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पीएम मोदी के शासन काल में चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन, 1200 प्रतिशत बढ़ा निर्यात, विश्व भर के 121 देशों को भेजा गया

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भारत ने चीनी निर्यात के मामले में पिछले आठ सालों में नया रिकॉर्ड बना लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के किसानों की आय दोगुना करने और देश को विकास के पथ पर अग्रसर करने के आह्वान का असर दिखने लगा है। पीएम मोदी के आठ साल के कार्यकाल में चीनी एवं चीनी उत्पादों के निर्यात में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली है। अप्रैल-मई 2013 में चीनी एवं चीनी उत्पादों का निर्यात जहां 840 करोड़ रुपये का हुआ था वहीं अप्रैल-मई 2022 में यह बढ़कर 11,370 करोड़ रुपये का हो गया। यानी इन आठ सालों में 1253 प्रतिशत वृद्धि देखने को मिली है। इससे जहां देश की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है वहीं किसानों को भी इसका लाभ मिला है और उनके जीवन स्तर में सुधार देखने को मिला है। इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) के मुताबिक, भारत ने सितंबर में समाप्त मार्केट ईयर 2021-22 में मई तक 86 लाख टन चीनी के निर्यात के रिकॉर्ड को पार कर लिया है। भारत ने विपणन वर्ष 2020-21 में कुल 70 लाख टन चीनी का निर्यात किया था, जबकि इसी अवधि में घरेलू उत्पादन तीन करोड़ 11.9 लाख टन का था। पिछले वित्त वर्ष की तुलना में चीनी के निर्यात में 65 प्रतिशत की उछाल दर्ज की गई। यह वृद्धि उच्च माल भाड़ा बढोतरी, कंटेनरों की कमी आदि के रूप में कोविड-19 महामारी द्वारा उत्पन्न लॉजिस्ट्क्सि संबंधी चुनौतियों के बावजूद अर्जित की गई। मोदी सरकार की नीतियां किसानों को वैश्विक बाजारों का दोहन करने के माध्यम से उनकी आय बढ़ाने में सहायता कर रही हैं।

भारत ब्राजील के बाद विश्व का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। भारत निरंतर चीनी का अधिशेष उत्पादन करता रहा है और आराम से घरेलू आवश्यकताओं से अधिक उत्पादन करता रहा है। रिकॉर्ड निर्यात चीनी उत्पादकों को उनके भंडार में कमी लाने में सक्षम बनाएगा तथा गन्ना किसानों को भी लाभान्वित करेगा क्योंकि भारतीय चीनी की बढ़ी हुई मांग से उनकी प्राप्ति में सुधार आने की उम्मीद है। कृषि निर्यातों में उल्लेखनीय वृद्धि को देश के कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के माध्यम से किसानों की आय बढ़ाने की सरकार की प्रतिबद्धता के प्रमाण के रूप में भी देखा जा रहा है।

चीनी का निर्यात 86 लाख टन के पार

भारत ने सितंबर में समाप्त मार्केट ईयर 2021-22 में मई तक 86 लाख टन चीनी के निर्यात के रिकॉर्ड को पार कर लिया है। वहीं भारत ने मार्केट ईयर 2020-21 में कुल 7 मिलियन टन चीनी का निर्यात किया था, जबकि इसी अवधि में घरेलू उत्पादन 31.19 मिलियन टन था। पिछले माह सरकार ने पर्याप्त मात्रा में चीनी की घरेलू आपूर्ति की बात कही थी। वहीं त्योहारी सीजन में चीनी की खुदरा कीमतों को कंट्रोल में रखने के लिए सरकार ने चीनी के निर्यात को सीमित कर दिया है।

करीब 1 करोड़ टन चीनी निर्यात का करार

आंकड़ों के मुताबिक अब तक करीब 9.4-9.5 मिलियन टन चीनी के निर्यात का करार किया गया है। इसमें से करीब 8.6 मिलियन टन मई 2022 के अंत तक निर्यात की गई। चालू मार्केटिंग ईयर की अक्टूबर-अप्रैल अवधि के दौरान घरेलू बाजार में करीब 16 मिलियन टन चीनी की बिक्री होने का अनुमान है, जो एक साल पहले की अवधि में 15.26 मिलियन टन से 7,50,000 टन से ज्यादा है। इसके अलावा सरकार ने जून तक जारी घरेलू चीनी बिक्री कोटा पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 5,50,000 टन ज्यादा कर दिया है। ऐसा अनुमान है कि चालू मार्केटिंग ईयर में घरेलू चीनी खपत 27.5 मिलियन टन होगी, जबकि पिछले वर्ष में यह 26.55 मिलियन टन थी। ISMA के अनुसार, चालू मार्केटिंग ईयर में 6 जून तक घरेलू चीनी उत्पादन 35.23 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा 30.74 मिलियन टन था।

सरकार ने चीनी निर्यात की सीमा एक करोड़ टन तय की

पिछले महीने सरकार ने पर्याप्त घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित करने और अक्टूबर-नवंबर के त्योहारी सत्र के दौरान खुदरा कीमतों पर अंकुश रखने के लिए चीनी के निर्यात को एक करोड़ टन पर सीमित कर दिया था। हालांकि, सहकारी समितियों ने निर्यात सीमा को 10 लाख टन और बढ़ाये जाने की मांग की है। भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा) के अनुसार, यह बताया गया है कि अब तक लगभग 94-95 लाख टन चीनी का निर्यात अनुबंध किया जा चुका हैं। उसमें से लगभग 86 लाख टन चीनी का मई 2022 के अंत तक निर्यात किए जाने की सूचना है।

इन देशों को किया गया चीनी निर्यात

वित्त वर्ष 2021-22 (अप्रैल-फरवरी) में, भारत ने इंडोनेशिया को 769 मिलियन डॉलर के बराबर का चीनी निर्यात किया था जिसके बाद बांग्लादेश (561 मिलियन डॉलर), सूडान (530 मिलियन डॉलर) तथा संयुक्त अरब अमीरात (270 मिलियन डॉलर) का स्थान रहा। भारत ने सोमालिया, सऊदी अरब, मलेशिया, श्रीलंका, अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान, नेपाल, चीन आदि देशों में भी चीनी का निर्यात किया। भारतीय चीनी का आयात अमेरिका, सिंगापुर, ओमान, कतर, टर्की, ईरान, सीरिया, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, जर्मनी, फ्रांस, न्यूजीलैंड, डेनमार्क, इजरायल, रूस, मिस्र आदि देशों में भी किया गया है।

घरेलू बाजार में 1.6 करोड़ टन चीनी बिक्री का अनुमान

चालू विपणन वर्ष की अक्टूबर-अप्रैल अवधि के दौरान घरेलू बाजार में लगभग 1.6 करोड़ टन चीनी की बिक्री होने का अनुमान है, जो एक साल पहले की अवधि के ण्क करोड़ 52.6 लाख टन से 7,50,000 टन अधिक है। इसके अलावा, सरकार द्वारा जून तक जारी घरेलू चीनी बिक्री कोटा पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 5,50,000 टन अधिक है। इसे ध्यान में रखते हुए, इस्मा का अनुमान है कि चालू विपणन वर्ष में घरेलू चीनी खपत 2.75 करोड़ टन की होगी, जबकि पिछले वर्ष यह खपत 2.65 करोड़ टन की हुई थी।

चीनी उत्पादन तीन करोड़ 523 लाख टन तक पहुंचा

इस्मा के अनुसार, चालू विपणन वर्ष में छह जून तक घरेलू चीनी उत्पादन तीन करोड़ 523 लाख टन तक पहुंच गया है, जबकि एक साल पहले की अवधि में यह तीन करोड़ 7.4 लाख टन था। इस्मा ने इथेनॉल के लिए 34 लाख टन गन्ना शीरा की खपत को ध्यान में रखकर विपणन वर्ष 2021-22 के लिए अपने अखिल भारतीय चीनी उत्पादन अनुमान को संशोधित कर 3.6 करोड़ टन कर दिया है। सितंबर के अंत में चीनी का पिछले सत्र का बचा स्टॉक लगभग 67 लाख टन होने का अनुमान है जो तीन महीने की घरेलू खपत के लिए पर्याप्त होगा।

चार-पांच लाख टन अतिरिक्त चीनी उत्पादन की उम्मीद

राष्ट्रीय सहकारी चीनी मिल लिमिटेड महासंघ के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा चीनी सत्र के बाकी बचे हुए समय में चार-पांच लाख टन अतिरिक्त चीनी का उत्पादन होने की संभावना है। देश के सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य महाराष्ट्र में चीनी का उत्पादन 30 मई तक 1.368 करोड़ टन रहा, जबकि एक साल पहले समान अवधि में 1.063 करोड़ टन का उत्पादन हुआ था।

चीनी उत्पादक राज्य

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र तथा कर्नाटक की देश में कुल चीनी उत्पादन में लगभग 80 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। देश के अन्य प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, बिहार, हरियाणा तथा पंजाब शामिल हैं।

चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र अव्वल

गन्ने का रकबा और बेहतर रिकवरी के कारण देश में इस बार चीनी का उत्पादन बढ़ा है। चीनी उत्पादन में महाराष्ट्र सबसे आगे हैं। महाराष्ट्र में इस साल अब तक चीनी का 132.6 लाख टन रिकॉर्ड उत्पादन हो चुका है, जबकि अब भी राज्य में पेराई चालू है। इस्मा के मुताबिक महाराष्ट्र में 30 अप्रैल, 2022 तक चीनी का उत्पादन 132.06 लाख टन था, जबकि पिछले साल इसी अवधि में 105.63 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था। इस साल उत्पादन पिछले साल की तुलना में लगभग 26.4 लाख टन अधिक है।

महाराष्ट्र में चीनी के भारी उत्पादन का कारण

गन्ना एक जल गहन फसल है जिसे एक बड़ी जल आपूर्ति की आवश्यकता होती है और महाराष्ट्र के किसान इसे वर्षा, जलाशयों, नहरों के नेटवर्क तथा भूजल से उचित रूप से प्राप्त कर रहे हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम के दौरान वर्ष 2019 से महाराष्ट्र में पर्याप्त वर्षा जल प्राप्त हो रहा है। पर्याप्त वर्षा के कारण भूजल और अन्य जलाशय जल से भर गए। जल के ये स्रोत कृषि उत्पादन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गन्ना उत्पादन का रकबा 11.42 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 12.4 लाख हेक्टेयर हो गया। इस प्रकार महाराष्ट्र ने वर्ष 2021-22 में गन्ने के रकबे में वृद्धि का लाभ उठाया।

उत्तर प्रदेश में कम रहा चीनी का उत्पादन

देश के दूसरे सबसे बड़े चीनी उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन पिछले साल की तुलना में कम रहा है। एक साल पहले के 1.101 करोड़ टन की तुलना में इस बार उत्तर प्रदेश में 1.022 करोड़ टन चीनी का उत्पादन हुआ है। कर्नाटक में हालांकि चीनी उत्पादन बढ़कर 59.2 करोड़ टन पर पहुंच गया, जबकि पिछले साल 30 मई तक 42.5 लाख टन चीनी पैदा हुई थी।

उत्तर प्रदेश में चीनी उत्पादन में गिरावट के कारण

उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा इथेनॉल उत्पादक बन गया है क्योंकि उत्तर प्रदेश में गन्ने के उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल के उत्पादन में संलिप्त हो गया है। यह अनुमान लगाया गया है कि वर्ष 2021-22 में गन्ने से 12.60 लाख टन चीनी को इथेनॉल बनाने के लिये प्रेरित किया गया है, जबकि 2020-21 में 7.19 लाख टन और 2019-20 में 4.81 लाख टन तथा 2018-19 में 0.31 लाख टन चीनी का उपयोग किया गया था। इसके साथ ही अत्यधिक वर्षा के साथ जलभराव की समस्या से उत्तर प्रदेश राज्य में गन्ने की फसल को भारी नुकसान हुआ है। उत्तर प्रदेश में गन्ना क्षेत्र में अधिकांश भूमि (87%) में गन्ने की एक ही किस्म (Co-0238) की फसल उगाई जाती है। यह गन्ने की उच्च उपज वाली किस्म नहीं है। गन्ने की फसल पर रेड रॉट कवक रोग का प्रतिकूल प्रभाव उत्तर प्रदेश में गन्ना उत्पादन में गिरावट का एक गंभीर कारण है।

चीनी की जगह इथेनाल बनाने पर जोर

भविष्य में इथेनाल बनाने पर चीनी मिलें ज्यादा जोर देंगी। इसके पीछे कारण है कि केंद्र सरकार चीनी के निर्यात पर सब्सिडी बंद करने जा रही है। इसकी प्रमुख वजह देश में चीनी का अधिक उत्पादन और खपत कम है। इसलिए सरप्लस चीनी की जगह इथेनाल का उत्पादन कर फ्यूल में इस्तेमाल किया जाएगा। इथेनॉल के पेट्रोलियम पदार्थों में मिश्रण करने से कच्चे तेल के आयात में कमी आएगी और विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी। अतिरिक्त चीनी को इथेनॉल में परिवर्तित करने से विदेशों से आने वाले कच्चे तेल की मांग कम हो जाएगी। पिछले कुछ वर्षों में देश में चीनी का उत्पादन खपत से बहुत ज्यादा हुआ है। इस कारण चीनी की कीमतों में इजाफा नहीं हो पा रहा है और चीनी मिलें लागत से कम भाव पर चीनी को बाजार में बेचने पर मजबूर हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चीनी का उत्पादन जरूरत से ज्यादा होने की वजह से इसके विक्रय मूल्य में कमी आती है।

चीनी की गुणवत्ता जांच के लिए देश में 220 प्रयोगशालाएं

निर्यात किए जाने वाले उत्पादों का गुणवत्तापूर्ण प्रमाणन सुनिश्चत करने के लिए, कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एपीडा) ने उत्पादों तथा निर्यातकों की एक व्यापक श्रृंखला को जांच की सुविधाएं प्रदान करने के लिए भारत भर में 220 प्रयोगशालाओं को मान्यता प्रदान की है। एपीडा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेलों में निर्यातकों की भागीदारी का आयोजन करता है जो निर्यातकों को वैश्विक बाजारों में उनके खाद्य उत्पादों के विपणन के लिए एक मंच उपलब्ध करता है। एपीडा कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए आहार, जैविक विश्व कांग्रेस, बायोफैच इंडिया आदि जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों का भी आयोजन करता है। वर्ष 2019 में, एपीडा ने रोड शो का आयोजन करने के लिए इंडोनेशिया में निर्यातकों का एक प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया और संबंधित प्राधिकारियों के साथ बैठकें आयोजित कीं। इसके बाद इंडोनेशिया को होने वाले निर्यात में तेजी आई तथा आज वे भारत से चीनी के सबसे बड़े आयतक हैं।

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