प्रधानमंत् नरेन्द्र मोदी ने नई दिल्ली में 13 फरवरी को ‘सेवा तीर्थ’ और ‘कर्तव्य भवन-1 एवं 2’ का उद्घाटन किया। इस मौके को उन्होंने भारत की विकास यात्रा का नया अध्याय बताया। विजया एकादशी के शुभ दिन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज लिया गया संकल्प निश्चित ही विजय की ओर ले जाएगा। प्रधानमंत्री ने कहा कि आजादी के बाद लंबे समय तक देश के बड़े फैसले नॉर्थ और साउथ ब्लॉक से लिए जाते रहे। लेकिन ये इमारतें ब्रिटिश हुकूमत की सोच का प्रतीक थीं। उन्होंने याद दिलाया कि 1911 में जब राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई गई, तो सत्ता के केंद्रीकरण की सोच के साथ इन भवनों का निर्माण हुआ।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अब समय बदल चुका है। सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन किसी महाराजा की इच्छा नहीं, बल्कि 140 करोड़ देशवासियों की आकांक्षाओं का केंद्र बनेंगे। उन्होंने कहा कि 21वीं सदी के भारत को ऐसी कार्यसंस्कृति और बुनियादी ढांचा चाहिए जो आधुनिक हो, तकनीक से लैस हो और प्रेरणादायक भी हो। करीब सौ साल पुरानी इमारतें अब नई तकनीकी जरूरतों के मुताबिक पर्याप्त नहीं थीं। जगह की कमी और जर्जर ढांचे के कारण कामकाज प्रभावित होता था।

प्रधानमंत्री ने बताया कि आज भी केंद्र सरकार के कई मंत्रालय दिल्ली में 50 से ज्यादा अलग-अलग जगहों से चल रहे हैं। हर साल करीब डेढ़ हजार करोड़ रुपये किराए पर खर्च होते हैं। हजारों कर्मचारियों को रोज एक इमारत से दूसरी इमारत तक जाना पड़ता है, जिससे समय और संसाधनों की बर्बादी होती है। उन्होंने भरोसा जताया कि नए परिसर से समय बचेगा, खर्च घटेगा और काम की रफ्तार बढ़ेगी। इससे कर्मचारियों की उत्पादकता भी बढ़ेगी और फैसले तेजी से लिए जा सकेंगे।

पीएम मोदी ने यह भी ऐलान किया कि पुराने भवनों को भुलाया नहीं जाएगा। उन्हें संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी वहां जाकर इतिहास से प्रेरणा ले सके। उन्होंने कहा कि विरासत को सहेजते हुए आगे बढ़ना ही सच्ची प्रगति है। अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने गुलामी की मानसिकता से मुक्ति की बात भी दोहराई। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद भी कई प्रतीक ऐसे थे जो औपनिवेशिक दौर की याद दिलाते थे। 2014 के बाद देश ने इन्हें बदलने का संकल्प लिया।

उन्होंने ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ और पुलिस स्मारक के निर्माण का जिक्र किया। साथ ही रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग करने और राजपथ को ‘कर्तव्य पथ’ बनाने को मानसिक बदलाव का प्रतीक बताया। इसी परिसर में नेताजी सुभाषचंद्र बोस की प्रतिमा स्थापना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि अब राजधानी के केंद्र में देश के नायकों को सम्मान मिल रहा है। उन्होंने कहा कि नाम बदलना सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं, बल्कि सोच का परिवर्तन है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि नए प्रधानमंत्री कार्यालय का नाम ‘सेवा तीर्थ’ रखा गया है। उनके मुताबिक शासन का अर्थ सेवा है, और सेवा ही भारत की आत्मा है। ‘सेवा परमो धर्मः’ का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हर फैसला नागरिकों के हित में होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों और कर्मचारियों से अपील की कि जब भी वे इस भवन में प्रवेश करें, तो खुद से सवाल पूछें—क्या आज का मेरा काम देशवासियों का जीवन आसान बनाएगा? यही आत्ममंथन इस जगह की असली ताकत होगा।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत इस समय ‘रिफॉर्म एक्सप्रेस’ पर सवार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए व्यापार समझौते हो रहे हैं और देश 2047 के विकसित भारत के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सेवा तीर्थ और कर्तव्य भवन की भूमिका बेहद अहम होगी। उन्होंने ‘नागरिक देवो भव’ को सरकार की कार्यसंस्कृति बताया। उनके अनुसार पिछले 11 वर्षों में शासन का मॉडल बदला है, जहां निर्णय का केंद्र नागरिक है।

प्रधानमंत्री ने ‘कर्तव्य’ को राष्ट्र निर्माण की प्राणवायु बताया। उन्होंने कहा कि अधिकार की इमारत कर्तव्य की नींव पर ही खड़ी होती है। विकसित भारत 2047 सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि 140 करोड़ सपनों की समय-सीमा है। उन्होंने विश्वास जताया कि सेवा तीर्थ संवेदनशील और नागरिक-केंद्रित शासन का प्रतीक बनेगा। उन्होंने कहा कि यही समय है, सही समय है—जब भारत अपने भविष्य को नई दिशा दे सकता है।









