नेताओं के चंगुल में फंसने की बजाय सभी को बातचीत के जरिए मुद्दे के सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए काम करना चाहिए। इस बयान पर राजस्थान हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अनिल देव सिंह, केरल के पूर्व मुख्य सचिव आनंद बोस, जम्मू-कश्मीर के पूर्व डीजीपी एस पी वैद, एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) दुष्यंत सिंह, एयर वाइस मार्शल (सेवानिवृत्त) आर पी मिश्रा ने भी हस्ताक्षर किए हैं।

गौरतलब है कि 75 पूर्व नौकरशाहों ने 11 दिसंबर को एक खुला पत्र लिखकर केंद्र सरकार पर टकराव वाला रुख अपनाने का आरोप लगाया था। साथ ही कहा था कि सरकार गैर-राजनीतिक किसानों को ऐसे गैर-जिम्मेदार प्रतिद्वंद्वी के रूप में देख रही है जिनका उपहास किया जाना चाहिए, जिनकी छवि खराब की जानी चाहिए और जिन्हें हराया जाना चाहिए। पत्र पर दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, जुलियो रिबेरियो और अरुणा रॉय जैसे रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स के हस्ताक्षर थे।

 

 

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