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विधानसभा भंग क्यों नहीं कर देते नीतीश कुमार?

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11 जुलाई, 2017 को जेडीयू ने बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव को चार दिनों के भीतर इस्तीफा देने का अल्टीमेटम दिया। यह भी कहा कि तेजस्वी के सामने दूसरा कोई रास्ता नहीं है, क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति पर चलते हैं। जेडीयू और नीतीश के तल्ख तेवर से लगा कि तेजस्वी को इस्तीफा देना ही पड़ेगा। लेकिन 13 जुलाई को ही आरजेडी के मुखिया लालू प्रसाद ने दो टूक कह दिया है कि तेजस्वी यादव इस्तीफा नहीं देंगे। बहरहाल 16 जुलाई को ही जेडीयू का अल्टीमेटम खत्म हो गया है और तेजस्वी यादव अब भी बिहार सरकार के डिप्टी सीएम पद को सुशोभित कर रहे हैं। जाहिर है नीतीश कुमार के अल्टीमेटम का कोई असर नहीं हुआ है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि नीतीश सरकार के पास अब क्या-क्या विकल्प हैं?

चक्रव्यूह में फंस गए हैं नीतीश कुमार!
दरअसल नीतीश कुमार उस चक्रव्यू में फंस गए हैं जिसकी रचना उन्होंने खुद की थी। नीतीश के सामने चार विकल्प हैं-
1. तेजस्वी इस्तीफा दें।
2. महागठबंधन तोड़ दें।
3. सबकुछ भूलकर लालू के साथ रहें।
4. विधानसभा भंग कर दें।
बहरहाल तेजस्वी इस्तीफा दे देंगे ऐसा लग नहीं रहा, खबर है कि अगर तेजस्वी ने इस्तीफा दिया तो उनके साथ RJD के सभी मंत्री इस्तीफा देंगे। ऐसे में सरकार बचेगी या नहीं कहना कठिन है। अगर नीतीश महागठबंधन तोड़ते हैं तो उन्हें एनडीए से सपोर्ट लेना पड़ेगा, ये भी उनके लिए फजीहत भरा होगा क्योंकि एनडीए तो उन्होंने ने ही छोड़ा था। सबकुछ भूलकर लालू के साथ बना रहना अब तो मुमकिन नहीं लग रहा। ऐसे में विधानसभा भंग करने के सिवा कोई और रास्ता नहीं दिख रहा है।

फिर एक बार पिछड़ा बिहार, जिम्मेदारी लें नीतीश कुमार
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार का भविष्य अब तेजस्वी यादव के इस्तीफे से जुड़ा है। गठबंधन धर्म का पालन करते हुए तेजस्वी अगर इस्तीफा देते हैं तो भी नीतीश के लिए सरकार चलाना आसान नहीं होगा। ऐसे में उनके सामने विधानसभा भंग करने का ही विकल्प शेष है। 

भ्रष्टाचारियों की गोद में क्यों बैठे हैं नीतीश?
लालू एंड फैमिली पूरी तरह से भ्रष्टाचार की गंगा में तैर रही है। बेटा-बेटी-दामाद-पत्नी के नाम से अकूत बेनामी संपत्ति जमा करने वाले लालू खुद सजायाफ्ता हैं। ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स विभाग की जांच के दायरे में पूरी की पूरी लालू एंड फैमिली है। ऐसे में तेजस्वी के इस्तीफा देने के बाद भी क्या नीतीश का महागठबंधन में बने रहना उचित है। नीतीश चाहें तो सरकार चलाते रह सकते हैं, लेकिन उनकी छवि को गहरा धक्का लगेगा।
ऐसे में नीतीश कुमार के सामने विधानसभा भंग करने का बेहतर विकल्प है।

गैंगस्टर, माफिया और भ्रष्टाचारियों के आगे नतमस्तक हैं नीतीश !
सीवान जेल में बंद शहाबुद्दीन और लालू प्रसाद के बीच बातचीत का टेप लीक हुआ तो शहाबुद्दीन को दिल्ली के तिहाड़ जेल भेजा गया। लेकिन नीतीश के मुख्यमंत्रित्व काल में ऐसा हो जाना ही बड़े सवाल खड़े करता है। इसके अतिरिक्त नीतीश कुमार के सीएम रहते हुए भी पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग में लालू प्रसाद की दखल जगजाहिर है, वहीं भ्रष्टाचार की जद में पूरा लालू कुनबा फंसा हुआ है। जाहिर है नीतीश सरकार के लिए असहज स्थिति रही है, लेकिन कुर्सी के मोह की वजह से शायद वे सब भूल चुके हैं, वरना तो वे विधानसभा भंग की सिफारिश कर देते।

बिहार को गर्त में धकेलने की जिम्मेदारी लें नीतीश
2005 और 2010 के चुनाव में बीजेपी के साथ रहे नीतीश कुमार ने 2013 में अचानक ही एनडीए से अलग होने का फैसला कर लिया। लेकिन इस फैसले का नकारात्मक असर बिहार के विकास पर पड़ा। कृषि और ढांचागत निर्माण में देश में अव्वल चल रहा बिहार अचानक विकास के हर मानदंड में पिछड़ता चला गया। लालू प्रसाद के कुनबे का नीतीश के सुशासन पर प्रभाव पड़ने लगा और बिहार कुशासन की तरफ चल पड़ा। जाहिर है नीतीश का एनडीए छोड़ने का फैसला गलत साबित हुआ। बिहार की सत्ता के शीर्ष पर तो वे काबिज रहे लेकिन बिहार गर्त में जाता चला गया। आखिर इसकी जिम्मेदारी भी तो नीतीश को लेनी ही पड़ेगी।

बिहार की छवि खराब करने की जिम्मेदारी किसकी ?
1991 से 2004 के अंत तक बिहार में लालू प्रसाद एंड फैमिली की सरकार थी और बाहर के राज्यों में बिहार की छवि खराब हो चुकी थी। 2005 में जब नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली तो बिहार कुशासन से सुशासन की ओर चल पड़ा। इस दौरान बिहार ने विकास की नई ऊंचाईयों को छुआ और बिहार लगातार बढ़ता रहा। नीतीश भी सुशासन बाबू कहलाने लगे और बिहार में पलायन रुकने लगा। बाहर से निवेश भी आने लगा और सरकार में लोगों का विश्वास और भरोसा भी बढ़ गया। लेकिन 2013 में नीतीश कुमार के एक फैसले ने बिहार को पीछे ले जाने का काम किया। बिहार फिर पिछड़ता चला गया और विकास की रफ्तार पर ब्रेक लग गया। लालू एंड फैमिली के शासन से जुड़ने के साथ ही बिहार में कुशासन का प्रभाव भी पड़ने लगा और बिहार की छवि खराब होती चली गई। 

बहरहाल ऐसे हालात में जब नीतीश कुमार का भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलेरेंस है, महागठबंधन में वे सहज नहीं हैं और एनडीए के साथ भी जाना आसान नहीं है, तो नीतीश के सामने विधानसभा भंग कर नया जनादेश प्राप्त करने का ही विकल्प है। ऐसे में  नीतीश जितनी जल्दी फैसला लेंगे बिहार की जनता के लिए उतना ही अच्छा रहेगा। 

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