Home नरेंद्र मोदी विशेष भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने को तत्पर मोदी सरकार

भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने को तत्पर मोदी सरकार

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कहते हैं जो समय का सम्मान नहीं करता, समय के साथ नहीं चलता, उसको समय कभी माफ नहीं करता। भारत के आजाद हुए सत्तर साल हो गए हैं, लेकिन जितनी प्रगति करनी चाहिए थी नहीं कर पाया है। आज भी वैश्विक परिस्थितियों में प्रतिस्पर्धा की बात आती है तो अपना देश कई मानकों में निचले पायदान पर है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब से देश की कमान संभाली है उनका प्रयास है कि भारत वर्तमान वैश्विक परिवेश में एक प्रतिस्पर्धी के तौर पर स्थापित हो सके। उन्होंने कई क्षेत्रों में ऐसे प्रयास किए हैं जो भारत को उसका प्राचीन गौरव दिलाने के साथ वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में भारत के लिए प्रासंगिक भी है। आइए जानते हैं कुछ ऐसे ही प्रयास जो पीएम मोदी की पहल से किए गए हैं-

2020 तक 5-जी सेवा शुरू करने के लिए समिति गठित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र की सत्ता संभालते ही देश में 4जी तकनीक को प्रोत्साहन देने की नीति बनाई। अब उनकी नजर 5जी सेवा पर है। उनका मानना है कि 2020 में जब 5जी प्रौद्योगिकी को विश्व अपनाए तो भारत भी उनके साथ खड़ा रहे। इसी नीति के तहत सरकार ने 2020 तक 5जी सेवा शुरू करने को लेकर सलाह देने के लिए 26 सितंबर को एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी।

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इस प्रौद्योगिकी से वायरलेस ब्राडबैंड की गति शहरी क्षेत्र में करीब 10,000 एमबीपीएस और ग्रामीण क्षेत्रों में 1,000 एमबीपीएस हो जाएगी। उच्च स्तरीय कमेटी 5जी के बारे में दृष्टिकोण, मिशन और लक्ष्यों को लेकर काम करेगी। सरकार 5जी सेवा शुरू करने को लेकर शोध एवं विकास गतिविधियों को सुगम बनाने के प्रयास के तहत 500 करोड़ रुपये का कोष बनाने पर विचार कर रही है।

डिजिटल वर्ल्ड में डिजिटल इंडिया भी बनाएगा स्थान
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब डिजिटल इंडिया कंसेप्ट सबके सामने रखा तो अधिकतर लोगों ने इसे असंभव बताया, लेकिन पूरा विश्व जहां डिजिटल क्रांति की तरफ बढ़ रहा है तो भारत इसमें पीछे न रह जाए इसे देखते हुए प्रधानमंत्री ने इसे पूरा करने को ठाना। दरअसल मोदी सरकार की मंशा है कि डिजिटल इंडिया के माध्यम से लोगों को दिन-प्रतिदिन के कार्यों में सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें। इसके तहत सरकार का पहला लक्ष्य है घर-घर तक ब्रॉडबैंड हाइवे के जरिये इंटरनेट पहुंचाना। दूसरा लक्ष्य है हर हाथ को फोन देना, सरकार इस दिशा में तेजी से काम कर रही है। पीसीओ के तर्ज पर पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्वाइंट पंचायतों में बनाया जाना इसका तीसरा लक्ष्य है और इसपर भी कार्य शुरू है।

चौथा लक्ष्य है ई-गवर्नेंस यानी सरकारी दफ्तरों को डिजिटल बनाना और सेवाओं को इंटरनेट से जोड़ने का। इस दिशा में भी अच्छी प्रगति हुई है। पांचवां लक्ष्य है ई-क्रांति यानि इंटरनेट के जरिये विकास गांव-गांव तक पहुंचाने का, इस क्षेत्र में भी तेज गति से कार्य हो रहे हैं। छठा लक्ष्य है इंफॉर्मेशन फॉर ऑल यानि सभी को जानकारियां देना। इस दिशा में अच्छा विकास हुआ है और आज एक क्लिक पर सरकार की कई जानकारियां लोगों को सहज ही उपलब्ध हैं। सातवां लक्ष्य है इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन और आठवां लक्ष्य है आईटी फॉर जॉब्स, इन दोनों में भारत अच्छा विकास कर रहा है। वहीं नवां लक्ष्य है अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम यानि दफ्तरों और स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थियों और शिक्षकों की उपस्थिति को दर्शाने का कार्य। 

बुलेट ट्रेन में हम थे लेट, पर देर आए दुरुस्त आए
दुनिया की पहली बुलेट ट्रेन 1964 में जापान में चली थी। चीन भी 10 साल से बुलेट दौड़ा रहा है। फ्रांस, इटली, जर्मनी, साउथ कोरिया भी बुलेट ट्रेन पर सवार है, लेकिन भारत जापान से 56 साल देर से बुलेट ट्रेन की सवारी कर सकेगा। जाहिर है दुनिया विकास की जिस तेज गति से आगे बढ़ रही है भारत उसमें कई दशक पीछे चल रहा है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की पहल से भारत के नागरिक भी 2022 के अगस्त महीने से बुलेट ट्रेन की सवारी कर कर सकेंगे। जापान के सहयोग से निर्मित बुलेट ट्रेन के जरिये मुंबई से अहमदाबाद तक का 509 किलोमीटर का सफर महज 2 घंटे में कर सकेंगे।

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सागरमाला परियोजना से सभी बंदरगाहों को जोड़ने की पहल
भारत सरकार द्वारा सागरमाला परियोजना की परिकल्पना की गई है। समुद्र तटीय राज्यों के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिससे न केवल बंदरगाह का विकास होगा बल्कि बंदरगाहों के द्वारा समग्र विकास सुनिश्चित होगा। इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए मोदी सरकार के मेक इन इंडिया के तहत सागरमाला परियोजना की शुरुआत 2014 में की गई थी। इसके तहत देश के चारों ओर सीमाओं पर सड़क परियोजनाओं में से 7500 किलोमीटर लंबे तटीय सागर माला परियोजना क्षेत्र को जोड़ने के लिए नेटवर्क विकसित किया जा रहा है। दरअसल विदेशों से होने वाला भारत का व्यापार का 90 प्रतिशत बंदरगाहों के जरिये होता है। देश के करीब साढे सात हजार लंबी तटीय सीमा पर 13 बड़े बंदरगाह हैं और कुछ और का निर्माण हो रहा है। केंद्र सरकार इस परियोजना पर 70 हजार करोड़ खर्च करने जा रही है।

परियोजना के उद्देश्य

  • भारत के शिपिंग क्षेत्र की तस्वीर बदलना
  • देश के बंदरगाहों को आधुनिक बनाना
  • बंदरगाहों के निकट विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाना

परियोजना से लाभ

  • हर साल औसतन 40 हजार करोड़ की बचत होगी
  • देश के भीतरी भागों में भी जलमार्ग विकसित किया जा सकेगा
  • नदियों और नहरों से बने ये जलमार्ग सीधे बंदगाहों से जुड़े होंगे
  • तटीय आर्थिक क्षेत्रों का निर्माण किया जाएगा
  • रोजगार के अवसर पैदा होंगे और पलायन रूकेगा

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‘भारतमाला’ से एक सूत्र में बंध जाएगा भारत
सागर माला की तर्ज पर गुजरात से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कश्मीर होते हुए मिजोरम तक भारत माला परियोजना का विकास किया जा रहा है जिसके तहत अंतर्राष्ट्रीय सीमा वाले प्रदेशों में सीमा पर अच्छे रेल एवं सड़क नेटवर्क स्थापित किए जा सकें जो उत्तर भारत के व्यापारिक हितों के साथ -साथ भारत के सामरिक हितों का भी लक्ष्य साध सकें। इसके तहत लगभग 5 हजार किलोमीटर सड़कें बननी हैं।

इस परियोजना में भारत की सीमाओं, तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों, धार्मिक पर्यटक स्थलों में 25 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया जाएगा और साथ ही 100 से अधिक जिला मुख्यालयों को इससे जोड़ा जाएगा। 2015-16 के बजट के मुताबिक इसपर 2,67,000 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है। पिछड़े क्षेत्रों, धार्मिक एवं पर्यटक स्थलों को जोड़ने वाली 7 000 किलोमीटर सड़कों के निर्माण पर 85,200 करोड़ रुपये खर्च का प्रस्ताव है। उत्तराखंड के चार धाम जिसमें केदारनाथ, बद्रीनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री भी भारतमाला परियोजना के तहत उन्नत सड़क मार्गों से जुड़ेंगे।

सार्क सेटेलाइट से सूत्रबद्ध हुए दक्षिण एशिया के कई देश
प्रधानमंत्री मोदी की परिकल्पना और इसरो की इस परियोजना से निर्माण, संचार, आपदा, सहायता और दक्षिण एशियाई देशों के बीच संपर्क बढ़ाने में सहूलियत होगी। इसके अलावा आपसी तालमेल और जानकारी साझा करना भी आसान हो सकेगा। ये उपग्रह प्राकृतिक संसाधनों का खाका बनाने, टेली मेडिसिन, शिक्षा क्षेत्र, आईटी और लोगों से लोगों का संपर्क बढ़ाने के क्षेत्र में पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक वरदान साबित होगा। अंतरिक्ष आधारित प्रौद्योगिकी के बेहतर इस्तेमाल में भी ये उपग्रह मदद कर सकता है। इस उपग्रह में भागीदार देशों के बीच हॉट लाइन उपलब्ध करवाने की भी क्षमता है। इसके माध्यम से भूकंप, चक्रवात, बाढ़, सुनामी जैसी आपदाओं के समय संवाद कायम करने में मदद मिल सकेगी। पड़ोसियों के इस्तेमाल के लिए, उनके द्वारा कुछ खर्च कराए बिना बनाए गए इस संचार उपग्रह के ‘उपहार’ का अंतरिक्ष जगत में कोई और सानी नहीं है। भारत ने पड़ोसी देशों के कल्याण के लिए इस सेटेलाइट का निर्माण किया है और उन्हें अमूल्य उपहार दिया है।

ओबीओआर का जवाब एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर 
एशिया-अफ्रीका को जोड़ने के लिए जिस तरह चीन ने वन बेल्ट,वन रुट को बनाया ठीक उसी तरह भारत ने इसे जोड़ने के लिए एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी) बनाने का फैसला किया है। दरअसल यह प्रोजेक्ट प्रधानमंत्री मोदी और जापान के पीएम शिंजो आबे का साझा विज़न है जिसके द्वारा यह दोनों देश अफ्रीका में क्वॉलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलप करने के साथ ही डिजिटल कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना चाहते हैं।

इस प्रोजेक्ट से जहां एशिया और अफ्रीका के बीच आर्थिक, व्यावसायिक, सांस्थानिक सहयोग को बढ़ावा मिलेगा वहीं यह अफ्रीका और एशिया के लोगों को कुशल व मजबूत तरीके से जोड़ेगा। अफ्रीकन डेवलपमेंट बैंक की मीटिंग के दौरान पेश किए गए इस कॉरिडोर के डॉक्यूमेंट में चार मुख्य बिंदु बताये गए हैं जिसमें आपसी सहयोग और विकास से जुड़े प्रॉजेक्ट्स, क्वॉलिटी इंफ्रास्ट्रक्चर, इंस्टिट्यूशनल कनेक्टिविटी, कपैसिटी और स्किल बढ़ाना और लोगों के बीच भागीदारी जैसे बिंदु शामिल हैं।

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