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पीएम मोदी की कूटनीति का असर, चीन के साथ हंबनटोटा पोर्ट डील मामले में श्रीलंका ने मानी गलती, कहा- ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति पर कायम

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश का दुनिया में जो स्थान बना है वह निश्चित ही भारत के बढ़ते प्रभुत्व को बयां करता है। उनकी अगुवाई में भारत  एक ग्लोबल पावर बनकर उभरा है। आज प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति की सफलता का ज्वलंत प्रमाण मिला, जब श्रीलंका के विदेश सचिव जयनाथ कोलंबगे ने माना कि चीन को हंबनटोटा का बंदरगाह 99 साल की लीज पर देना एक गलती थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि श्रीलंका ‘इंडिया फर्स्ट’ नीति से पीछे नहीं हटेगा।

‘भारत के लिए खतरा नहीं बन सकते’
एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में जयनाथ ने कहा कि श्रीलंका अपनी विदेश नीति को तटस्थ रखना चाहता है लेकिन अपनी ‘इंडिया फर्स्ट’ पॉलिसी को छोड़ने वाला नहीं है। उन्होंने रणनीतिक और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर यह बात कही। उन्होंने कहा, ‘राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे ने कहा है कि रणनीतिक सुरक्षा के मामले में हम इंडिया फर्स्ट की पॉलिसी अपनाएंगे। हम भारत के लिए सुरक्षा का खतरा नहीं हो सकते और हमको होना भी नहीं है। हमें भारत से फायदा लेना है।’

‘भारत के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होंगे’
जयनाथ ने आगे कहा कि राष्ट्रपति ने साफ कहा है कि जहां तक सुरक्षा की बात है, आप हमारी पहली प्राथमिकता हैं लेकिन हमें आर्थिक संपन्नता के लिए दूसरों के साथ डील करना है।’ उन्होंने यह भी कहा है कि तटस्थ विदेश नीति अपनाने के साथ ही श्रीलंका भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा करेगा। उन्होंने कहा कि श्रीलंका यह स्वीकार नहीं कर सकता, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए और वह स्वीकार नहीं करेगा कि उसका इस्तेमाल किसी अन्य देश-विशेष तौर पर भारत के खिलाफ कुछ करने के लिए किया जाए।

‘चीन को हंबनटोटा बंदरगाह लीज पर देना गलती थी’
विदेश सचिव ने चीन को हंबनटोटा बंदरगाह 99 साल की लीज पर देना एक गलती बताया। उन्होंने कहा कि श्रीलंका ने हबंनटोटा की पेशकश पहले भारत को की थी। उन्होंने कहा, ‘भारत ने जिस भी कारण से उसे नहीं लिया और तब वह एक चीनी कंपनी को गया।’ कोलंबेज ने कहा, ‘अब हमने हंबनटोटा बंदरगाह की 85 प्रतिशत हिस्सेदारी चाइना मर्चेंट होल्डिंग कंपनी को दे दी है। वह व्यावसायिक गतिविधियों तक सीमित होना चाहिए। यह सैन्य उद्देश्यों के लिए बिल्कुल भी नहीं है।’

चीनी नेवल बेस बनने का शक
महिंदा राजपक्षे के कार्यकाल में श्रीलंका और चीन के बीच नजदीकियां खूब बढ़ी। श्रीलंका ने विकास के नाम पर चीन से खूब कर्ज लिया। लेकिन, जब उसे चुकाने की बारी आई तो श्रीलंका के पास कुछ भी नहीं बचा। जिसके बाद हंबनटोटा पोर्ट और 15,000 एकड़ जगह एक इंडस्ट्रियल जोन के लिए चीन को सौंपना पड़ा। अब आशंका जताई जा रही है कि हिंद महासागर में अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए चीन इसे बतौर नेवल बेस भी प्रयोग कर सकता है।

यूपीए शासन के दौरान हुआ हंबनटोटा पोर्ट समझौता  
बता दें कि श्रीलंका और चीन के बीच 2008 में हंबनटोटा बंदरगाह को लेकर समझौता हुआ था। उस समय भारत में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार थी। इस डील को लेकर तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई और भारत के सुरक्षा हितों की अनदेखी की।

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