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पुराने VIP बौखलाए हैं ! इसीलिए मोदी सरकार को बदनाम कर रहे हैं?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से देश ने विकास की जो गति पकड़ी है, वो अद्वितीय है। कृषि, अर्थव्यवस्था, विदेश नीति हर क्षेत्र में बदलाव दिख रहा है। फिर भी क्या कारण है, कि बार-बार ये दिखाने की कोशिश हो रही है कि, देश अशांत है? दरअसल ये माहौल कुछ स्वार्थी तत्वों की ओर से जानबूझकर पैदा की जा रही है। दो साल के अकाल के बाद भी कृषि क्षेत्र में अच्छा विकास दर्ज हुआ, किसानों की आय बढ़ी, फिर भी प्रदर्शन के नाम पर दंगे क्यों हो रहे हैं? जानकारों की मानें तो इस खेल के पीछे अभिजात्य वर्ग के वो लोग हैं, जो लगभग 70 साल की अपनी दुकानदारी किसी भी सूरत में बंद नहीं होने देना चाहते।

कथित कुलीनों को भारत में हो रहा बदलाव नहीं दिखता

भारत में अभी जो बदलाव नजर आ रहा है वो ऐतिहासिक है। इतने कम समय में ऐसा परिवर्तन शायद ही दुनिया के किसी देश में देखने में आया है। भारत में भी ऐसा पहले कभी नहीं हुआ, जो अब हो रहा है। तीन साल में अन्नदाताओं की आय में भारी बढ़ोत्तरी हुई है। 2022 तक उनकी आय दोगुना करने के लक्ष्य को लेकर काम किया जा रहा है। फिर भी मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के किसानों के उग्र प्रदर्शनों के पीछे का कारण क्या है ? जबतक उनकी समस्याओं की कोई सुनवाई नहीं थी, तब तक तो वो शांत बैठे थे। इसी तरह महंगाई भी एक मुद्दा होता था, आम नागरिकों को सबसे अधिक परेशान करता था। लेकिन वर्तमान समय में मोदी सरकार की नीतियों के कारण वो भी एतिहासिक रूप से निचले स्तर पर है। लेकिन इन ऐतिहासिक तथ्यों को आप उन पुराने VIP विशेषज्ञों की राय से मिलाएंगे तो आप भ्रम में पड़ जाएंगे। वो इसे ऐसे पेश करने की कोशिश करते दिखेंगे कि, भी प्रगति हो रही है वो तात्कालिक है, भविष्य तो अंधकार मय है!

दबदबा समाप्त होने से परेशान हैं

सरकार किसी की भी रहे, देश की व्यवस्था पर किसी न किसी रूप में इनका दबदबा 1947 से लेकर 2014 तक रहा है। इनका राजनीतिक और आर्थिक दर्शन पश्चिमी देशों के सामाजिक उदारवाद और अवसरवादी आर्थिक समाजवाद से प्रभावित रहा है। इनकी कथनी और करनी में आकाश और पाताल का अंतर होता है। साफ है कि इनमें से अधिकतर संख्या कांग्रेस समर्थक विशेषज्ञों की है, क्योंकि सबसे अधिक दिनों तक देश की सत्ता उसी के पास रही है। इसमें भी वर्तमान में 2014 से पहले तक के मनमोहन सिंह के नाम वाली (सोनिया-राहुल) सरकार के समर्थकों की ही संख्या अधिक है। लेकिन मोदी सरकार आने के बाद से इन्हें मेवा खाने का अवसर नहीं मिल  रहा। मोदी सरकार ने कभी ऐसे तथाकथित बुद्धजीवियों में रेवड़ियां बांटने की नीति नहीं अपनाई। अब सिर्फ उन्हीं लोगों को मौका दिया जाता है जो अपनी ज्ञान और क्षमता के आधार पर सरकार को उचित सलाह दे सकते हैं। पीएम मोदी के सामने चाटूकारों के लिए कोई जगह नहीं है।

जमीनी सच्चाई से अनजान हैं

प्रभावशाली अंग्रेजी मीडिया से जुड़े इन लोगों के विचारों पर कांग्रेसी झलक हमेशा से दिखती आई है। लेकिन 2014 के बाद से इनके एकक्षत्र राज में तेजी से बदलाव आने शुरू हो गए। कंफर्ट जोन में रहने वाले इन सभ्रांतों को कभी महसूस ही नहीं हुआ था कि, भारतीय समाज बदल रहा है। अब झूठों के सहारे जनता को बरगलाने के दिन लद गए। संचार क्रांति ने जनता को सोचने-समझने में सक्षम बना दिया है। भारतीय जनता अब परिवारवाद के पैदाइश नेताओं से प्रश्न पूछना जानती है, वो अपने नेताओं में उत्तरदायित्व की भावना देखना चाहती है। धरातल की सच्चाई समझ आने के बाद पुराने सभ्रांतों (राजनेता, उद्योगपति, वामपंथी बुद्धिजीवी, शिक्षाविद्) को अपने राज पर खतरा महसूस होना शुरू हो गया । लेकिन वो दशकों से प्राप्त अपने विशेषाधिकार को किसी भी कीमत पर छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं।

नोटबंदी के फायदों से आंखें मूंदे हैं

अपना दबदबा बनाए रखने के लिए ये तथाकथित बुद्धिजीवी कुछ भी करने को तैयार हैं। ये हर हाल में देश के विकास को ठप करने की कोशिश करेंगे। देश में परिवर्तन न आए इसके लिए चाल पर चाल चलेंगे। अगर इसके लिए उन्हें फर्जी विश्लेषण करना होगा तो वो भी करेंगे। इसके लिए वो हर तरह की बौद्धिक कसरत करने के लिए तैयार हैं, चाहे इसके लिए उन्हें जो भी करना पड़े। विमुद्रीकरण को ही लीजिए सारे आंकड़े बता रहे हैं कि इसके चलते आने वाले समय में अर्थव्यस्था में और भी मजबूती आएगी। IMF जैसे वैश्विक संगठनों ने इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए सरकार की सराहना की है। लेकिन एजेंडा चलाने वाले बुद्धिजीवी इसे ऐसे पेश करने की कोशिश करेंगे कि ये तो पूरी तरह से नाकाम हो गया। यही लोग हैं जो नोटबंदी के समय किसानों की बुवाई के सीजन के नाम पर बहुत हंगामा काट रहे थे। लेकिन सरकार ने किसानों पर नोटबंदी का कोई असर नहीं पड़ने दिया। उनके लिए हर व्यवस्था की गई। परिणाम दुनिया के सामने है। देश में अनाजों का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है।

तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं

जो कथित बुद्धिजीवी विमुद्रीकरण के चलते छोटे किसानों (विशेषरूप से सब्जी और फूल उगाने वाले) को होने वाली मुश्किलों पर हल्ला कर रहे थे। वही नोटबंदी के चलते फलों के मूल्यों में लगभग 5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी पर चुप रहे। यही लोग गन्ना, धान और गेहूं उगाने वाले किसानों की फसलों के मूल्यों में 10-15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी पर भी चुप्पी साधे रहे। जबकि देश में सब्जी उत्पादकों की संख्या लगभग 40 लाख है वहीं गन्ना, धान और गेहूं उगाने वाले किसानों की संख्या लगभग 9 करोड़ है। यानी उनका दर्द किसानों से नहीं था, उनकी परेशानी ये थी कि कैसे भी मोदी सरकार को बदनाम करने का कोई भी अवसर नहीं छोड़ें।

भ्रष्टाचार और घोटालों पर लगी रोक के बारे में बात नहीं करते

दुनिया तारीफ कर रही है कि मोदी सरकार के आने के बाद से भारत में बड़े स्तर के भ्रष्टाचार पर 100 प्रतिशत की रोक लग चुकी है। जिस देश ने मनमोहन सरकार के 10 साल के कार्यकाल में घोटाले ही देखे थे, पिछले तीन साल में एक पाई का घोटाला सामने नहीं आया है। लेकिन ये एजेंडावादी पुराना उच्च वर्ग इस सच्चाई पर कभी चर्चा करने के लिए तैयार नहीं होगा। पीएम मोदी ने सरकार में आते ही सबसे पहले कालाधन लाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाली एसआईटी बनाने का निर्णय लिया। यही नहीं इसको लेकर पीएम स्वयं व्यक्तिगत स्तर पर बहुत अधिक मेहनत कर रहे हैं। कालाधन संजो कर रखने वाले देशों को समझाने की कोशिशें की हैं। अब उसका परिणाम भी सामने आने लगा है। स्विटजरलैंड जैसा देश जो भारतीय कालाधन रखने के लिए सबसे अधिक कुख्यात था, अब संदिग्ध खातों की जानकारी साझा करने के लिए तैयार हो गया है। क्या ये बदलाव नहीं है? क्या सरकार के इस कार्य की प्रशंसा नहीं होनी चाहिए ?

तथ्यों को टटोलने पर खेल साफ हो जाता है। जो लोग सत्ता से मदद के बल पर दशकों से ऐश करते रहे हैं, उन्हें हर हाल में पुरानी परिस्थितियां वापस चाहिए। देश लुटता रहे, गरीब और गरीब होता रहे, किसानों को ऋण माफी के नाम पर गुमराह किया जाता है, अर्थव्यवस्था चौपट होती रहे, उनकी तो सिर्फ अपनी दुकान चलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा, तो वो सरकार को बदनाम करते रहेंगे। आंकड़ों को बाजीगरी से तोड़ते मरोड़ते रहेंगे। लेकिन, ये खेल अधिक दिन तक चलना संभव नहीं है। सत्ता के टुकड़ों पर पलते रहे लोग चाहे जितना भी छटपटाएं, मुट्ठीभर लोगों को गुमराह भी कर लें लेकिन, ये जो पब्लिक है वो सब जानती है।

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