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सोचिए अगर कोरोना काल में पीएम मोदी बंगाल में रैली नहीं करें, तो क्या होगा ?

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बंगाल में अभी चार चरणों का मतदान होना बाकी है। इसी बीच देश में कोरोना संक्रमण की रफ्तार काफी तेज हो चुकी है। लोग सवाल उठ रहे हैं कि बढ़ते संक्रमण को देखते हुए चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल में हो रहे चुनाव-प्रचार पर रोक क्यों नहीं लगा रहा है? साथ ही कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भी इस महामारी के समय रैली करने से बचना चाहिए। हालांकि अब तक न तो किसी नेता ने रैली पर रोक लगाने की मांग की है और न ही किसी पार्टी ने आयोग से इस बारे में कोई शिकायत की है। क्योंकि सभी पार्टियां चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंक रही हैं। ऐसी स्थिति में आइए जानते हैं अगर प्रधानमंत्री मोदी खुद को चुनाव प्रचार से अलग कर लें तो बीजेपी की चुनावी संभावनाओं, बंगाल के विकास और सियासत पर इसका क्या असर हो सकता है ?

ममता और अन्य नेता रैलियां करते रहेंगे

बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस की धुआंधार रैलियों से साफ होता जा रहा है कि पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव मोदी बनाम दीदी की लड़ाई में तब्दील हो चुका है। ममता बनर्जी के मुकाबले बीजेपी के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं है। बीजेपी सामूहिक नेतृत्व के आधार पर प्रधानमंत्री मोदी की साख और केंद्रीय योजनाओं को जमीन तक पहुंचाने के वादे के साथ तृणमूल को घेर रही है। ऐसे में अगर प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार से अलग हो जाए, तो कोरोना के बावजूद ममता बनर्जी चुनाव प्रचार करती रहेंगी, जिसका फायदा टीएमसी को मिल सकता है।

प्रधानमंत्री मोदी के आठ अप्रैल को कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बैठक से पहले ममता बनर्जी ने कोरोना के बढ़ते संक्रमण पर गहरी चिंता जताई, लेकिन साथ ही चेताया कि अब कोरोना की आड़ में मतदान स्थगित करने के किसी भी प्रयास को स्वीकार नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा, “पूरे देश में दोबारा संक्रमण बढ़ रहा है। क्या ऐसी परिस्थिति में तीन या चार चरणों में ही मतदान कराना उचित नहीं होता? लेकिन अब जब आठ चरणों में चुनाव हो ही रहा है तो इसे किसी भी हालत में रोका नहीं जा सकता। खेल जब शुरू हो ही गया है तो इसे ख़त्म भी करना होगा।” 

बीजेपी के हाथ से फिसल सकती है जीत

प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों में जनसैलाब ने साबित कर दिया है, जनता में वो काफी लोकप्रिय है। उन्हें सुनने के लिए भीड़ उमड़ रही है, इससे बीजेपी का मनोबल बढ़ा हुआ है। आने वाले दिनों में प्रधानमंत्री मोदी की और भी रैलियां राज्य में होनी है। जानकार मानते हैं कि आज की तारीख में प्रधानमंत्री मोदी का नाम ऐसा है जो बीजेपी को हर चुनाव में बहुत सरप्लस जरूर करता है। लिहाजा बंगाल में भी आशोल पोरिबोर्तन और सोनार बांग्ला जैसे नारों के शिल्पकार के रूप में सबसे बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री मोदी का ही है। बीजेपी को एकजुट रखने की ताकत हाल में पार्टी में आये किसी नेता के पास नहीं है। ऐसे में चुनाव प्रचार से प्रधानमंत्री मोदी के अलग होने से बीजेपी का चुनाव प्रचार प्रभावित हो सकता है। बीजेपी के पक्ष में जो माहौल बना है, वो बिगड़ सकता है। लिहाजा बीजेपी चुनावी मैदान में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती।

राज्य में बदलाव और विकास की संभावनाएं खत्म हो जाएंगी 

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने हर संबोधन में ममता सरकार के भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने तोलाबाजी, कटमनी, सिंडिकेट और कोयला घोटाले का जिक्र कर लोगों के सामने ममता सरकार के भ्रष्टाचार को मजबूती के साथ रखा है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का नाम 1352 करोड़ रुपये के कोयला घटाले में आने और सीबीआई जांच होने से ममता बनर्जी के खिलाफ माहौल बना है। बीजेपी की तरफ से प्रधानमंत्री मोदी ही ऐसे नेता है, जो अपने संबोधन से लोगों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की अनुपस्थिति से ममता बनर्जी को चुनाव प्रचार में बढ़ मिल सकती है और बीजेपी की जीत की संभवानाओं पर असर पड़ सकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने सोनार बांग्ला का जो संकल्प लिया है, वो टीएमसी की जीत से पूरी नहीं हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी ने राज्य की जनता को जो आशोल पोरिबोर्तन का सपना दिखाया है, वो टूट सकता है।

बीजेपी की मजबूत स्थिति हो सकती है कमजोर

बंगाल में चौथे चरण की वोटिंग के दौरान तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर का एक ऑडियो चैट वायरल हुआ, जिसके बाद राजनीति गरमा गई। इस चैट में प्रशांत किशोर कुछ चुनिंदा पत्रकारों से बात कर रहे हैं, जिसमें वह प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ करते हुए बंगाल चुनाव में बीजेपी की मजबूती की बात करते हुए सुनाई दे रहे हैं। प्रशांत किशोर ने भी माना है कि राज्य में प्रधानमंत्री मोदी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ‘‘जितने ही लोकप्रिय हैं।’’ 

क्ल्बहाउस पर सार्वजनिक चैट के दौरान प्रशांत किशोर ने माना कि तृणमूल के आंतरिक सर्वेक्षण के हिसाब से भी बीजेपी जीत रही है। वोट मोदी के लिए है, ध्रुवीकरण सच्चाई है, अनुसूचित जाति (बंगाल की आबादी का 27 फीसदी हिस्सा), मतुआ सभी बीजेपी के लिए वोट डाल रहे हैं। बीजेपी का कैडर जमीनी स्तर पर मौजूद है। ऐसी में प्रधानमंत्री मोदी की गैर-मौजूदगी में बीजेपी का चुनाव प्रचार प्रभावित होगा और उसकी मजबूत होती स्थिति कमजोर हो सकती है। आखिरकार इसका फायदा टीएमसी को मिल सकता है।

मोदी बनाम विपक्ष का मुकाबला हमेशा से जीत का फॉर्मूला

बीजेपी अपने ट्रंप कार्ड ‘मोदी फैक्टर’ का इस्तेमाल करके बंगाल की एक-एक सीट पर जीत के समीकरण साधने में लगी है। बीजेपी के लिए भी मोदी बनाम विपक्ष का मुकाबला हमेशा से जीत का फॉर्मूला रहा है। केंद्र में टेस्टेड इस फॉर्मूला को बीजेपी ने राज्य में जहां-जहां अपनाया उसे सफलता मिली। मोदी बनाम ममता का मुकाबला होने से ये बात साबित हो गई है कि बंगाल में ममता का टक्कर केवल बीजेपी दे सकती है। ये राज्य में सत्ता परिवर्तन की आस लगाए वोटरों को सीधा संदेश है कि उनके लिए बीजेपी ही विकल्प है, लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन नहीं। पिछले चुनाव में महज तीन सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए ये बड़ी उपलब्धि है।

बीजेपी के पास प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प नहीं

ममता बनर्जी टीएमसी का चेहरा है और मुख्यमंत्री भी। टीएमसी का अपना मजबूत संगठन है। ऐसे में वोटर जानते हैं कि अगर उनकी पार्टी जीती तो मुख्यमंत्री कौन होगा। दूसरी ओर बीजेपी में कोई मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं है। ममता के कद का नेता भी नहीं है। इस लिए बीजेपी प्रधानमंत्री मोदी को सामने रख रही है। बीजेपी के पास प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर जितने वोट मिल सकते हैं, उतने किसी दूसरे नेता के नाम पर नहीं। राज्य में बहुत सारे लोग भी है, जो न तो ममता बनर्जी को पसंद करते और न ही मोदी सरकार को। ये दोनों तरह के लोग कांग्रेस और वाम मोर्चा के गठबंधन के पक्ष में जा सकते हैं, लेकिन जब ममता बनाम मोदी के बीच चुनाव होता दिखेगा, तो ये उनके मन को काफी प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे लोगों को बीजेपी अपने पक्ष में मोड़ सकती है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव प्रचार से अलग होने पर बीजेपी यह मौका चूक सकती है।

पीएम मोदी की लोकप्रियता को भुनाने से पीछे रह जाएगी बीजेपी

2019 से पहले तक बीजेपी पश्चिम बंगाल की राजनीति में बहुत बड़ा फैक्टर नहीं थी लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बाजी पलट दी। आंकड़ों को देखें तो 2019 में बीजेपी को 40.64 प्रतिशत वोट के साथ 18 सीटें मिली थीं। जबकि टीएमसी को 43.69 प्रतिशत वोटों के साथ 22 सीटें मिलीं यानि बीजेपी को टीएमसी से सिर्फ 3 प्रतिशत वोट कम मिले। 2014 के मुकाबले 2019 में बीजेपी को बड़ा फायदा हुआ था। 2014 में बीजेपी को 17.02 प्रतिशत वोट मिला था जो 2019 में 40.64 प्रतिशत हो गया जो पिछले चुनाव के मुकाबले 138.77 प्रतिशत ज्यादा था। बीजेपी का इस तरह बढ़ना टीएमसी के लिए परेशानी का सबब है। बीजेपी लगातार इसका श्रेय प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को देती है इसलिए 2021 के चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता को भुनाने और 3 प्रतिशत के अंतर को पाटने का कोई मौका बीजेपी छोड़ना नहीं चाहती।

फिर टीएमसी की सरकार आने से बिगड़ सकते हैं हालात

कोरोना के बिगड़े हालात को लेकर जब 8 अप्रैल, 2021 को प्रधानमंत्री मोदी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शामिल नहीं हुई। चुनाव प्रचार में व्यस्तता का हवाला देकर बैठक से दूरी बना ली। इससे पता चलता है कि ममता बनर्जी कोरोना संक्रमण से लोगों के बचाव के प्रति कितना संजीदा है और राज्य की जनता की परवाह करती है। बीजेपी ममता बनर्जी सरकार पर कोरोना को लेकर आंकड़े छिपाने और राजनीति करने का आरोप लगा चुकी है। हैरानी की बात है कि जब सभी राज्यों से कोरोना मरीजों के आंकड़े प्रतिदिन सार्वजनिक किए जा रहे हैं। ऐसे में,बंगाल की संख्या को आखिर किस लिए छुपाया जा रहे हैं। अगर फिर से राज्य में टीएमसी की सरकार बनती है, तो केंद्र और राज्य में अलग-अलग सरकार होने से टकराव बढ़ सकता है और राज्य में हालात और बिगड़ सकते हैं।

कोरोना टीकाकरण अभियान हो सकता है प्रभावित

कोरोना वायरस के संक्रमण से लोगों को बचाने के लिए मोदी सरकार ने 16 जनवरी,2021 को महाटीकाकरण अभियान की शुरुआत की। इसके तहत पूरे देश में तेजी से लोगों को टीके लगाए जा रहे हैं। वहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी टीकाकरण को लेकर भी सियासत करने से बाज नहीं आई। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार पर राज्य को कम कोरोना वैक्सीन देने का आरोप लगा दिया। ममता के इस आरोप पर पलटवार करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने 17 मार्च, 2021 को आंकड़ों के साथ जवाब दिया। स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक 17 मार्च तक पश्चिम बंगाल को कोविशील्ड और कोवैक्सीन की कुल 52.90 डोज की आपूर्ति की गई थी, लेकिन इनमें से 30.89 लाख वैक्सीन का ही उपयोग किया गया, जबकि 22.01 लाख वैक्सीन बची रह गई थी। इस तरह ममता सरकार की लापरवाही और उदासीनता का खामियाजा राज्य की जनता को भुगतना पड़ रहा है। अगर फिर से बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार बन गयी, तो कोरोना टीकाकरण अभियान भी प्रभावित हो सकता है और राज्य में कोरोना संक्रमण को बढ़ावा मिल सकता है।

कोरोना मरीजों को भी कटमनी देना होगा

ममता बनर्जी ने बंगाल के गरीबों, मध्यम वर्ग, नौजवानों, महिलाओं, बुजुर्गों,  उद्यमियों और कारोबारियों को टीएमसी कार्यकर्ताओं के रहम पर छोड़ दिया है। जन्मदिन मनाना है, तो टीएमसी से पूछना पड़ता है। घर बनाना है, तो टीएमसी को कटमनी देना पड़ता है। राशन लेना है, तो टीएमसी को कटमनी देना पड़ता है। कहीं अपना सामान ले जाना है, अपना सामान लाना है, तो टीएमसी को कटमनी देना पड़ता। किसी को अपना सामान बेचना है, तो टीएमसी को कटमनी देना पड़ता है। ऐसे में कोरोना मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने के लिए भी कटमनी देना पड़ेगा, जिससे कोरोना मरीजों पर दोहरी मार पड़ेगी।  

 

 

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