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राहुल गांधी ने संसदीय जीवन के 15 वर्षों में पूछे सिर्फ तीन सवाल

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राहुल गांधी ने एक हफ्ते के दौरान दो बार कहा कि उन्हें संसद में भाषण देने के लिए सिर्फ 15 मिनट मिल जाएं तो पीएम मोदी उनके सामने खड़े नहीं हो पाएंगे।गौरतलब है कि राहुल गांधी 2004 से संसद सदस्य हैं, यानि उनके सांसद रहते हुए 15 वर्ष पूरे होने वाले हैं। अगर वे कह रहे हैं कि उन्हें संसद में 15 मिनट नहीं बोलने दिया जा रहा है, तो वाकई ये गंभीर बात है।

राहुल गांधी के ‘हाथ’ में 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी की कमान है, इसलिए उनके बोलने को लोग गंभीरता से लेते हैं। हमने भी राहुल गांधी के दावों की सच्चाई जानने के प्रयास किए और उनके संसद में काम-काज का लेखा-जोखा निकाला। जो तथ्य सामने आए वे वाकई हैरान करने वाले हैं। आइये एक नजर डालते हैं इन तथ्यों पर-

16वीं लोकसभा के चार सालों में राहुल ने नहीं पूछे एक भी सवाल
16वीं लोकसभा के गठित हुए 47 महीने हो गए हैं, लेकिन राहुल गांधी ने इस दौरान एक भी सवाल नहीं पूछा है। संसद के कुल 12 सत्रों में से 48 वर्षीय राहुल गांधी की उपस्थिति महज 54 प्रतिशत ही रही। यानि राष्ट्रीय औसत 80 से भी 26 प्रतिशत से भी कम। गौरतलब है कि राहुल ने अब तक सिर्फ 11 बहसों में ही हिस्सा लिया है। यही नहीं राहुल ने एक भी गैर सरकारी विधेयक पेश नहीं किया है। संसद की कार्यवाही के प्रति राहुल गांधी का अगंभीर रवैया यह साबित करता है कि वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति बिल्कुल भी संजीदा नहीं हैं।

15वीं लोकसभा के पांच साल में राहुल ने नहीं पूछे एक भी सवाल
15वीं लोकसभा के पांच वर्षों के दौरान राहुल गांधी ने संसद में एक भी सवाल नहीं पूछा। वे लोकसभा की बैठकों से भी दूर रहे और केवल 42.61 प्रतिशत बैठकों में हिस्सा लिया। स्थायी समितियों में सदस्य रहने के बावजूद उनकी उपस्थिति महज 13.64 प्रतिशत रही। राहुल ने उन्हें आवंटित एमपीएलडीएस फंड का केवल 53.68 प्रतिशत खर्च किया। एमपी रिपोर्ट कार्ड के अनुसार अमेठी एमपी के तौर पर उन्हें 10 में से केवल 5.58 की रेटिंग मिल पाई। अगर ओवर ऑल रैंकिंग को देखें तो राहुल गांधी 543 सांसदों में 355वें स्थान पर रहे। जाहिर है राहुल गांधी के दावों की हकीकत हमारे सामने है।

14वीं लोकसभा के 5 साल में राहुल गांधी ने पूछे महज तीन सवाल
राहुल गांधी ने इस बार सीधे पीएम मोदी को चुनौती दी है और दावा किया है कि संसद में बोलने का मौका नहीं दिया जाता। उन्होंने इसे मुद्दा भी बनाया है। हालांकि 2004 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो भी राहुल गांधी संसद में बोलने से भागते रहे हैं। 14वीं लोकसभा में 2004 से 2007 के दौरा न राहुल गांधी बहुत कम ही संसद के भीतर नजर आए थे। पूरे पांच वर्षों के दौरान राहुल गांधी ने सिर्फ पांच बार सदन में बहस में हिस्सा लिया और केवल तीन सवाल पूछे। इस दौरान उन्होंने एक भी निजी विधेयक पेश नहीं किया। संसद की कार्यवाही में भी उनकी उपस्थिति सिर्फ 63 प्रतिशत ही थी जो राष्ट्रीय औसत से बेहद कम थी।

जब राहुल गांधी ने दी थी संसद में ‘भूकंप’ लाने की चेतावनी
तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने वर्ष, 2016 में 9 दिसंबर को एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा था, ”सरकार बहस से भाग रही है, अगर मुझे बोलने देंगे तो आप देखेंगे, भूकंप आ जाएगा।” राहुल गांधी के इस बयान पर काफी हंगामा मचा था। उन्होंने दावा किया था कि उनके पास पीएम मोदी के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है। पूरे शीतकालीन सत्र के दौरान हर किसी को सिर्फ एक बात का इंतजार था कि राहुल कब संसद में वो बयान देंगे,  जिससे भूकंप आ जाएगा। राहुल गांधी बोले भी, लेकिन वे कोई ऐसी कोई बात नहीं कह पाए जिससे ‘भूकंप’ आता। जाहिर है राहुल गांधी अपने इस दावे के बाद और भी हल्के नजर आने लगे।

राहुल गांधी के बयानों से सामने आ जाता है उनका फूहड़पन
2 मार्च 2016 के बजट सत्र में राहुल गांधी ने लोकसभा में मोदी सरकार का मजाक उड़ाते हुए कहा था कि कालाधन को सफेद करने के लिए मोदी सरकार ‘फेयर एंड लवली’ स्कीम लेकर आई है। इसी तरह 28 जुलाई 2016 को मानसून सत्र में पीएम मोदी को ‘अरहर मोदी’ कहा था, जबकि दाल के दाम कम हो चुके थे। यही नहीं 10 नवंबर, 2017 को ऐतिहासिक ‘वन नेशन, वन टैक्स’ यानि जीएसटी का मजाक उड़ाते हुए इसे गब्बर सिंह टैक्स कह दिया था।

दरअसल किसी भी देश-समाज-परिवेश में कोई न कोई ऐसा शख्स जरूर मिलता है जो स्वयं ही हंसी का पात्र बन जाता है और अपनी फजीहत का जिम्मेदार भी वह खुद ही होता है। भारतीय राजनीति में राहुल गांधी ऐसे ही नाम हैं जो न सिर्फ अपने बयानों बल्कि अपनी हरकतों से लोगों का अटेंशन खींच लेते हैं। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ये गलती जान बूझ कर करते हैं, ये गलती उनकी कम जानकारी के कारण हो जाती है।

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