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PM Modi के किसान-हितैषी कदमों की अमेरिका तक धमक, भारत में किसानों की सब्सिडी खत्म कराना चाहता है अमेरिका, ताकतवर देशों के दबाव के आगे WTO में नहीं झुकी मोदी सरकार

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किसानों के मसीहा बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों की आय बढ़ाने के लिए बहुत सारे जतन कर रहे हैं। ये अद्भुत प्रयास भले ही यहां के विपक्षी दलों की समझ में न आ रहे हों, लेकिन अब इनकी तूती अमेरिका और यूरोपीय देशों तक में भी बोलने लगी है। पीएम मोदी के इन्हीं प्रयासों में से एक है- किसानों को सालाना छह हजार रुपये देना। वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के जेनेवा में सम्मेलन में अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भारतीय किसानों को दी जाने वाली इस एग्रीकल्चरल सब्सिडी का विरोध किया है। ऐसे में इसे रोकने के लिए इन देशों ने पूरी ताकत झोंक दी है। लेकिन किसानों के हितैषी पीएम मोदी के रहते भारत ने भी इस मुद्दे पर ताकतवर देशों के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया है और उन्हें करारा जवाब दिया कि किसानों को दिया जा रहा लाभ किसी भी सूरत में नहीं रोका जाएगा। किसान-हित के इस मामले में भारत को WTO के 80 सदस्य देशों का समर्थन मिला है।

किसानों को सालाना 6 हजार और अन्य सब्सिडी देने का अमेरिका ने किया विरोध
जेनेवा में डब्ल्यूटीओ का तीन दिवसीय सम्मेलन हुआ। इसमें 164 सदस्य देशों वाले WTO के G-33 ग्रुप के 47 देशों के मंत्रियों ने हिस्सा लिया। दरअसल, अमेरिका और यूरोपीय देश चाहते हैं कि भारत अपने यहां किसानों को दी जाने वाली हर तरह की एग्रीकल्चरल सब्सिडी को खत्म करे। इन एग्रीकल्चरल सब्सिडी में PM किसान सम्मान निधि के तहत दिए जाने वाले सालाना 6 हजार रुपए, यूरिया, खाद और बिजली पर दी जाने वाली सब्सिडी और अनाज पर MSP के रूप में दी जाने वाली सब्सिडी शामिल है। भारत सरकार देश के किसानों को बीज से लेकर पानी और बिजली तक पर सब्सिडी देती है।

भारत ने WTO के तीनों ही प्रस्ताव का जमकर विरोध किया
भारत की ओर से इसमें केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल शामिल हुए। इसमें तीन अहम मुद्दों पर प्रस्ताव लाने की तैयारी की गई थी। पहला, कृषि सब्सिडी को खत्म करना। दूसरा, मछली पकड़ने पर अंतरराष्ट्रीय कानून बनाना और तीसरा कोविड वैक्सीन पेटेंट पर नए नियम बनाना। अमेरिका, यूरोप और दूसरे ताकतवर देश इन तीनों ही मुद्दों पर लाए जाने वाले प्रस्ताव के समर्थन में थे, जबकि भारत ने इन तीनों ही प्रस्ताव पर ताकतवर देशों का जमकर विरोध किया। भारत ने ताकतवर देशों के दबाव के बावजूद एग्रीकल्चरल सब्सिडी को खत्म करने से साफ इनकार कर दिया है।

महंगा होने से अमेरिका के अनाज की बिक्री घटी, इसलिए कर रहा भारत का विरोध
दरअसल, अमेरिका जैसे ताकतवर देशों का मानना है कि सब्सिडी की वजह से भारतीय किसान चावल और गेहूं का भरपूर उत्पादन करते हैं। इसकी वजह से भारत का अनाज दुनिया भर के बाजार में कम कीमत में मिल जाता है। अमेरिका और यूरोपीय देशों के अनाज की कीमत ज्यादा होने की वजह से विकासशील देशों में इसकी बिक्री कम होती है। यही वजह है कि दुनिया के अनाज बाजार में दबदबा कायम करने के लिए ताकतवर देश भारत को एग्रीकल्चरल सब्सिडी देने से रोकना चाहते हैं। लेकिन पीएम मोदी की सबका साथ- सबका विकास की नीति के चलते भारत इसे मानने से मना कर दिया है। भारत ने साफ किया है कि किसानों को सब्सिडी जारी रहेगी।किसानों को सब्सिडी देने के मामले में WTO के 80 सदस्य देशों का भारत को समर्थन
इस मामले में भारत को WTO के 80 सदस्य देशों का साथ मिल रहा है, जिसमें चीन भी शामिल है। भले ही सीमा विवाद को लेकर LAC पर भारत और चीन की सेना आमने-सामने हों, लेकिन WTO में सब्सिडी के खिलाफ पेश प्रस्ताव के मामले में भारत और चीन दोनों साथ हैं। यह पहली बार नहीं है, जब WTO के नियमों के खिलाफ एशिया के दो बड़े देश चीन और भारत साथ आए हैं। इससे पहले 17 जुलाई 2017 को भी दोनों देशों ने मिलकर किसानों के सब्सिडी मामले में पश्चिमी देशों का विरोध किया था। दरअसल, चीन भी अपने किसानों को सालाना सरकारी मदद, यानी सब्सिडी देता है।

राष्ट्रपति बाइडन को पत्र लिखकर अमेरिकी सांसदों ने भारत को दी केस की धमकी
हैरानी की बात तो यह है कि 28 अमेरिकी सांसदों ने राष्ट्रपति जो बाइडन को पत्र लिखकर भारत के खिलाफ WTO में मुकदमा करने की मांग की। इन सांसदों ने भारत सरकार पर किसानों को तय नियम से ज्यादा सब्सिडी देने का आरोप लगाया था। अमेरिकी सांसदों ने अपने पत्र में लिखा था कि भारत सरकार WTO के तय नियम के मुताबिक अनाजों को उत्पादन मूल्य पर 10% से ज्यादा सब्सिडी दे रही है। इससे वैश्विक बाजार में कम कीमत पर भारत का अनाज आसानी से उपलब्ध हो रहा है। यही वजह है कि अमेरिकी सांसदों ने भारत के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग राष्ट्रपति जो बाइडन से की है।

भारत के 10 राज्यों के 40 लाख मछुआरों की रोजी-रोटी पर संकट नहीं आने देगा
किसानों को सब्सिडी की खिलाफत के अलावा इन ताकतवर देशों का मानना है कि भारत और उसके जैसे विकासशील देश सरकारी मदद के दम पर ज्यादा मछली उत्पादन करते हैं। इससे ग्लोबल मार्केट में दूसरे देशों को कॉम्पिटिशन का सामना करना पड़ता है। यही वजह है कि अमेरिका जैसे देश मछुआरों को सब्सिडी दिए जाने से रोकना चाहते हैं। साथ ही मछली पकड़ने पर अंतरराष्ट्रीय कानून भी बनाना चाहते हैं। भारत ने इसका कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इसके पीछे मोदी सरकार का तर्क है कि ऐसा हुआ तो भारत के 10 राज्यों के 40 लाख मछुआरों की रोजी-रोटी पर संकट खड़ा हो जाएगा। सरकार किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देगी।

तकनीक हर देश के साथ साझा हो, ताकि कोरोना महामारी को रोकने में मदद मिले
जेनेवा सम्मेलन में G-33 की कोविड वैक्सीन के पेटेंट को लेकर भी बैठक हुई। COVID-19 के खिलाफ दुनिया की 70% आबादी को पूरी तरह से टीका लगाने के लिए लगभग 1100 करोड़ वैक्सीन खुराक की आवश्यकता है। दरअसल, अमेरिका और कई यूरोपीय देशों का मानना है कि कोविड वैक्सीन का पेटेंट होना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि जो कंपनी वैक्सीन बनाएगी, उसे बनाने और बेचने का अधिकार सिर्फ उसी के पास हो। दूसरी ओर, मोदी सरकार का विजन है कि महामारी के दौर में वैक्सीन चाहे जो कंपनी भी बनाए, लेकिन उस तकनीक को हर देश के साथ साझा किया जाना चाहिए। इससे महामारी को रोकने में मदद मिलेगी। भारत ते इस विजन का कई विकासशील देशों ने भी समर्थन किया है।

 

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