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बांग्लादेश में पीएम मोदी मतुआ समुदाय के लोगों से करेंगे मुलाकात, मतुआ महासंघ के संस्थापक की जन्मस्थली का करेंगे दौरा, जानिए बंगाल की सियासत में क्‍या है इनकी अहमियत?

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शुक्रवार यानि 26 मार्च, 2021 को दो दिवसीय दौरे पर बांग्लादेश पहुंचे गए। कोरोना महामारी की शुरुआत के बाद यह उनकी पहली विदेश यात्रा है। उनकी इस यात्रा के कई मायने हैं। प्रधानमंत्री मोदी दो दिनों तक बांग्लादेश में रहेंगे इसी दौरान पश्चिम बंगाल में पहले चरण का मतदान होगा। प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश में मतुआ समुदाय के लोगों से मिलेंगे और इस समुदाय के संस्थापक हरिचंद्र ठाकुर की जन्मस्थली का भी दौरा करेंगे। इसके माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी इस समुदाय से अपने रिश्ते को नई ऊर्जा देंगे।

प्रधानमंत्री मोदी का मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचंद्र ठाकुर के ओरकांडी के मंदिर में जाना सियासी रूप से काफी अहम है। इस समुदाय के लोग हरिचंद्र ठाकुर को भगवान की तरह पूजते हैं, जिनका जन्‍म अविभाजित भारत के एक गरीब और अछूत नमोशूद्र परिवार में हुआ था। अविभाजित भारत का वह हिस्‍सा अब बांग्‍लादेश में है। उनके इस कार्यक्रमों को बंगाल की सियासत और यहां होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है और इससे बंगाल चुनाव के दौरान यहां की सियासत में नया मोड़ भी आ सकता है।

दरअसल पश्चिम बंगाल में काफी तादाद में मतुआ समुदाय के लोग रहते हैं, जिनका बंगाल की राजनीति में भी काफी दखल है। यहां की करीब 70 विधानसभा सीटों पर मतुआ समुदाय के लोगों की अपनी धमक है। इन 70 विधानसभा सीटों पर मतुआ समुदाय के मतदाता जिस किसी भी राजनीतिक दल के पक्ष में उतर जाता है, तब वहां की राजनीतिक बयार का रुख ही बदल जाता है। इन सीटों पर जीत और हार में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी के बांग्लादेश में मतुआ समुदाय के संस्थापक की जन्मस्थली का दौरा करना अपने आप में मायने रखता है।

पश्चिम बंगाल में मतुआ समुदाय की आबादी 2 करोड़ से भी अधिक बताई जाती है और पश्चिम बंगाल के नदिया तथा उत्तर व दक्षिण 24 परगना जिले में 40 से ज्‍यादा विधानसभा सीटों पर इनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती है। लोकसभा चुनाव में इस इलाके की कम से कम सात संसदीय सीटों पर उनके वोट को निर्णायक माना जाता है। इस समुदाय की सियासी अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल में चुनावी अभियान की शुरुआत बीणापाणि देवी से आशीर्वाद लेने के बाद की थी।

1947 में आजादी के साथ बंटवारे और एक अलग राष्‍ट्र के रूप में पाकिस्‍तान के उदय ने मतुआ समुदाय के लोगों को मुश्किलों में डाल दिया। पूर्वी पाकिस्‍तान में हो रहे धार्मिक शोषण से तंग आकर 1950 के दशक में ही इस समुदाय ने भारत में पलायन शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे यहां रहते हुए इस समुदाय के लोगों ने बड़ी संख्‍या में मतदाता पहचान-पत्र भी बनवा लिया और राज्‍य की राजनीति को प्रभावित करने लगे। इस समुदाय के लोगों को पहले वामदलों का वोटर समझा जाता था, लेकिन फिर ये ममता बनर्जी की तरफ मुड़ गए।

मतुआ समुदाय के लोगों को फिलहाल बीजेपी का समर्थक माना जाने लगा है। इसका सबसे बड़ा कारण मोदी सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को बताया जा रहा है। हालांकि, वर्ष 2003 में नागरिकता कानून में जो बदलाव किया गया था। इसके बाद उन्‍हें लगा कि भारत में अवैध तरीके से घुसने के नाम पर उन्‍हें बांग्‍लादेश वापस भेजा जा सकता है, लेकिन फिर जब मोदी सरकार के द्वारा नागरिकता कानून में संशोधन किए जाने बाद उन्‍हें यहां शरण और नागरिकता मिलने की उम्‍मीद जगी, तो वे ममता की टीएमसी को छोड़ बीजेपी के समर्थक बन गए।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में मतुआ समुदाय के शांतनु ठाकुर को बीजेपी के टिकट पर बनगांव से चुनावी मैदान में उतारा गया था। इस चुनाव में उन्होंने करीब 1 लाख से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल की। बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर बीनापाणि देवी के छोटे बेटे मंजुल कृष्ण ठाकुर के बेटे हैं, जिन्‍होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में अपने ही परिवार की ममता बाला ठाकुर को हराया था। ममता बाला ठाकुर बीनापाणि देवी के बड़े बेटे कपिल कृष्ण ठाकुर की पत्‍नी हैं, जिन्‍होंने 2015 में हुए उपचुनाव में टीएमसी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीता था।

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