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अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फिर दिखी मोदी सरकार की धमक, भारत की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष को देनी पड़ी सफाई

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का कद काफी बढ़ा है। इसका प्रमाण कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद देखने को मिला। जब चीन और पाकिस्तान तमाम कोशिश के बाद भी कश्मीर को लेकर भारत पर दबाव बनाने में नाकाम रहे। मोदी सरकार में भारत के अंतर्राष्ट्रीय धमक का असर है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के अध्यक्ष वोल्कन बोजकिर को कश्मीर पर दिए अपने बयान को लेकर सफाई देनी पड़ी है।

मोदी सरकार के सख्त रूख और विरोध के बाद संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्यीय निकाय के अध्यक्ष की उप प्रवक्ता एमी कांत्रिल ने सफाई देते हुए कहा कि पाकिस्तान की अपनी यात्रा के दौरान बोजकिर ने कहा था कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में शांति, स्थिरता एवं समृद्धि पाकिस्तान एवं भारत के बीच संबंधों के सामान्य बनने पर टिकी है और जम्मू- कश्मीर मुद्दे के समाधान से ही रिश्ते सामान्य होंगे। उन्होंंने कहा कि संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में अध्यक्ष ने 1972 के भारत-पाकिस्तान शिमला समझौते को भी याद किया था। लेकिन अफसोसजनक है कि उनका बयान संदर्भ से हटकर देखा गया।

वोल्कन बोजकिर के बयान पर भारत के विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि बोजकिर का बयान ‘अस्वीकार्य’ है और भारत के केंद्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का उनके द्वारा जिक्र करना ‘अवांछनीय’ है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने पिछले सप्ताह कहा था, ‘ जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के कोई वर्तमान अध्यक्ष गुमराह करने वाला एवं पूर्वाग्रह से ग्रस्त बयान देते हैं तो वह अपने पद को बड़ा नुकसान पहुंचाते हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष का आचरण वाकई खेदजनक है और वैश्विक स्तर पर उनके दर्जे को घटाता है।

गौरतलब है कि यूएनजीए के अध्यक्ष वोल्कन बोजकिर पिछले महीने के आखिर में बांग्लादेश और पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे। इस्लामाबाद में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के साथ संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में दृढ़ता से लाना ‘पाकिस्तान का दायित्व’ है।

पाकिस्तानी वेबसाइट डॉन के मुताबिक, कश्मीर मसले को फलस्तीन मुद्दे से तुलना करते हुए यूएनजीए अध्यक्ष बोजकिर ने कहा था कि कश्मीर विवाद के समाधान के लिए बड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि यह पाकिस्तान का विशेष रूप से कर्तव्य है कि वह संयुक्त राष्ट्र के मंच पर इसे (मुद्दे) और अधिक मजबूती से लाए। उन्होंने कहा कि वह इस बात से समहत हैं कि फलस्तीनी मुद्दा और कश्मीर मुद्दा एक ही समय के हैं।

 

 

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