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बंगाल में ममता का किला ढहाएगा ‘एक्स’ फैक्टर, कोलकाता रेप-मर्डर विक्टिम की मां बीजेपी की कैंडिडेट, महिला अपराध बना चुनावी मुद्दा

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पश्चिम बंगाल का विधानसभा चुनाव इस बार भाजपा के अनुकूल परिस्थितियां बन रही है। सत्तारूढ़ तृणमूल सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर चरम पर है। सरकार में भ्रष्टाचार और महिलाओं के खिलाफ अपराधों में वृद्धि जैसे कई मुद्दे हैं, जिनका टीएमसी के पास कोई जवाब नहीं है। इसके अलावा ममता बनर्जी को चारों मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ रही है। एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी ओर लेफ्ट। एक तरफ उसके खिलाफ मुस्लिम वोट बैंक का गठबंधन है और सबसे बड़े मोर्चे पर खुद बीजेपी। ऐसे हालात में पिछली बार की कामयाबी से आगे निकलकर भगवा दल इस बार पश्चिम बंगाल की सरजमीं पर अपना परचम लहराना चाहता है। बीजेपी के थिंक टैंक ने टीएमसी के वोट बैंक को तोड़ने के साथ ही ‘एक्स फैक्टर’ पर भी फोकस किया है। बंगाल में ये एक्स फैक्टर कोई और नहीं, लेफ्ट वोट बैंक है। ये लेफ्ट वोटर अपनी वैचारिक पार्टी के कमजोर होने के बाद से कन्फ्यूज हैं। कभी बंगाल की सत्ता में राज करने वाले ये लेफ्ट के कार्यकर्ता निष्क्रिय से पड़े हैं। बीजेपी की सोच इस वोट बैंक अपने पक्ष में सक्रिय करने की है। जमीन पर यह वामपंथी वोट बैंक भाजपा की तरफ मुड़ा तो, उसे बड़ा फायदा हो सकता है। दूसरी ओर ममता के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए कबीर-औवेसी का गठबंधन अपना काम कर ही रहा है।राज्य की तरक्की के लिए मूड बदल सकते हैं लेफ्ट वोटर्स
बीजेपी थिंक टैंक ने ममता को उसके गढ़ में घेरने के लिए भवानीपुर विधानसभा में ‘इस बार जय भवानी’ का नारा देकर सुवेंदु अधिकारी को चुनाव मैदान में उतार दिया है। इसके साथ ही बीजेपी ने लेफ्ट के एक-एक छोटे कार्यकर्ता से संपर्क बनाना शुरू कर दिया है। घर-घर लेफ्ट विचारधारा वाले परिवारों से मिलने का सिलसिला चल रहा है। पार्टी के रणनीतिकार मानकर चल रहे हैं कि अगर लेफ्ट के कार्यकर्ता और वोटर बिना शोर किए गए भाजपा को समर्थन देते हैं तो, यह एक्स फैक्टर साबित हो सकता है। लेफ्ट का यह वोट बैंक भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने का दम रखता है। दरअसल कभी लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल की सत्ता पर बरसों तक राज किया है। अब लेफ्ट के ऐसे कार्यकर्ता, जो पार्टी से असंतुष्ट या निराश हैं, वे राज्य की तरक्की के लिए मूड बदल सकते हैं। उन्हें पता है कि लेफ्ट जीतने की स्थिति में नहीं है, इसलिए वो अपना वोट जाया न करके भाजपा के पाले में आ सकते हैं।व्यक्ति केंद्रित संपर्क अभियान लेफ्ट वोट बैंक को साधने की रणनीति
बीजेपी की घर-घर संपर्क का अभियान कुछ असर दिखाने लगा है। ऐसे लेफ्ट के नेता, जो सक्रिय राजनीति से दूर चले गए हैं और अब बदले माहौल में कुछ अच्छा फील कर रहे हैं। इनकी पहचान कर भाजपा के कार्यकर्ताओं और बड़े नेताओं को इनसे मिलने के लिए भेजा जा रहा है। लेफ्ट के कार्यकर्ताओं को मोटिवेट कर भाजपा से जोड़कर पार्टी को वोट देने के लिए कहा जा रहा है। जनता के बीच चुनाव प्रचार तो चल ही रहा है, यह व्यक्ति केंद्रित संपर्क लेफ्ट वोट बैंक को साधने के लिए है। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने लेफ्ट विचारधारा को मानने वाले लोगों से अपील की है कि वे भले ही अपनी विचारधारा को मानते रहें, लेकिन राज्य के हित में भाजपा को वोट दीजिए। भाजपा के नेता नारा दे रहे हैं- दिल में रखिए विचारधारा, वोट लेकिन भाजपा को ही। भाजपा की कोशिश विपक्षी वोटों को जहां तक संभव हो, एकजुट करने की है।बंगाल में लेफ्ट का वोट घटता गया, बीजेपी का बढ़ता गया
असल में जैसे-जैसे बंगाल में टीएमसी का कद बढ़ने लगा, लेफ्ट का पतन शुरू हो गया। बाद के चुनाव में ‘लाल’ वोटर ‘भगवा’ को मौन समर्थन देने लगे। हालांकि, संख्या कम थी लेकिन फायदा तो हुआ ही। 2014 लोकसभा चुनाव में लेफ्ट का वोट शेयर 30 प्रतिशत के करीब था, जो 2019 में आकर 8 प्रतिशत के करीब रह गया है। भाजपा का वोट शेयर बढ़कर 2019 लोकसभा चुनाव के समय 17 से 40 प्रतिशत पहुंच गया। पिछले विधानसभा चुनाव में हाल यह रहा कि लेफ्ट पार्टी खाता नहीं खोल सकी। वहीं, भाजपा ने टीएमसी को चुनौती देते हुए 77 सीटें निकाल लीं। इससे साफ है विपक्षी वोटर टीएमसी के सामने भाजपा को एक विकल्प के तौर पर देखकर इस पार पूरा गेम बदल सकते हैं।आरजी कर मेडिकल कालेज के रेप-मर्डर कांड ने पूरे देश को झकझोरा
दूसरी ओर पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर सियासी तकरार छिड़ी है, पक्ष विपक्ष एक दूसरे के ऊपर तंज कस रहे हैं। इसी बीच भाजपा ने अपनी नई लिस्ट में आरजी कर मेडिकल कालेज की पीड़िता की मां को टिकट दिया है। तीसरी लिस्ट में भाजपा ने 19 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा है। इसमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नाम रत्ना देबनाथ का था। आरजी कर अस्पताल की उस ट्रेनी डॉक्टर की मां हैं, जिनके साथ दुष्कर्म और फिर हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस घटना से पूरे देश की सड़कों पर लोग प्रदर्शन कर रहे थे. इतना ही नहीं, ममता के इस्तीफे की भी मांग हो रही थी। पार्टी ने उत्तर 24 परगना जिले की अहम मानी जाने वाली पानीहाटी सीट से आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस की पीड़िता की मां को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने भावनात्मक और राजनीतिक दांव चला है।आरजी कर पीड़िता की मां को टिकट, महिलाओं की सुरक्षा के लिए लड़ेंगी
बीते दिन आरजी कर पीड़िता की मां ने टिकट मांगा था। उस दौरान उन्होंने ये भी कहा था कि भाजपा से तो मुझे बहुत पहले टिकट के लिए ऑफर मिला था। लेकिन तब मैं दिमागी तौर पर तैयार नहीं थी। अब मैंने अपनी बेटी को इंसाफ दिलाने और इस राज्य की सभी महिलाओं की सुरक्षा के लिए चुनाव लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि CPI(M) मेरी बेटी की मौत का इस्तेमाल राजनीतिक फायदा उठाने के लिए चुपचाप TMC की मदद करके कर रही है। मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार रत्ना देबनाथ ने चुनाव लड़ने के फैसले पर कहा कि यह उनके लिए न्याय की लड़ाई का मंच है। उन्होंने ये भी कहा कि बेटी के इंसाफ के लिए उन्होंने हर जगह दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्हें कहीं भी संतोषजनक परिणाम नहीं मिला। हालांकि अब राजनीति के जरिए वो महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा उठाना चाहती हैं। तीसरी लिस्ट में उनके अलावा पार्टी ने कूचबिहार दक्षिण से रथीन्द्र नाथ बोस, सिंगूर से डॉ. अरूप कुमार दास, मेदिनीपुर से डॉ. शंकर गुच्छैत और कटवा से कृष्णा घोष सहित कई लोगों को भी टिकट दिया है।दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए ममता बनर्जी चौतरफा घिरने लगी हैं। लेफ्ट वोटर्स की नाराजगी के अलावा एआईएमआईएम चीफ प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली टीएमसी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ओवैसी ने पश्चिम बंगाल के चर्चित मुस्लिम नेता हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी (जेयूपी) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे।  एआईएमआईएम और जेयूपी के साथ गठबंधन इसी जटिलता में एक नये आयाम जोड़ना वाला है। यह नया गठबंधन केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि मुस्लिम वोट बैंक की पुनर्संरचना कर परिणामों को प्रभावित करेगा। खासकर उस राज्य में, जहां करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी चुनावी परिणामों पर निर्णायक प्रभाव डालती है, वहां इस नए गठबंधन के दूरगामी राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। राजनीतिक प्रेक्षकों के मुताबिक राज्य की सौ से अधिक सीटों पर इस गठबंधन का टीएमसी को नुकसान और भाजपा को फायदा मिलेगा। क्योंकि मुस्लिम वोट बैंक के बिखरने का खामियाजा ममता बनर्जी के उम्मीदवारों को भुगतना पड़ेगा।मुस्लिम वोट बैंक: पश्चिम बंगाल में कई सीटों पर निर्णायक
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है, जो राज्य की करीब 100 से अधिक विधानसभा सीटों पर सीधे तौर पर प्रभाव डालती है। मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण 24 परगना और कुछ हद तक नदिया जैसे जिलों में यह प्रभाव और भी स्पष्ट दिखाई देता है। अब तक यह वोट बैंक काफी हद तक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के साथ रहा है, जिसने खुद को अल्पसंख्यकों के भरोसेमंद राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित किया। लेकिन मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद का निर्माण करा रहे हुमायूं कबीर को इसी बात पर पार्टी से निकालकर ममता ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारी है और अपने वोट बैंक को नाराज कर लिया है। हुमायूं कबीर अयोध्या की बाबरी मस्जिद की तर्ज पर पश्चिम बंगाल में मस्जिद बनवा रहे हैं, जिसका नाम भी उन्होंने बाबरी मस्जिद ही रखा है। हुमायूं कबीर और ओवैसी का गठबंधन ममता बनर्जी के इसी स्थिर समीकरण को चुनौती देता नजर आ रहा है।ओवैसी की एंट्री: रणनीतिक सेंधमारी खिलाएगी नया गुल
ओवैसी की राजनीति अक्सर उन राज्यों में प्रभाव डालती रही है, जहां मुस्लिम वोटों का एक बड़ा हिस्सा किसी एक दल के साथ जुड़ा होता है। बंगाल में उनकी एंट्री भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। एआईएमआईएम की मुस्लिम वोटों में पकड़ मानी जाती है। ऐसे में हुमायूं कबीर से जुड़कर उन्होंने मुस्लिमों की धार्मिक भावना को भी हवा दी है। ओवैसी-कबीर की जोड़ी के चलते मुस्लिम वोटों के बिखराव से कई सीटों पर परिणाम बदल सकता है। अगर मुस्लिम वोटों का छोटा हिस्सा भी टीएमसी से हटकर इस नए गठबंधन की ओर जाता है, तो यह सीधे तौर पर तृणमूल के नुकसान और विपक्ष, खासकर भाजपा, के लिए लाभ का कारण बन सकता है।

हुमायूं कबीर फैक्टर: स्थानीय प्रभाव और असंतोष की राजनीति
हुमायूं कबीर का राजनीतिक महत्व उनके स्थानीय प्रभाव और टीएमसी से अलगाव के कारण बढ़ जाता है। टीएमसी से निष्कासन के बाद उन्होंने जनता उन्नयन पार्टी बनाकर खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में प्रस्तुत किया है। उनका यह दावा कि ममता की टीएमसी में मुस्लिम समुदाय को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा, एक ऐसी बहस को जन्म देता है जो तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक में असंतोष पैदा कर सकती है। उनके द्वारा बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारना इस बात का संकेत है कि वे केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविक चुनावी चुनौती पेश करना चाहते हैं।मुस्लिमों की धार्मिक भावनाएं और बाबरी मस्जिद का मुद्दा
मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद निर्माण जैसे मुद्दों को उठाकर हुमायूं कबीर ने मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को सीधे छूने की कोशिश की है। यह मुद्दा भावनात्मक रूप से कुछ वर्गों को प्रभावित कर सकता है। यह तो तय है कि इसका सियासी चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। लेकिन यह कितना व्यापक असर डालेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है। बंगाल की राजनीति परंपरागत रूप से धार्मिक मुद्दों पर भी आधारित रही है। एक ओर जहां हिंदू समुदाय की मां दुर्गा में आस्था है, वहीं दूसरे धर्म के लोग मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। यहां सामाजिक समीकरण भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए ऐसे मुद्दे चुनावी विमर्श को प्रभावित जरूर करते हैं।ममता के मुस्लिम वोट बैंक के बंटने का भाजपा को मिलेगा लाभ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार मुस्लिम धर्म के आधार पर नया गठबंधन आने से यदि मुस्लिम वोटों में विभाजन होता है, तो इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। 2021 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने कई सीटों पर कड़ी टक्कर दी थी, लेकिन एकजुट मुस्लिम वोटिंग ने टीएमसी को बढ़त दिलाई। अब अगर यही वोट बैंक विभाजित होता है, तो इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा को उन सीटों पर बढ़त मिल सकती है जहां वह पहले मामूली अंतर से पीछे रह गई थी। इसके अलावा एंटी एन्कंबेंसी फैक्टर भी ममता बनर्जी की टीएमसी को मुश्किलों में डाल सकता है।बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता बंगाल का विधानसभा चुनाव
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह नया गठबंधन चुनावी नतीजों को निर्णायक रूप से बदल पाएगा। इसका जवाब कई कारकों पर निर्भर करता है। गठबंधन की संगठनात्मक ताकत, उम्मीदवारों की स्थानीय पकड़, और मतदाताओं का वास्तविक रुझान। अभी तक के संकेत बताते हैं कि यह गठबंधन सीधे सत्ता परिवर्तन का कारण भले न बने, लेकिन कई सीटों पर “स्पॉइलर” की भूमिका निभा सकता है। दरअसल, बड़े तौर पर विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट भी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं। अब ओवैसी-कबीर के गठबंधन के भी आ जाने से मुकाबला बहुकोणीय हो गया है। ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन इस बदलाव का प्रतीक है, जो चुनावी समीकरणों को जटिल बना सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय मतदाता ही करेंगे, लेकिन इतना स्पष्ट है कि इस बार का चुनाव टीएमसी को झटका देने वाला हो सकता है।पश्चिम बंगाल सरकार का हिंदू विरोधी चेहरा एक बार फिर एक्सपोज हो गया है। रामनवमी जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व से ठीक पहले पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में भगवान राम की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना ने स्वाभाविक रूप से लोगों की भावनाओं को आहत किया है। किसी भी धर्म, प्रतीक या आस्था से जुड़ी वस्तु पर हमला केवल एक स्थानीय घटना नहीं होती, बल्कि उसका प्रभाव व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान पर पड़ता है। बेहद चिंताजनक पहलू यह भी है कि ममता राज का हिंदू विरोधी चेहरा पहली बार उजागर नहीं हुआ है। इससे पहले भी मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी और तृणमूल सरकार कई बार हिंदू आस्था पर हमला कर चुकी हैं। यहां तक कि उन्हें जय श्रीराम के नारे तक पर आपत्ति रही है और अब उनके ही नेता और पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को सिर्फ उत्तर भारत का भगवान घोषित कर दिया है। एक तो पहले ही भगवान राम की मूर्ति का सिर काटने के कृत्य से हिंदू जनमानस आहत है, उस पर सिन्हा की टिप्पणी ने आग में घी का काम किया है। ऐसी घटनाएं और बयानबाजी न केवल धार्मिक संवेदनशीलता को झकझोरती हैं, बल्कि समाज में अविश्वास और तनाव की स्थिति भी पैदा करती हैं। इसलिए इस घटना को केवल एक आपराधिक कृत्य मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

रामनवमी के उत्सव से पहले नंदीग्राम में श्रीराम की मूर्ति का सिर काटा
पश्चिम बंगाल में हिंदू आस्था पर हमले का एक और मामला सामने आया है। राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है। यह घटना उस समय हुई जब रामनवमी के उत्सव की तैयारियां अपने अंतिम चरण में थीं, जिससे स्वाभाविक रूप से लोगों में आक्रोश और असंतोष बढ़ा। विपक्षी नेताओं ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया दी और सरकार पर सवाल उठाए, वहीं प्रशासन ने जांच का आश्वासन दिया। ऐसे मामलों में सबसे महत्वपूर्ण है कि दोषियों की शीघ्र पहचान हो और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, लेकिन ममता सरकार इस पर भी परदा डालने में लगी है।राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम बात- सुवेंदु
नंदीग्राम के विधायक और पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि राज्य में हिंदू मंदिरों और मूर्तियों पर हमले अब आम हो गए हैं। इसके लिए उन्होंने राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार की ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और प्रशासन की ‘शर्मनाक निष्क्रियता’ को जिम्मेदार ठहराया। घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई, जिसमें राज्य सरकार की नीतियों और प्रशासनिक भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। असली मुद्दा यह है कि क्या राज्य की कानून-व्यवस्था ऐसी घटनाओं को रोकने और उनके बाद प्रभावी कार्रवाई करने में सक्षम भी है या नहीं।

राम केवल उत्तर भारतीयों के देवता, हम काली के भक्त – सिन्हा
नंदीग्राम में प्रभु श्रीराम की मूर्ति का सिर काटने की घटना इसलिए और चिंताजनक हो गई है, क्योंकि टीएमसी सरकार इसकी परवाह करने की बजाए प्रभु श्रीराम का अपना भगवान ही नहीं मानती। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने जहां इसकी कड़ी निंदा की है, वहीं तृणमूल कांग्रेस के नेता औरे पूर्व मंत्री चंद्रनाथ सिन्हा के बयान ने आग में घी का काम किया है। सिन्हा ने अपने विवादित बयान में कहा है कि रामचंद्र तो केवल उत्तर भारत के देवता हैं। सिन्हा ने उल्टे भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में रामचंद्र नहीं चलेगा। बंगाल के लोग तो मां काली के भक्त हैं। भाजपा नेताओं ने सिन्हा की बयान की आलोचना करते हुए इसे भगवान श्रीराम का अपमान बताया है। ऐसे में हर स्तर पर मुख्यमंत्री, सरकार और प्रशासन को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि आस्था का सम्मान बना रहे और कानून-व्यवस्था पर लोगों का भरोसा और मजबूत हो।ममता का राज हिंदू विरोधी घटनाओं के लिए रहा है कुख्यात
पश्चिम बंगाल में समय-समय पर धार्मिक स्थलों या प्रतीकों को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में मंदिरों में तोड़फोड़, मूर्तियों को नुकसान पहुंचाने या धार्मिक जुलूसों के दौरान तनाव जैसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है। हालांकि इन घटनाओं की प्रकृति और कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटनाएं सामाजिक सौहार्द के लिए चुनौती बनती हैं। इसलिए इनका समाधान केवल राजनीतिक विमर्श से नहीं, बल्कि सख्त कार्रवाई से ही संभव है। लेकिन ममता सरकार ने अपनी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते इनमें लापहवाही ही दिखाई है। किसी भी राज्य सरकार की पहली जिम्मेदारी अपने नागरिकों की सुरक्षा और उनके धार्मिक अधिकारों की रक्षा करना होती है। चाहे घटना किसी भी धर्म से जुड़ी हो, प्रशासन को निष्पक्षता और तत्परता के साथ कार्रवाई करनी चाहिए। दोषियों की पहचान, गिरफ्तारी और न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना आवश्यक है, ताकि यह संदेश जाए कि ऐसी घटनाओं को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति की हदें पार कीं

पश्चिम बंगाल पिछले डेढ़ दशक में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुत्व विरोध की राजनीति का गवाह रहा है। तृणमूल कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए खुलकर खजाना खोला है और इसमें राज्य की माली हालत की भी चिंता नहीं की है। अल्पसंख्यकों की राजनीति के लिए ममता सरकार ने सारी सीमाएं ही लांघ ली है और आंखें बंद कर इन पर पैसा लुटाया जा रहा है। इसका अंदाजा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि 2010-11 में राज्य का जो अल्पसंख्यक बजट मात्र 472 करोड़ था, वह आज 5,600 करोड़ को पार कर चुका है। अल्पसंख्यक युवाओं का वोट बैंक पक्का करने के लिए करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। खास बात यह कि तृणमूल सरकार ने इनसे ऋण वापसी पर कोई फोकस नहीं किया है। इतना ही नहीं इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय में भी कई गुना की वृद्धि की गई है। दूसरी ओर प्रभु श्रीराम के नाम से लेकर हिंदुत्व और सनातन विरोध के कई उदाहरण ममता बनर्जी के हैं। इससे यह शीशे की तरह साफ है कि तृणमूल सरकार ने अल्पसंख्यकों और घुसपैठियों को खूब पाला-पोसा है।

आइए, हिंदू विरोधी ममता बनर्जी के राज की अराजकता, तानाशाही और हिंदू विरोधी मानसिकता पर एक नजर डालते हैं…

सबूत नंबर-22
राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तार
राम नवमी के लिए तैयार की जा रही भगवान राम की एक मूर्ति के सिर को ‘जिहादी’ काटकर ले गए। यह घटना नंदीग्राम के ब्लॉक-2 के वेटुरिया बस स्टैंड की है जहाँ प्रभु श्री राम की मूर्ति लगभग तैयार हो चुकी थी। लेकिन इससे पहले ही मूर्ति का सिर काटकर उसे क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल बन गया है। स्थानीय लोगों के अनुसार, काम खत्म होने के बाद मूर्ति को वहीं बस स्टैंड पर छोड़ दिया गया था। जब अगली सुबह कारीगर लौटे तो उन्होंने देखा कि मूर्ति का सिर गायब है। कई लोगों ने इस घटना को सनातन हिंदू आस्था पर हमला बताया है।

सबूत नंबर-21
राम नाम मास्क बांटने पर बीजेपी नेता गिरफ्तारपश्चिम बंगाल के हुगली में जय श्रीराम मास्क बांटना ममता बनर्जी की पुलिस को रास नहीं आया। पुलिस मास्क बांटने वाले बीजेपी नेताओं को पकड़कर ले गई। हुगली के सेरामपुर में बीजेपी नेता अमनिश अय्यर लोगों को ‘जय श्रीराम’ लिखा मास्क बांट रहे थे। इसी दौरान पुलिस वहां पहुंची और बीजेपी नेता को गिरफ्तार करके ले गई। इस दौरान वहां मौजूद लोगों ने विरोध जताते हुए जमकर जय श्रीराम के नारे लगाए। बीजेपी ने मास्क बांटने पर पार्टी नेता को गिरफ्तार करने को पूर्ण तानाशाही करार दिया है।

सबूत नंबर-20
भगवा टीशर्ट पहनने और जय श्रीराम बोलने से रोका
इसके पहले 7 फरवरी, 2021 को भगवा टीशर्ट पहनने और जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया गया। कोलकाता के इको पार्क में पुलिस के एक अधिकारी ने लोगों से साफ कहा कि आप लोग यहां जय श्री राम का नारा नहीं लगा सकते हैं।

सबूत नंबर-19
पार्टी नेता ने जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया
हाल ही में उनकी पार्टी के एक नेता ने जय श्रीराम बोलने वालों को धमकाया। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के एक नेता ने लोगों को धमकाते हुए कहा कि अगर बंगाल में रहना चाहते हो तो यहां ‘जय श्री राम’ के नारे नहीं लगा सकते। वीडियो में किसी सभा को संबोधित करते हुए टीएमसी नेता ने बंगाली में कहा कि राज्य में जय श्री राम बोलने की अनुमति नहीं है। यहां इन सब चीजों की अनुमति नहीं दी जाएगी। जो लोग इसका जाप करना चाहते हैं वे मोदी के राज्य गुजरात में जाकर ये कर सकते हैं।

सबूत नंबर-18
मुर्शिदाबाद में काली मां की मूर्ति जला डाला
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम तुष्टिकरण और वोटबैंक को लेकर इतनी अंधी हो चुकी है कि राज्य में हिन्दू विरोधी हरकतों पर कुछ भी एक्शन नहीं लेती हैं। कभी मंदिर में पूजा करने पर पिटाई की जाती है तो कभी हिन्दुओं के घर और मंदिर जला दिए जाते हैं। कभी रामनवमी और दुर्गापूजा पर तो कभी सरस्वती पूजा पर रोक लगा दी जाती है। इससे राज्य को मुसलमानों का हौसला बुलंद है और जब भी मौका मिलता है हिंदुओं को प्रताड़ित करते रहते हैं। हाल ही में 1 सितंबर, 2020 को मुर्शिदाबाद के एक मंदिर में काली मां की मूर्ति जला दिया गया। बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह ने एक ट्वीट कर आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद इलाके के एक मंदिर पर हमला कर मां काली की मूर्ति जला दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि दीदी की राजनीति का जिहादी स्वरूप अब हिंदू धर्म और संस्कृति को नष्ट करने पर तुला हुआ है।


सबूत नंबर-17
मंदिर में पूजा करने पर पुलिस ने की पिटाई
ममता राज में तो हिन्दुओं को मंदिरों में भी पूजा करने की आजादी नहीं है। 5 अगस्त, 2020 को जब पूरे विश्व के हिन्दू अयोध्या में राममंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन को लेकर उत्साहित थे। वहीं पश्चिम बंगाल की पुलिस लॉकडाउन के बहाने हिन्दुओं पर जुल्म ढा रही थी। मंदिर में पूजा कर रहे लोगों पर पुलिस ने लाठियां बरसाईं और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार किया। 

खड़गपुर में स्थानीय लोग राम मंदिर शिलान्यास के उत्सव में मंदिर में पूजा कर रहे थे। लेकिन ममता की पुलिस को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। इससे सार्वजनिक व्यावस्था और लॉकडाउन का उल्लंघन नहीं हो रहा था। फिर भी शांतिपूर्वक पूजा कर रहे लोगों को पुलिस ने घसिटकर मंदिर से बाहर निकाला। लोग पुलिस से पूजा करने का आग्रह करते रहे, लेकिन पुलिस ने उन्हें पूजा करने की अनुमति नहीं दी।

बीजेपी कार्यकर्ता ने नारायणपुर इलाके में ‘यज्ञ’ आयोजित करने का प्रयास किया लेकिन ममता के गुंडों ने उन्हें रोक दिया। हिन्दुओं और ममता के गुंडों के बीच झड़प हो गई। जिसके बाद पुलिस ने लोगों को तितर-बितर करने के लिए बल प्रयोग किया। जिसमें कई लोगों को चोटें आईं। उधर खड़गपुर में श्री राम मंदिर के लिए पूजा का आयोजन किया गया था। लेकिन ममता बनर्जी की पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया, महिलाओं को भी नहीं छोड़ा।

सबूत नंबर-16
तेलिनीपाड़ा में जला दिए गए हिन्दुओं के घर और मंदिर
राज्य के हुगली जिले के चंदर नगर के तेलिनीपाड़ा में मई, 2020 के महीने में कई दिनों तक हिंदुओं के खिलाफ खुलकर हिंसा हुई। हिंदुओं के घर जलाए गए। जिले के तेलिनीपाड़ा के तांतीपारा, महात्मा गांधी स्कूल के पास शगुनबागान और फैज स्कूल के पास जमकर हिंसा, आगजनी और लूटपाट की गई। प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। मालदा के शीतला माता मंदिर में भी तोड़फोड़ और आगजनी की गई।

सबूत नंबर-15
पुस्तक मेले में हनुमान चालीसा के वितरण पर लगाया प्रतिबंध
पश्चिम बंगाल में ममता की पुलिस ने कोलकाता में 44वें अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले में विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा बांटी जा रही हनुमान चालीसा की पुस्तकों पर रोक लगा दी। पुलिस ने बताया कि हनुमान चालीसा के वितरण से शहर में कानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है और पुस्तक मेले में आने वाले लोग भावनाओं में बह सकते हैं।

विहिप के अधिकारियों ने पुलिस के इस कार्रवाई का विरोध किया। साथ ही पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब मेले में कुरान और बाइबिल की पुस्तकें बांटी जा सकती हैं तो हनुमान चालीसा की क्यों नहीं? बढ़ते विरोध को देखते हुए कोलकाता पुलिस बैकफुट पर आ गई और हनुमान चालीसा के वितरण से रोक को हटा लिया। विहिप ने कहा कि हनुमान चालीसा धार्मिक पुस्तक है और इसमें किसी भी तरह की आपत्तिपूर्ण सामग्री नहीं है। लेकिन ममता राज में हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक का विरोध किया जा रहा है।

सबूत नंबर-14
ममता बनर्जी ने स्कूली बच्चों को धर्म के नाम पर बांटा
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इन दिनों गंभीर हताशा और निराशा में हैं। लोकसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद उन्हें विधानसभा चुनाव में भी भयानक हार पहले से ही दिखाई देने लगी है। यही वजह है कि ममता बनर्जी अपना वोट बैंक बचाने के लिए जोरशोर से मुस्लिम तुष्टिकरण में जुट गई हैं।

ममता बनर्जी ने राजनीतिक निर्लज्जता की सभी सीमाओं को पार करते हुए स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी मजहब के नाम पर बांट दिया। ममता बनर्जी की सरकार ने राज्य के स्‍कूलों को निर्देश दिया कि वे मुस्लिम स्‍टूडेंट्स के लिए अलग से मिड-डे मील हॉल रिजर्व करें। यह आदेश राज्‍य के उन सरकारी स्‍कूलों पर लागू होगा जहां पर 70 प्रतिशत या उससे ज्‍यादा मुस्लिम छात्र हैं। राज्‍य अल्‍पसंख्‍यक और मदरसा शिक्षा विभाग की ओर उन सभी सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्‍त स्‍कूलों का नाम मांगा, जहां पर 70 प्रतिशत से ज्‍यादा मुस्लिम बच्‍चे पढ़ते हैं। इन सरकारी स्‍कूलों में अल्‍पसंख्‍यक बच्‍चों के लिए अलग से मिड-डे मील डायनिंग हॉल बनाया जाएगा।

सबूत नंबर-13
ममता बनर्जी ने ‘जय श्रीराम’ बोलने वालों को दी धमकी
मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी को जय श्रीराम का उद्घोष अब गाली की तरह लगने लगा है। राज्य के 24 परगना जिले में ममता बनर्जी का काफिला गुजर रहा था तभी रास्ते में भीड़ में खड़े लोगों ने जय श्रीराम का उदघोष कर दिया। जय श्रीराम सुनते ही ममता बनर्जी को गुस्सा आ गया और गाड़ी से उतरकर उन्होंने लोगों को धमकाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं ममता बनर्जी ने जय श्रीराम कहने वालों को गिरफ्तार करने की धमकी भी दी और उन्हें दूसरे प्रदेश का बता दिया। यह कोई पहली बार नहीं है, इससे पहले चुनाव के दौरान भी ममता बनर्जी ने इसी तरह जय श्रीराम कहने वालों को जेल में डालने की धमकी दी थी। 

सबूत नंबर-12
ममता बनर्जी का जय श्रीराम बोलने से इंकार, बताया गाली
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में कहा कि वे किसी हाल में जय श्रीराम नहीं बोलेंगी। ममता का कहना है कि जय श्रीराम बीजेपी का नारा है लेकिन पीएम नरेन्द्र मोदी लोगों को यह बोलने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। सच्चाई यह है कि देश में जय श्रीराम बोलने की सदियों पुरानी परंपरा है। इसके एक दिन पहले ही बंगाल में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें तृणमूल कार्यकर्ता जय श्रीराम का नारा लगा रही भीड़ को खदेड़ रहे हैं। पूरे राज्य में हिंदुओं को इसी तरह प्रताड़ित किया जा रहा है। ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के इस रवैये से बंगाल के लोगों में जबरदस्त गुस्सा है। राज्य में जगह-जगह पर इसका विरोध हो रहा है और इसका असर वोटिंग पर भी पड़ना तय है। दरअसल, राज्य में अपनी पार्टी की खिसकती जमीन से ममता परेशान हो गई हैं। इससे घबराई ममता अब राज्य में धार्मिक आधार पर वोटों को बांटने की कोशिश कर रही हैं। हिंदुओं के खिलाफ बयानबाजी कर मुसलमान वोटर्स को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही हैं।

सबूत नंबर-11
मुस्लिम प्रेम और हिंदू विरोध में देवताओं को बांटने पर तुली ममता बनर्जी
हिंदुओं के धार्मिक रीति-रिवाज, पूजा-पद्धति और पर्व-त्योहार पर लगाम लगाने के बाद ममता बनर्जी हिंदू देवी-देवताओं को बांटने में भी लग गई। हिंदुओं को बांटने के लिए ममता बनर्जी ने कहा कि हम दुर्गा की पूजा करते हैं, राम की पूजा क्यों करें? झरगाम की एक सभा में ममता ने कहा कि, ‘बीजेपी राम मंदिर बनाने की बात करती है, वे राम की नहीं रावण की पूजा करती है। लेकिन हमारे पास हमारी अपनी देवी दुर्गा है। हम मां काली और गणपति की पूजा करते हैं। हम राम की पूजा नहीं करते।’

सनातन संस्कृति में शस्त्रों का विशेष महत्त्व है। अलग-अलग पर्व त्योहारों पर धार्मिक यात्राओं में तलवार, गदा लेकर चलने की परंपरा रही है, लेकिन ममता बनर्जी ने धार्मिक यात्राओं और शस्त्र को भी साम्प्रदायिक और सेक्युलर करार दिया। गौरतलब है कि जब यही शस्त्र प्रदर्शन मोहर्रम के जुलूस में निकलते हैं तो सेक्युलर होते हैं, लेकिन रामनवमी में निकलते ही साम्प्रदायिक हो जाते हैं।

सबूत नंबर-10
राम के नाम से नफरत कई बार हो चुकी है जाहिर
ममता बनर्जी कई बार हिंदू धर्म और भगवान राम के प्रति अपनी असहिष्णुता जाहिर करती रही हैं। हालांकि कई बार कोर्ट ने उनकी इस कुत्सित कोशिश को सफल नहीं होने दिया। वर्ष 2017 में जब लेक टाउन रामनवमी पूजा समिति’ ने 22 मार्च को रामनवमी पूजा की अनुमति के लिए आवेदन दिया तो राज्य सरकार के दबाव में नगरपालिका ने पूजा की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद जब समिति ने कानून का दरवाजा खटखटाया तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने पूजा शुरू करने की अनुमति देने का आदेश दिया।


सबूत नंबर-9
बंगाल सरकार ने पाठ्यक्रम में रामधनु को कर दिया रंगधनु 
भगवान राम के प्रति ममता बनर्जी की घृणा का अंदाजा इस बात से भी जाहिर हो गई, जब तीसरी क्लास में पढ़ाई जाने वाली किताब ‘अमादेर पोरिबेस’ (हमारा परिवेश) ‘रामधनु’ (इंद्रधनुष) का नाम बदल कर ‘रंगधनु’ कर दिया गया। साथ ही ब्लू का मतलब आसमानी रंग बताया गया है। दरअसल साहित्यकार राजशेखर बसु ने सबसे पहले ‘रामधनु’ का प्रयोग किया था, लेकिन मुस्लिमों को खुश करने के लिए किताब में इसका नाम ‘रामधनु’ से बदलकर ‘रंगधनु’ कर दिया गया।

सबूत नंबर-8
हिंदुओं के हर पर्व के साथ भेदभाव करती हैं ममता बनर्जी
ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ कि ममता बनर्जी ने हिंदुओं के साथ भेदभाव किया। कई ऐसे मौके आए हैं जब उन्होंने अपना मुस्लिम प्रेम जाहिर किया है और हिंदुओं के साथ भेदभाव किया है। सितंबर, 2017 में कलकत्ता हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से ममता बनर्जी का हिंदुओं से नफरत जाहिर होता है। कोर्ट ने तब कहा था,  ”आप दो समुदायों के बीच दरार पैदा क्यों कर रहे हैं। दुर्गा पूजन और मुहर्रम को लेकर राज्य में कभी ऐसी स्थिति नहीं बनी है। उन्‍हें साथ रहने दीजिए।”


सबूत नंबर-7
दशहरे पर शस्त्र जुलूस निकालने की नहीं दी थी अनुमति
हिंदू धर्म में दशहरे पर शस्त्र पूजा की परंपरा रही है। लेकिन मुस्लिम प्रेम में ममता बनर्जी हिंदुओं की धार्मिक आजादी छीनने की हर कोशिश करती रही हैं। सितंबर, 2017 में ममता सरकार ने आदेश दिया कि दशहरा के दिन पश्चिम बंगाल में किसी को भी हथियार के साथ जुलूस निकालने की इजाजत नहीं दी जाएगी। पुलिस प्रशासन को इस पर सख्त निगरानी रखने का निर्देश दिया गया। हालांकि कोर्ट के दखल के बाद ममता बनर्जी की इस कोशिश पर भी पानी फिर गया।

सबूत नंबर-6
कई गांवों में दुर्गा पूजा पर ममता बनर्जी ने लगा रखी है रोक
10 अक्टूबर, 2016 को कलकत्ता हाईकोर्ट के आदेश से ये बात साबित होती है ममता बनर्जी ने हिंदुओं को अपने ही देश में बेगाने करने के लिए ठान रखी है। बीरभूम जिले का कांगलापहाड़ी गांव ममता बनर्जी के दमन का भुक्तभोगी है। गांव में 300 घर हिंदुओं के हैं और 25 परिवार मुसलमानों के हैं, लेकिन इस गांव में चार साल से दुर्गा पूजा पर पाबंदी है। मुसलमान परिवारों ने जिला प्रशासन से लिखित में शिकायत की कि गांव में दुर्गा पूजा होने से उनकी भावनाओं को ठेस पहुंचती है, क्योंकि दुर्गा पूजा में बुतपरस्ती होती है। शिकायत मिलते ही जिला प्रशासन ने दुर्गा पूजा पर बैन लगा दिया, जो अब तक कायम है।

सबूत नंबर-5
छठ पूजा मनाने पर लगा दी रोक
ममता राज में साल 2017 में राज्य के सिलीगुड़ी में महानंदा नदी में छठ पूजा मनाने पर रोक लगा दी गई। जनसत्ता अखबार की खबर के अनुसार दार्जिलिंग की डीएम ने एनजीटी के आदेश का हवाला देकर महानंदा नदी में छठ पूजा मनाने पर बैन कर दिया। दार्जिलिंग की जिलाधिकारी ने नदी में छठ के लिए अस्थायी घाट बनवाने से भी इनकार कर दिया और कहा कि जो कोई भी यहां छट मनाते देखा गया उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी। एनजीटी ने एक अजीबोगरीब तर्क दिया कि छठ के कारण नदी में प्रदूषण हो रहा है। जबकि छठ में ऐसा कुछ भी नहीं होता जिससे नदी प्रदूषित हो। भगवान सूर्य को अर्घ्य के रूप में नदी का ही पानी अर्पित किया जाता है उसमें थोड़े से फूल और पत्ते और चावल के दाने होते हैं। ये सब प्राकृतिक चीजे हैं जिन्हें नदी में पलने वाली मछलियां और दूसरे जीव खाते हैं। ये सारी चीजें सूप में रखकर चढ़ाई जाती हैं, यानी पॉलीथिन फेंके जाने की भी आशंका नहीं होती।

सबूत नंबर-4
ममता बनर्जी ने सरस्वती पूजा पर भी लगाया प्रतिबंध
एक तरफ बंगाल के पुस्तकालयों में नबी दिवस और ईद मनाना अनिवार्य किया गया तो एक सरकारी स्कूल में कई दशकों से चली आ रही सरस्वती पूजा ही बैन कर दी गई। ये मामला हावड़ा के एक सरकारी स्कूल का है, जहां पिछले 65 साल से सरस्वती पूजा मनायी जा रही थी, लेकिन मुसलमानों को खुश करने के लिए ममता सरकार ने इसी साल फरवरी में रोक लगा दी। जब स्कूल के छात्रों ने सरस्वती पूजा मनाने को लेकर प्रदर्शन किया, तो मासूम बच्चों पर डंडे बरसाए गए। इसमें कई बच्चे घायल हो गए।

सबूत नंबर-3
हनुमान जयंती पर निर्दोषों को किया गिरफ्तार, लाठी चार्ज 
11 अप्रैल, 2017 को पश्चिम बंगाल में बीरभूम जिले के सिवड़ी में हनुमान जयंती के जुलूस पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। मुस्लिम तुष्टिकरण के कारण ममता सरकार से हिन्दू जागरण मंच को हनुमान जयंती पर जुलूस निकालने की अनुमति नहीं दी। हिंदू जागरण मंच के कार्यकर्ताओं का कहना था कि हम इस आयोजन की अनुमति को लेकर बार-बार पुलिस के पास गए, लेकिन पुलिस ने मना कर दिया। धार्मिक आस्था के कारण निकाले गए जुलूस पर पुलिस ने बर्बता से लाठीचार्ज किया। इसमें कई लोग घायल हो गए। जुलूस में शामिल होने पर पुलिस ने 12 हिन्दुओं को गिरफ्तार कर लिया। उन पर आर्म्स एक्ट समेत कई गैर जमानती धाराएं लगा दीं।

सबूत नंबर-2
ममता राज के 8000 गांवों में एक भी हिंदू नहीं
पश्चिम बंगाल में हिन्दुओं का उत्पीड़न जारी है। दरअसल ममता राज में हिंदुओं पर अत्याचार और उनके धार्मिक क्रियाकलापों पर रोक के पीछे तुष्टिकरण की नीति है। लेकिन इस नीति के कारण राज्य में अलार्मिंग परिस्थिति उत्पन्न हो गई है। प. बंगाल के 38,000 गांवों में 8000 गांव अब इस स्थिति में हैं कि वहां एक भी हिन्दू नहीं रहता, या यूं कहना चाहिए कि उन्हें वहां से भगा दिया गया है। बंगाल के तीन जिले जहां पर मुस्लिमों की जनसंख्या बहुमत में हैं, वे जिले हैं मुर्शिदाबाद जहां 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू, मालदा 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू, और उत्तरी दिनाजपुर 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू। दरअसल बंगलादेश से आए घुसपैठिए प. बंगाल के सीमावर्ती जिलों के मुसलमानों से हाथ मिलाकर गांवों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं और हिन्दू डर के मारे अपना घर-बार छोड़कर शहरों में आकर बस रहे हैं।

सबूत नंबर-1
ममता राज में घटती जा रही हिंदुओं की संख्या
पश्चिम बंगाल में 1951 की जनसंख्या के हिसाब से 2011 में हिंदुओं की जनसंख्या में भारी कमी आयी है। 2011 की जनगणना ने खतरनाक जनसंख्यिकीय तथ्यों को उजागर किया है। जब अखिल स्तर पर भारत की हिन्दू आबादी 0.7 प्रतिशत कम हुई है तो वहीं सिर्फ बंगाल में ही हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो कि बहुत ज्यादा है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि सिर्फ बंगाल में मुसलमानों की आबादी 1.77 फीसदी की दर से बढ़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर से भी कहीं ज्यादा दर से बढ़ी है।

आइए, अब हम ममता बनर्जी सरकार के अपने वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीयत से उठाए गए टॉप-10 कदमों के बारे में भी जानते हैं…

1.ओबीसी आरक्षण: सरकारी नौकरियों में प्रवेश
ममता सरकार के कार्यकाल के दौरान मुस्लिम समुदाय की 70 से अधिक जातियों को ओबीसी (OBC) श्रेणी में शामिल किया। मुस्लिम तुष्टिकरण की इस इंतेहा के चलते वास्तविक ओबीसी समुदाय के लोगों और युवाओं के हक पर डाका डाला गया है। ओबीसी में आने और इससे मिले आरक्षण के चलते अब अल्पसंख्यक ओबीसी के हक को मारकर सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में नजर आने लगे हैं।
2. इमाम और मुअज्जिन भत्ता में की वृद्धि
ममता सरकार ने तुष्टिकरण की नीति से ही इमामों और पुजारियों को देखा है। यह वजह है कि आज इमामों का मानदेय ज्यादा है। ममता सरकार ने इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक मानदेय की व्यवस्था की। इसमें ₹500 की वृद्धि कर इसे क्रमशः ₹3,000 और ₹1,500 (विभिन्न श्रेणियों में) तक ले जाया गया है, ताकि उनके वोट बैंक को आर्थिक सुरक्षा मिलती रहे।

3. मदरसा आधुनिकीकरण और मॉडल मदरसे
एक ओर उत्तर प्रदेश सरकार ना सिर्फ नफरत फैलाने के सबब बनने वाले मदरसों को बंद कर रही है, बल्कि उनका बजट भी घटा दिया गया है। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में सरकार ने न केवल मदरसों को मान्यता दी, बल्कि 14 जिलों में एक नया ही ‘मॉडल मदरसा’ स्थापित कर दिया है। यहां धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ मदरसा छात्रों को दूसरे विषय भी पढ़ाने लगे हैं। तृणमूल सरकार ने राज्य में करीब 100 मदरसों और खोल दिए हैं।
4. अल्पसंख्यकों के लिए ऐक्यश्री, श्रमश्री और मेधाश्री
ऐक्यश्री राज्य की सबसे बड़ी छात्रवृत्ति योजना है। इसके तहत कक्षा 1 से लेकर पीएचडी तक के अल्पसंख्यक छात्रों को वित्तीय सहायता दी जाती है। अब तक लगभग 4.85 करोड़ छात्र इसका लाभ उठा चुके हैं। इसी प्रकार ममता सरकार ने ‘मेधाश्री’ योजना भी शुरू की। इसका सीधा फायदा सिर्फ गरीब मुस्लिम परिवारों को हुआ। लॉकडाउन और उसके बाद अन्य राज्यों से लौटे केवल मुस्लिम श्रमिकों (जो बंगाल की श्रम शक्ति का बड़ा हिस्सा हैं) के लिए यह योजना बनाई गई। इसके तहत लौटने वाले श्रमिकों को कौशल प्रशिक्षण और एक वर्ष तक 5,000 की मासिक सहायता का प्रावधान किया गया।

5. राज्य के 16.31 लाख अल्पसंख्यकों पर ऋण की बरसात
पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक विकास एवं वित्त निगम (WBMDFC) अपने नाम के अनुरूप सिर्फ मुस्लिमों को ही ऋण वितरित करता है। राज्य ने 16.31 लाख अल्पसंख्यक लाभार्थियों को ₹3,926 करोड़ से अधिक का ऋण वितरित किया है। इसमें ‘टर्म लोन’ और ‘माइक्रो-फाइनेंस’ शामिल हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मुस्लिमों को वोट बैंक बनाने के लिए इसका हथियार के रूप में इस्तेमाल होता है। सरकार का दावा है कि समुदाय के युवा इस पैसे का यदि सही निवेश करेंगे तो आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
6. उच्च शिक्षा ऋण: मुस्लिमों को 30 लाख तक की मदद
प्रतिभाशाली अल्पसंख्यक छात्रों के लिए भारत या विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त करने हेतु 30 लाख तक के शिक्षा ऋण की व्यवस्था की गई है। ताकि ममता बनर्जी का मेधावी वोट बैंक भी डॉक्टर और इंजीनियर बनने का सपना पूरा कर सके। इसके अलावा वक्फ बोर्ड की संपत्तियों पर मजबूत ‘सरकारी मुहर’ लगाने और उन्हें अतिक्रमित होने से बचाने के लिए उनका डिजिटलीकरण किया जा है।

7. राज्य के हर जिले में अपने वोट बैंक के लिए अल्पसंख्यक भवन
ममता बनर्जी सरकार के द्वारा वोट बैंक को पक्का करने के लिए हर जिले में ‘अल्पसंख्यक भवन’ (Minority Bhavan) का निर्माण किया गया है। यह एक ‘सिंगल विंडो’ की तरह काम करते हैं, जहाँ अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को तत्काल उनकी योजनाओं की जानकारी एक ही छत के नीचे मिलती है।
8. निराश्रित मुस्लिम महिलाओं के लिए आवास
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पीएम आवास योजना का विरोध करती हैं, जिसमें हर समुदाय के गरीबों को आवास की सुविधा दी गई है। ममता ने अपने यहां योजना लागू नहीं होने दी, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय की विधवाओं और निराश्रित महिलाओं को अपना पक्का घर बनाने के लिए 1.20 लाख की वित्तीय सहायता दी जाती है। दूसरे समुदाय की विधवाओं पर उनका फोकस ना के बराबर है।

9. उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा
तृणमूल सरकार मुस्लिम समुदाय के लोगों को खुश करने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। यहां तक कि राज्य के उन क्षेत्रों में जहाँ उर्दू भाषियों की संख्या 10% से अधिक है, उर्दू को दूसरी राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू भाषी मुसलमानों के लिए सरकारी कामकाज और पहचान को और मजबूती दी है। इतना ही नहीं मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे क्षेत्रों में ‘अल्पसंख्यक सांस्कृतिक विकास केंद्र’ बनाए जा रहे हैं। ये केंद्र मुस्लिम संस्कृति, सूफी संगीत और मुस्लिम कला को संरक्षित करेंगे।
10. अल्पसंख्यक विकास परिषद का गठन
कौशल विकास और सामुदायिक समस्याओं के त्वरित समाधान के लिए अलग से ‘अल्पसंख्यक विकास परिषद’ बनाई गई है। यह परिषद सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय के साथ समन्वय कर अल्पसंख्यकों से जुड़ी योजनाओं की निगरानी करती है। इसके अलावा WBMDFC के माध्यम से अल्पसंख्यक युवाओं को पैरामेडिकल, रिटेल और आईटी जैसे क्षेत्रों में मुफ्त प्रशिक्षण देने की भी सुविधा है।

 

 

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