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हिंदू जागृत: भोजशाला में पूजा की अनुमति में बड़ा संदेश, अजमेर दरगाह में शिव-मंदिर के दावे की भी याचिका स्वीकार

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सनातन संस्कृति के धार्मिक स्थलों पर मुस्लिम आक्रांताओं ने हमले कराकर ना सिर्फ उन्हें ध्वस्त किया, बल्कि पूजा स्थलों पर मस्जिद-दरगाह आदि का निर्माण करा दिया। केंद्र में नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद हिंदुत्व जाग रहा है। उन्होंने बाबरी मस्जिद पर भव्य-दिव्य राम मंदिर का निर्माण कराया है। उसकी प्राण प्रतिष्ठा को इसी 22 जनवरी को दो साल पूरे हुए हैं। हिंदु समुदाय अब सनातन स्थलों के पुनरोद्धार के लिए फिर से आंदोलित हो रहा है। अब इन धार्मिक स्थलों को बचाने की लड़ाई अदालतों में है। मध्य प्रदेश के धार जिले में भोजशाला और राजस्थान के अजमेर में दरगार ऐसे ही विवादित स्थल है। सुप्रीम कोर्ट ने जहां मध्य प्रदेश की भोजशाला में बसंत पंचमी के दिन सूर्योदय से सूर्यास्त तक पूजा की अनुमति प्रदान कर दी। उधर अजमेर दरगाह में शिव-मंदिर होने के दावे की याचिका भी सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर ली है। सनातन संस्कृति से जुड़े इन दोनों स्थलों को लेकर पूजा स्थल, प्रतिमा, संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।सनातन स्थलों की पुनर्स्मृति: इतिहास, न्याय और आस्था की वापसी
महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार की ओर से अजमेर दरगाह में शिव मंदिर होने का दावा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ.एपी सिंह के जरिए कोर्ट में याचिका लगाई गई। इसे सोमवार को सुनवाई करते हुए स्वीकार कर लिया। वकील डॉ एपी सिंह के अनुसार न्यायालय ने राजवर्धन सिंह परमार द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए परमार को प्रथम याचिका माना है। न्यायालय ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 फरवरी रखी है। महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार के मुताबिक न्यायालय ने हमारे द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए हमें मुख्य पक्षकार माना है। राजस्थान में महाराणा प्रताप सेना की ओर से यात्रा की गई थी। जिसमें लाखों लोगों के हस्ताक्षर से याचिका लगाने का अवसर मिला था। हमें पूर्ण विश्वास है कि अजमेर दरगाह के नीचे वर्षों से भगवान शिव का मंदिर बंद है, वह बहुत जल्द खुलेगा। वहां पूजा होगी और पुष्कर से जल भी लाकर चढ़ाया जाएगा। परमार ने कहा कि हमने याचिका में वहां के नक्शे, रेकी और शिवलिंग के चित्र सहित अन्य सबूत पेश किए हैं। इसके अलावा भी अगर न्यायालय कोई सबूत मांगेगा तो उन्हें पूरा करने का काम महाराणा प्रताप करेगी।

इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना
राम मंदिर के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सनातन स्थलों की पुनर्प्राप्ति का मार्ग सड़क नहीं, बल्कि संविधान और अदालतें हैं। यही कारण है कि आज भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल न्यायिक विमर्श के केंद्र में हैं। यह संघर्ष किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना के लिए है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को ऐतिहासिक रूप से परमार शासक राजा भोज से जोड़ा जाता है। यह स्थल विद्या की देवी मां सरस्वती को समर्पित माना जाता रहा है। यहां प्राप्त शिलालेख, स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक संदर्भ इसे एक शिक्षण एवं साधना केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। बाद के कालखंड में यहाँ कमाल मौला मस्जिद का अस्तित्व सामने आता है, जिससे यह स्थल विवाद का केंद्र बन गया। वर्षों तक प्रशासनिक आदेशों के तहत पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित किए जाते रहे। हालिया न्यायिक हस्तक्षेप के बाद पूजा के अधिकार को लेकर हिंदू पक्ष को महत्वपूर्ण राहत मिली है। न्यायालय ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आस्था और इतिहास की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव में। मध्य प्रदेश सरकार का सहयोग और विधिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका इस दिशा में निर्णायक मानी जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण
दूसरी ओर राजस्थान के अजमेर स्थित दरगाह शरीफ को लेकर भी ऐतिहासिक विमर्श नया नहीं है। हिंदू संगठनों और याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह स्थल मूलतः एक प्राचीन शिव मंदिर था। स्थापत्य संकेत, प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और स्थानीय परंपराएँ इस दावे का आधार प्रस्तुत करती हैं। लंबे समय तक इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा को दबाया गया, लेकिन अब मामला न्यायिक दायरे में प्रवेश कर चुका है। अजमेर दरगाह से जुड़े शिव मंदिर के दावे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब तथ्यों, साक्ष्यों और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की सुनवाई के लिए तैयार है। यह सनातन समाज के लिए उम्मीद का संकेत है कि उसकी आस्था को अब “अस्वीकार्य” नहीं कहा जा सकता।अब आस्था बनाम राजनीति नहीं, आस्था और न्याय साथ-साथ
राजस्थान और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों ने इन मामलों में स्पष्ट किया है कि वे किसी भी समुदाय के अधिकारों का हनन नहीं चाहतीं, लेकिन ऐतिहासिक सत्य और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा भी नहीं बनेंगी। यह संतुलन ही संवैधानिक शासन की पहचान है। तुष्टिकरण की राजनीति से अलग हटकर कानून के दायरे में निर्णय लेने का यह दृष्टिकोण भविष्य की राजनीति को दिशा देता है। इन दोनों मामलों को केवल धार्मिक चश्मे से देखना भूल होगी। यह संघर्ष उस मानसिकता के खिलाफ है, जिसने दशकों तक हिंदू समाज को अपनी ही विरासत पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए मजबूर किया। यह किसी मस्जिद या दरगाह को गिराने की मांग नहीं, बल्कि यह जानने की मांग है कि इतिहास क्या कहता है और आस्था का अधिकार किसे मिलना चाहिए? किसने और कब हिंदू स्थलों को ध्वस्त करने धृष्ट कार्य किया?

 

यह अपने इतिहास, आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की यात्रा
यदि न्यायालयों में ऐतिहासिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल मूलतः सनातन परंपरा से जुड़े रहे हैं, तो पूजा का अधिकार मिलना न केवल स्वाभाविक होगा, बल्कि संवैधानिक भी। भारत का संविधान आस्था को नकारता नहीं, बल्कि सभी को समान धार्मिक स्वतंत्रता देता है। राम मंदिर ने यह दिखा दिया कि धैर्य, संविधान और सत्य के साथ लड़ी गई लड़ाई अंततः परिणाम देती है। भोजशाला और अजमेर समेत देश के कई अन्य हिंदू धार्मिक स्थल उसी यात्रा के अगले पड़ाव हैं। यह यात्रा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने इतिहास, अपनी आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बदला हुआ भारत अब अपने अतीत से डरता नहीं, बल्कि उसे समझकर भविष्य की नींव रख रहा है।मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

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